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मूमल-महेंद्र स्टोरी: शंका का जहर और वो अधूरा प्रेम, रहस्यों से भरी मूमल की मेड़ी, जहां आज भी गूंजती है अधूरी मोहब्बत की सिसकियां

थार के रेगिस्तान की सुंदरी कही जाने वाली राजकुमारी मूमल और राजकुमार महेंद्र का बेइंतहा प्रेम सदियों गुजर जाने के बावजूद आज भी लोकप्रिय है। बड़ी शिद्दत के साथ एक-दूसरे से प्यार करने वालों का हालांकि बहुत दुखद अंत हुआ, लेकिन जैसलमेर की यात्रा पर आने वाले सैलानी मूमल की मेड़ी को देख प्रेम की मिसाल माने जाने वाले इस जोड़े की यादों में खो जाते हैं।

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Mumal and Mahendra Love Story

Mumal and Mahendra Love Story (Patrika Photo)

Mumal and Mahendra Love Story: राजस्थान की रेतीली धरती सिर्फ वीरों की गाथाओं के लिए ही नहीं, बल्कि ऐसी प्रेम कहानियों के लिए भी जानी जाती है जो सदियों बाद भी हवाओं में गूंजती हैं। जैसलमेर की स्वर्णनगरी से कुछ दूर, काक नदी के किनारे बसे 'लौद्रवा' के खंडहर आज भी मूमल और महेंद्र की बेइंतहा मोहब्बत के गवाह हैं। यह कहानी जितनी खूबसूरत है, इसका अंत उतना ही हृदयविदारक है।

जैसलमेर जिले की प्राचीन राजधानी लौद्रवा की राजकुमारी मूमल अपनी सुंदरता के लिए सात समंदर पार तक प्रसिद्ध थी। कहते हैं कि मूमल जैसी सुंदरी न तो उस समय कोई थी और न ही उसके बाद हुई। मूमल ने काक नदी के तट पर एक अद्भुत महल बनवाया था, जिसे 'मूमल की मेड़ी' कहा जाता है। यह महल वास्तुकला का एक चमत्कार था। इसे 'इकथम्भिया महल' (एक खंभे वाला महल) भी कहा जाता था।

मूमल ने एक कठिन प्रतिज्ञा की थी। उसकी मेड़ी रहस्यों, गुप्त रास्तों और खतरनाक विषैले जीवों से घिरी थी। उसने प्रण लिया था कि जो वीर पुरुष इन तमाम बाधाओं और रहस्यों को पार कर उस तक पहुंचेगा और उसके बुद्धि-कौशल के प्रश्नों का उत्तर देगा, वह उसी से विवाह करेगी। दूर-दूर के देशों ईरान, इराक, अफगानिस्तान और अमरकोट के राजकुमार आए, लेकिन मूमल के रहस्यों के जाल में उलझकर रह गए।

महेंद्र से पहली मुलाकात, जब वक्त ठहर गया

महेंद्र अमरकोट (वर्तमान पाकिस्तान में) के राणा का पुत्र था। एक दिन शिकार के दौरान एक हिरण का पीछा करते हुए वह रास्ता भटक गया और लौद्रवा की काक नदी के किनारे पहुंच गया। वहां उसने झरोखेदार मेड़ी देखी और मूमल की सुंदरता के बारे में सुना।

जब महेंद्र ने अपनी बुद्धिमानी से मेड़ी के रहस्यों को पार किया और मूमल के सामने पहुंचा, तो दोनों एक-दूसरे को देखते ही रह गए। वह एक 'पहली नजर का प्यार' था। वह रात बातों-बातों में बीत गई और महेंद्र का वापस जाने का मन ही नहीं हुआ।

चीतल ऊंट और आधी रात का सफर

महेंद्र वापस अमरकोट तो चला गया, लेकिन उसका दिल मूमल के पास ही रह गया। वह मूमल से मिलने के लिए इतना बेताब था कि उसने 'चीतल' नाम के एक खास और तेज रफ्तार ऊंट का इंतजाम किया। महेंद्र हर रात अमरकोट से मीलों लंबा मरुस्थल पार कर लौद्रवा पहुंचता और सुबह होने से पहले वापस अमरकोट आ जाता।

लेकिन यह प्रेम कहानी इतनी आसान नहीं थी। महेंद्र विवाहित था और उसकी सात पत्नियां थीं। जब उन्हें महेंद्र और मूमल के प्रेम का पता चला, तो ईर्ष्या की आग में जलकर उन्होंने एक साजिश रची और महेंद्र के वफादार ऊंट 'चीतल' के पैर तुड़वा दिए।

एक गलतफहमी और उजाड़ हो गई दुनिया

ऊंट के घायल होने के कारण महेंद्र को लौद्रवा पहुंचने में देरी हो गई। दूसरी ओर, मूमल बेचैनी से उसका इंतजार कर रही थी। उस रात मूमल की छोटी बहन सुमल भी वहां थी। खेल-खेल में सुमल ने पुरुषों के वस्त्र पहन रखे थे और वह मूमल के साथ ही पलंग पर सो गई।

जब महेंद्र देर रात वहां पहुंचा, तो उसने खिड़की से देखा कि मूमल के साथ कोई पुरुष सोया हुआ है। महेंद्र को लगा कि मूमल ने उसे धोखा दिया है। वह गुस्से और दुख में अपना चाबुक वहीं छोड़कर वापस अमरकोट लौट गया। सुबह जब मूमल की आंख खुली और उसने वह चाबुक देखा, तो उसे समझ आ गया कि महेंद्र आया था और किसी बड़ी गलतफहमी का शिकार होकर चला गया।

प्रेम की अग्नि परीक्षा और दुखद अंत

महेंद्र के वियोग में मूमल ने अन्न-जल त्याग दिया। उसकी स्वर्ण जैसी काया काली पड़ने लगी। उसने कई संदेश भेजे, लेकिन महेंद्र की पत्नियों ने उन्हें पहुंचने नहीं दिया। अंत में, अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए मूमल खुद अमरकोट पहुंची।

महेंद्र के मन में शंका का जहर इतना गहरा था कि उसने मूमल की आखिरी परीक्षा लेने की सोची। उसने एक सेवक के जरिए संदेश भिजवाया कि "महेंद्र को सांप ने डस लिया है और उसकी मृत्यु हो गई है।" यह सुनते ही मूमल सदमे को बर्दाश्त नहीं कर पाई और उसने मौके पर ही अपने प्राण त्याग दिए। जब महेंद्र को पता चला कि मूमल ने उसे सच्चा प्यार किया था और वह बेगुनाह थी, तो वह भी 'मूमल-मूमल' पुकारता हुआ पागल हो गया और उसने भी अपनी देह त्याग दी।

आज भी गूंजती है 'मूमल' की याद

भले ही इस प्रेम कहानी का अंत दुखद रहा, लेकिन आज भी जैसलमेर की संस्कृति में मूमल का नाम अमर है। जैसलमेर के विश्व प्रसिद्ध 'मरु महोत्सव' में आज भी मूमल की याद में 'मिस मूमल' सौंदर्य प्रतियोगिता आयोजित की जाती है। राजस्थान के लोक कलाकार आज भी 'मांढ राग' में मूमल-महेंद्र की कथा सुनाते हैं, जिसे सुनकर सैलानियों की आंखें नम हो जाती हैं।

बताते चलें, लौद्रवा में काक नदी के किनारे आज भी 'मूमल की मेड़ी' के अवशेष मौजूद हैं, जो प्रेमियों के लिए किसी तीर्थ से कम नहीं हैं। मूमल-महेंद्र की यह गाथा हमें सिखाती है कि प्रेम में 'शंका' कितनी विनाशकारी हो सकती है। रेगिस्तान के धोरों में आज भी जब हवा चलती है, तो ऐसा लगता है मानो मूमल की सिसकियां और महेंद्र के ऊंट के कदमों की आहट सुनाई दे रही हो।