
स्पीकर्स अनीश गवांडे, पवन वर्मा, प्रियंका चतुर्वेदी, फारा दबोईवाला, एलिस ओसवाल्ड, इयान हिसलॉप, नवदीप सूरी, नवतेज सरना और मॉडरेटर वीर सांघवी (फोटो- पत्रिका)
Jaipur Literature Festival 2026: जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के 19वें संस्करण का समापन उस बहस के साथ हुआ, जिसने लोकतंत्र की बुनियादी अवधारणा को सीधे सवालों के घेरे में ला खड़ा किया। ‘द क्लोजिंग डिबेट-फ्रीडम ऑफ स्पीच इज ए डेंजरस आइडिया।’ सत्र में प्रस्ताव रखा गया, यह सदन मानता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक खतरनाक विचार है।
इस बहस में विचारों का विभाजन साफ दिखा। प्रस्ताव के पक्ष में नेता और लेखक अनिश गावंडे, पूर्व सांसद पवन वर्मा और राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी थे। प्रस्ताव के विरोध में ब्रिटिश कवयित्री एलिस ओसवाल्ड, वरिष्ठ पत्रकार इयान हिसलॉप, पूर्व राजनयिक नवदीप सूरी और नवतेज सरना ने अपने तर्क रखे। इतिहासकार और लेखक फारा दभोइवाला ने किसी एक पक्ष में खड़े होने से इनकार करते हुए दोनों तरफ की जटिलताओं को सामने रखा।
प्रस्ताव के समर्थन में बोलते हुए अनिश गावंडे ने कहा कि आज अभिव्यक्ति की आजादी एक समान अधिकार नहीं रह गई है। आज फ्रीडम ऑफ स्पीच सिर्फ उन्हीं के पास है, जो इसके नतीजे झेलने की ताकत रखते हैं। उन्होंने भारत में दलितों की स्थिति का हवाला देते हुए कहा कि हाशिए पर खड़े समुदायों के लिए बोलना आज भी असुरक्षित है। सवाल यह है कि जब बोलने की सजा हिंसा या सामाजिक बहिष्कार हो, तो ऐसी आजादी किस काम की?
पूर्व सांसद पवन वर्मा ने बहस को और स्पष्ट करते हुए कहा कि यह चर्चा बोलने की आजादी को अच्छा या बुरा साबित करने की नहीं है। उनके अनुसार, हम नहीं मानते कि अभिव्यक्ति की आजादी बुरी चीज है, लेकिन यह जरूर एक खतरनाक विचार है। बहस ‘अच्छा बनाम बुरा’ की नहीं, बल्कि ‘अच्छा बनाम खतरनाक’ की है। उन्होंने कहा कि किसी विचार का खतरनाक होना, उसके महत्व को खत्म नहीं करता, बल्कि उसकी ताकत को दर्शाता है।
प्रस्ताव के विरोध में बोलते हुए एलिस ओसवाल्ड ने सत्ता द्वारा अभिव्यक्ति की सीमाएं तय करने पर गहरी आपत्ति जताई। उन्होंने पूछा, मेरी अभिव्यक्ति की सीमा कौन तय करेगा? उनके अनुसार, अभिव्यक्ति केवल वह नहीं है, जो मुंह से निकलती है, बल्कि वह भी है जो कानों में जाती है। अगर सुनने की क्षमता खत्म हो जाए, तो संवाद और लोकतंत्र दोनों खत्म हो जाते हैं।
वरिष्ठ पत्रकार इयान हिसलॉप ने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा कि इस समय दुनिया में अगर किसी एक व्यक्ति के पास पूरी आजादी से बोलने का अधिकार है, तो वह एलन मस्क हैं। उन्होंने अपने 40 वर्षों के पत्रकारिता अनुभव का हवाला देते हुए कहा कि अगर अभिव्यक्ति की आजादी सच में एक खतरनाक विचार है, तो उनकी पूरी पत्रकारिता यात्रा ही व्यर्थ हो जाती है। हिसलॉप ने जिस वाक्य से अपनी बात खत्म की, भीड़ ने तालियों के साथ उसका स्वागत किया। उन्होंने कहा कि खामोशी से बेहतर है बोलने का खतरा।
इतिहासकार फारा दभोइवाला ने बहस को संतुलन देते हुए कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी वाकई एक खतरनाक विचार है, लेकिन इसी वजह से वह जरूरी भी है। उन्होंने कहा कि यह आजादी शोषित और वंचित वर्गों को अपनी बात कहने का अवसर देती है और यही बात सत्ता को असहज करती है। सरकारें असली मुद्दों जैसे फिलस्तीन, कश्मीर और जलवायु परिवर्तन पर शोर नहीं चाहतीं।
राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर लोगों को लंबे समय तक चलने वाले खतरे झेलने पड़ते हैं। उन्होंने बताया कि धमकियां, ट्रोलिंग और फेक न्यूज का फैलाव आजादी के नाम पर समाज को गहरी क्षति पहुंचा रहा है। उनके अनुसार, जब झूठ को भी अभिव्यक्ति की ढाल मिल जाती है, तो उसका असर लोकतंत्र पर लंबे समय तक पड़ता है।
Published on:
20 Jan 2026 02:25 am
बड़ी खबरें
View Allजयपुर
राजस्थान न्यूज़
ट्रेंडिंग
