
शासन में अफसरशाही के हावी होने की चर्चा कोई आज की नहीं है। सत्तर के दशक में जब लगातार एक ही राजनीतिक दल का शासन रहा तब भी राजस्थान में यह चर्चा रहती थी कि शासन तंत्र के दैनिक कामकाज में नौकरशाही हावी है। श्रद्धेय कुलिश जी ने ५४ बरस पहले आलेख में जो कुछ चिंता व्यक्त की वह आज भी सामयिक है। कुलिश जी ने तब भी सामंजस्य की आवश्यकता पर जोर देते हुए लिखा था कि ऐसा नहीं हुआ तो कभी नौकरशाही तो कभी राजनेता हावी होते रहेंगे। आलेख के प्रमुख अंश: लोकतंत्रीय शासन में कदम-कदम पर सत्ता पर अंकुश रखने और संतुलन बनाए रखने को उसी तरह से महत्व दिया गया है जिस तरह से सड़क परिवहन में ट्रेफिक की लाल-हरी बत्तियों को। राजस्थान की पिछली सरकार से यह आम शिकायत थी कि वह कोई अंकुश नहीं मानती थी और शासन तंत्र के दैनिक कार्यकलाप में जरूरत से ज्यादा दखलंदाजी हुआ करती थी। नई सरकार बनी तो उसने शासन को गतिशील करने के बार-बार दावे किए। नए मंत्री यह कहते नहीं अघाते कि वे शासन तंत्र में हस्तक्षेप नहीं करते। विधायकों का दौरा भी ज्यादा नजर नहीं आता। राजनीति में उन्होंने अपनी सीमाएं मान लीं और भरसक कोशिश कर रहे हैं उन सीमाओं में रहने की। जो लोग अतीव हस्तक्षेप की शिकायत करते थे, उन्हें यह जानकर खुश होना चाहिए।
क्या राजनेता खुश हैं? क्या उन्हें खुश होना चाहिए? क्या शासन तंत्र राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त होकर स्वस्थ मार्ग पर चल रहा है? इन सवालों का जवाब ढूंढने के लिए हालात का नए सिरे से जायजा लेना जरूरी है। इस सिलसिले में जब भिन्न-भिन्न विधायकों से बात करने का अवसर मिलता है तो वे हत्बुद्धि नजर आते हैं।
विधायकों में आम धारणा है कि शासन पूरी तरह अफसरशाही के हाथ मेंं आ गया है और उस पर अब कोई अंकुश नहीं रह गया है। कार्यकर्ताओं का भी यह रवैया होता जा रहा है कि वे कामकाज के लिए मंत्री की बजाय अफसर की ओर देखना पसंद करते हैं। सरकार में कुछ मंत्री बड़े प्रभावशाली समझे जाते हैं परन्तु उन्हें भी कई बार कई मामलों में अफसरों के सामने असहाय देखा गया है। एक अन्य मंत्री को एक फाइल पर एक टिप्पणी लिखनी पड़ी कि सचिव ने उनको पिछली टिप्पणी का जवाब नहीं दिया। उन्हें यह भी लिखना पड़ा कि वे मंत्री हैं। कागजों का जवाब देना तो राजस्थान के सचिवालय का वैसे भी प्रशासनिक दायित्व नहीं माना जाता। अंकुश और संतुलन के बिना लोकतांत्रिक शासन में सार्थकता उत्पन्न नहीं हो सकती। प्रशासनिक सुधार के किसी भी कदम में सामंजस्य जरूरी है वरना कभी राजनेता और कभी नौकरशाही निरंकुश होते रहेंगे।
…तो लोककल्याण का अनुष्ठान अधूरा
अफसरशाही बुरी तरह हावी होने लगी है और सुना है, राजनीतिक हस्तक्षेप बंद है। राजनेताओं की वकालत करने की मेरी मंशा कतई नहीं है और इसी तरह अफसरों को बदनाम करने की भी मेरी कोई चेष्टा नहीं होगी। मैं जोर देकर कहना चाहता हूं शासन प्रशासन में तालमेल पर, चेक एण्ड बैलेंस के लोकतांत्रिक सिद्धांत पर। राजनेताओं ने अगर यह मान लिया कि वे अनुचित बातों को लेकर अफसरों पर दबाव नहीं डालेंगे तो अफसरों की यह जिम्मेदारी हो जाती है कि वे बिना ऊपरी दबाव के भी सही तरीके से काम करें और धाक जमाने की थोथी बान को छोड़ें। यदि वे अपने पर अंकुश नहीं रखेंगे तो सीधी प्रतिक्रिया राजनीतिक हस्तक्षेप के रूप में होगी और यही कुचक्र चलता रहेगा। जब तक यह कुचक्र नहीं टूटेगा शासन सुचारू रूप से नहीं चलेगा, लोककल्याण का अनुष्ठान अधूरा ही पड़ा रह जाएगा।
(२३ सितम्बर १९७२ को प्रकाशित 'माना कि राजनीतिक हस्तक्षेप बंद है' आलेख के अंश)
बणग्या दानक्या
राजा बणग्या दानक्या,
सुबह साँझ को ध्यान।
काल काल की देखस्याँ,
आज निकळसी क्याँन।।
('सात सैंकड़ा' से)
हमारी खुद की भी एक सत्ता
प्रश्न यह है कि सत्ता क्या है? हमारी नजर में सत्ता का अभिप्राय आम तौर पर राजनीतिक सत्ता से समझा जाता है। हमारे समाज की सत्ता राजनीतिक सत्ता से बड़ी है। आदमी जितना बड़ा होता जाएगा उसकी भाग-दौड़ व दौरे उतने ही बढ़ते जाएंगे। तो यह कौनसी सत्ता है जिसके पीछे ये उच्च सत्ता वाले भाग रहे हैं? यह कौनसी सत्ता है जिसे पाने के लिए लोग चंदा बटोरते हैं। पैसे की सत्ता..जाति की सत्ता भी तो है..जब लोग नाते-रिश्तेदारों, जात-पात का सहारा लेते हैं। हमारी खुद की भी एक सत्ता है, इसलिए मैं समान धरातल पर बात करता हूं।
(जारी… कुलिश जी का सृजन संसार पढ़ें आगामी गुरुवार को भी)
Published on:
12 Feb 2026 05:35 pm
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