
Jaipur Literature Festival सुधा मूर्ति, फोटो-पत्रिका
जयपुर: राजस्थान के जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के तीसरे दिन फ्रंट लॉन में आयोजित सत्र द मैजिकल ऑफ द लॉस्ट ईयररिंग्स भावनाओं, इतिहास और स्मृतियों से भरा रहा। प्रसिद्ध लेखिका और समाजसेवी सुधा मूर्ति की किताब पर आधारित इस सत्र का संचालन वरिष्ठ पत्रकार मंदिरा नायर ने किया। सत्र की शुरुआत में मंदिरा नायर ने सुधा मूर्ति से पूछा कि उन्होंने यह किताब अपनी पोती के लिए क्यों लिखी और इसके केंद्र में भारत-पाकिस्तान विभाजन को ही क्यों रखा। इस पर सुधा मूर्ति ने बेहद सहज और आत्मीय अंदाज में अपनी रचना की पृष्ठभूमि साझा की।
सुधा मूर्ति ने बताया कि यह किताब उन्होंने अपनी ग्रैंडडॉटर नॉनी के लिए लिखी है, जो लंदन में रहती है। वे चाहती थीं कि उनकी पोती अपनी जड़ों, अपने पूर्वजों के संघर्ष और उस भूमि के इतिहास को समझे, जहां से उसका परिवार आया है। उन्होंने कहा कि उनकी बेटी की शादी ऋषि सुनक से हुई है और उनके दादा-दादी लाहौर और एबटाबाद से थे। विभाजन के समय वे सब कुछ छोड़कर पहले नैरोबी, फिर दार-एस-सलाम और अंतत, लंदन पहुंचे। उन्होंने दो बार अपना घर खोया। सुधा मूर्ति ने कहा कि आज की पीढ़ी स्वतंत्रता और जमीन को सहज मान लेती है, लेकिन इसके पीछे पीढ़ियों का संघर्ष छिपा है। बच्चों को उपदेश देकर नहीं, बल्कि कहानियों के माध्यम से इतिहास समझाया जा सकता है, इसलिए उन्होंने इस कथा को दादी और पोती के संवाद के रूप में बुना।
किताब के विषय में बात करते हुए सुधा मूर्ति ने कहा कि यह उनकी सीरीज की तीसरी किताब है। पहली किताब में उन्होंने भारत के खोए हुए मंदिरों और उनकी वास्तुकला पर लिखा, दूसरी में नदियों के महत्व को दर्शाया और तीसरी किताब में विभाजन को केंद्र में रखा। उन्होंने स्पष्ट कहा, अगर हम इतिहास नहीं जानते, तो भविष्य को भी नहीं समझ सकते। इतिहास और भविष्य एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इस कहानी के लिए उन्होंने व्यापक शोध किया-अमृतसर, उज्जैन, दिल्ली, लंदन के संग्रहालयों का दौरा किया और यहां तक कि हवाई अड्डों पर बैग बदलने की प्रक्रिया को भी स्वयं देखा, ताकि कहानी यथार्थ के करीब हो सके।
सुधा मूर्ति ने बताया कि यह किताब केवल एक जोड़ी बालियों की कहानी नहीं है, बल्कि खोई हुई जमीन, संस्कृति और रिश्तों की कहानी है। ज़ैनब और सिमरन जैसे पात्रों के जरिए उन्होंने हिंदू-मुस्लिम दोस्ती, पंजाब की साझा संस्कृति और ईद-दीपावली साथ मनाने की परंपरा को दर्शाया है। जैनब द्वारा दी गई बालियां सिर्फ आभूषण नहीं, बल्कि दोस्ती, स्मृतियों और पंजाब की मिट्टी की प्रतीक हैं। जब ये बालियां खो जाती हैं, तो जो पीड़ा होती है, उसे खरीदा नहीं जा सकता, क्योंकि वह बीते हुए सुनहरे दिनों की निशानी होती है।
सत्र के दौरान सुधा मूर्ति ने आज के बच्चों और अभिभावकों को भी संदेश दिया। उन्होंने कहा कि जीवन केवल सुखों का नाम नहीं है। आज के बच्चे छोटी-छोटी बातों पर अवसाद की बात करने लगते हैं, जबकि उन्हें यह समझना चाहिए कि पिछली पीढ़ियों ने कितने बलिदान दिए हैं। माता-पिता बच्चों को सुविधाएं दे सकते हैं, खिलौने दे सकते हैं, लेकिन सबसे जरूरी है उन्हें संघर्ष सहने की क्षमता देना। असफलताओं को स्वीकार करना, आत्मविश्वास और दृढ़ता विकसित करना, यही असली पूंजी है। उन्होंने यह भी कहा कि न्यूक्लियर परिवारों के दौर में बच्चों को दादा-दादी से मिलने वाले संस्कार नहीं मिल पा रहे हैं, इसलिए लेखकों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।
विभाजन पर बात करते हुए सुधा मूर्ति ने इसे एक गलत निर्णय बताया, जिसने लाखों जिंदगियों को प्रभावित किया। उन्होंने पाकिस्तान यात्रा के दौरान तक्षशिला संग्रहालय और रावलपिंडी में पुराने घरों को देखने के अनुभव साझा किए, जहां लोगों की आंखों में आज भी पीड़ा दिखती है। उन्होंने विशेष रूप से सिंधी समुदाय का जिक्र करते हुए कहा कि सिंधियों ने न केवल अपनी जमीन, बल्कि भाषा और संस्कृति भी खो दी। आने वाली पीढ़ी को यह समझाना जरूरी है कि मातृभाषा, भूमि और संस्कृति कितनी महत्वपूर्ण होती है। सत्र का समापन इस संदेश के साथ हुआ कि विभाजन का इतिहास बच्चों को जानना चाहिए, ताकि ऐसी त्रासदी दोबारा न दोहराई जाए।
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Updated on:
17 Jan 2026 05:07 pm
Published on:
17 Jan 2026 03:30 pm
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