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Pink City की पहचान पर संकट: अतिक्रमण और रंगों की असमानता से खतरे में जयपुर का हैरिटेज टैग

यूनेस्को से विश्व धरोहर का दर्जा पाने वाला जयपुर शहर आज विरासती पहचान को बचाने की जंग लड़ रहा है। अतिक्रमण, लापरवाही, नियमों की अनदेखी और सरकारी तंत्र की सुस्ती के कारण राजधानी का एकरूप गुलाबी रंग कई शेड्स में बिखरता जा रहा है। यही असमानता जयपुर की विश्व धरोहर टैग के लिए सबसे बड़ा खतरा बनती दिख रही है।

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जयपुर. यूनेस्को से विश्व धरोहर का दर्जा पाने वाला जयपुर शहर आज विरासती पहचान को बचाने की जंग लड़ रहा है। अतिक्रमण, लापरवाही, नियमों की अनदेखी और सरकारी तंत्र की सुस्ती के कारण राजधानी का एकरूप गुलाबी रंग कई शेड्स में बिखरता जा रहा है। यही असमानता जयपुर की विश्व धरोहर टैग के लिए सबसे बड़ा खतरा बनती दिख रही है।

यूनेस्को ने जयपुर को वर्ल्ड हैरिटेज सिटी का दर्जा दिया था। इस सम्मान के बाद जिम्मेदारों ने कोई काम नहीं किया। यही वजह है कि न सिर्फ मूलस्वरूप बदरंग होता चला गया, बल्कि गुलाबी रंग के कई अलग-अलग शेड्स नजर आते हैं, जो शहर की ऐतिहासिक पहचान को कमजोर कर रहे हैं।

खास-खास
-06 जुलाई, 2019 को जयपुर का परकोटा क्षेत्र यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में हुआ था शामिल
-1200 से अधिक स्थानों में ड्रोन सर्वे में मूलस्वरूप से छेड़छाड़ पाई थी, नोटिस देने के बाद नहीं हुई कोई कार्रवाई
-100 करोड़ रुपए से एक बार फिर परकोटे को संवारने का दावा किया जा रहा है नगर निगम की ओर से

रंगों की एकरूपता टूटी
यूनेस्को मानकों के अनुसार, जयपुर की खास पहचान उसके नियोजित शहरी ढांचे, ऐतिहासिक भवनों और गुलाबी रंग की समानता से जुड़ी है। नगर निगम और विरासत संरक्षण से जुड़े नियमों में भवनों के लिए विशेष गुलाबी रंग निर्धारित किया गया है, लेकिन जमीन पर इन नियमों का पालन नहीं हो रहा। कई भवन मालिक अपनी पसंद से रंग करवा रहे हैं, जिससे पूरे इलाके में दृश्य असंतुलन पैदा हो गया है।

अतिक्रमण-अवैध निर्माण बड़ी चुनौती
परकोटा क्षेत्र में अतिक्रमण और अवैध निर्माण गंभीर समस्या हैं। सड़कों पर दुकानों का फैलाव, अस्थायी ढांचे, अवैध होर्डिंग्स और अव्यवस्थित पार्किंग से न केवल यातायात प्रभावित हो रहा है, बल्कि ऐतिहासिक ढांचे की मूल संरचना भी खतरे में है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह स्थिति जारी रही तो यूनेस्को ‘डेंजर लिस्ट’ में जयपुर को शामिल कर सकता है।

नियम हैं, लेकिन अमल कमजोर
राज्य सरकार और नगर निगम ने विरासत संरक्षण के लिए बायलॉज और दिशा निर्देश बनाए हैं। भवनों के रंग, ऊंचाई, खिडक़ी-दरवाजों की बनावट तक के नियम तय हैं, लेकिन प्रभावी निगरानी और सख्त कार्रवाई के अभाव में इनका उल्लंघन आम हो गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि नियमों का कड़ाई से पालन ही जयपुर की पहचान बचा सकता है।

क्यों खतरे में है हैरिटेज टैग
यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों की नियमित समीक्षा करता है। यदि किसी स्थल की मौलिक विशेषताएं (वास्तुकला, रंग योजना और ऐतिहासिक स्वरूप) नष्ट होती हैं तो उसका दर्जा खतरे में पड़ सकता है। जयपुर में रंगों की असमानता, अतिक्रमण और संरक्षण का अभाव इसी दिशा में इशारा कर रही है।

परकोटा क्षेत्र में एकीकृत संरक्षण योजना लागू की जाए। निगम अनुमति दे और निगरानी भी करे, ताकि मानकों अनुरूप काम किया जाए। हैरिटेज सेल को मजबूत किया जाए और उसमें एक्सपर्ट को रखा जाए। उनकी देखरेख में परकोटा क्षेत्र में कार्य हों। इससे एकरूपता रहेगी और पुरान शहर पहले की तरह बना रहेगा।
-चंद्रशेखर पाराशर, सेवानिवृत्त अतिरिक्त मुख्य नगर नियोजक

ये हुआ
-मुख्य बाजारों की इमारतों में मनमर्जी से बदलाव किए गए। कई जगह तो डिजायन के विपरीत जाकर खिड़कियां तक निकाल लीं।
-वॉल सिटी को दुरुस्त करने का काम शुरू हुआ। काम पूरा होने से पहले ही बंद हो गया। मामला स्वायत्त शासन विभाग में अटका है।
-निगम की मिलीभगत से नए निर्माण हो रहे हैं, इनको रोका नहीं जा रहा है। दिखावे की कार्रवाई होती है और फिर चुपचाप निर्माण पूरे हो जाते हैं।

मुख्य सचिव ने दिखाई गंभीरता
बीते दिन मुख्य सचिव वी श्रीनिवास ने पर्यटन, स्वायत्त शासन विभाग और नगरीय विकास विभाग के अधिकारियों के साथ बैठक की थी। इसमें यूनेस्को मानकों के अनुरूप परकोटा क्षेत्र की देखरेख और विकास के लिए अंतर-विभागीय टीम गठित करने की बात कही थी।