
सम के मखमली धोरों ने जैसलमेर को अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर स्थापित कर दिया है। प्रतिवर्ष हजारों देशी-विदेशी पर्यटक स्वर्णनगरी के ऐतिहासिक स्थलों के साथ सम के रेतीले धोरों का रुख करते हैं। इसी तरह के मखमली रेतीले धोरे परमाणु नगरी पोकरण से केवल 35 किलोमीटर दूर लोहारकी गांव में भी मौजूद हैं, लेकिन प्रचार-प्रसार और संरक्षण के अभाव में ये धोरे उपेक्षा का शिकार बने हुए हैं। सम जैसी प्राकृतिक बनावट और आकर्षण होने के बावजूद लोहारकी पर्यटकों की नजर से ओझल है। परमाणु नगरी पोकरण को पर्यटन नगरी के रूप में विकसित करने के उद्देश्य से वर्ष 2009 में लोहारकी गांव के मखमली धोरों पर मरु महोत्सव का आयोजन किया गया था। इस दौरान ऊंट दौड़, युवाओं की दौड़, मटका दौड़, रस्सा कस्सी जैसे पारंपरिक आयोजन हुए। रात के समय सुरमयी सांझ में सांस्कृतिक संध्या ने क्षेत्र को नई पहचान दी। इसी क्रम में वर्ष 2024 व 2026 में भी पोकरण मरु महोत्सव के दौरान लोहारकी के धोरों के बीच सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए, लेकिन नियमित आयोजन नहीं होने से यह पहचान स्थायी नहीं बन सकी।
भारत-पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा पर स्थित जैसलमेर जिला मरुस्थलीय क्षेत्र है। यहां सम के धोरों की तर्ज पर लोहारकी गांव में पांच से अधिक रेतीले टीले और मखमली धोरे मौजूद हैं। बावजूद इसके पर्यटन विभाग व प्रशासन की ओर से इनके संरक्षण, मूलभूत सुविधाओं और प्रचार-प्रसार पर कोई ठोस पहल नहीं की गई। सड़क, संकेतक, बैठने की व्यवस्था और गतिविधियों के अभाव में पर्यटकों तक इन धोरों की जानकारी नहीं पहुंच पा रही है।
जैसलमेर की तरह पोकरण में भी पर्यटन की पर्याप्त संभावनाएं मौजूद हैं। लोहारकी के मखमली धोरे देशी ही नहीं, विदेशी पर्यटकों को भी आकर्षित करने की क्षमता रखते हैं। कुछ होटल संचालक रामदेवरा व हाईवे से पर्यटकों को यहां भ्रमण के लिए लाते भी हैं। जानकारों की मानें तो यदि प्रशासन व जनप्रतिनिधि संरक्षण और प्रचार की दिशा में ठोस प्रयास करें तो लोहारकी को नया पर्यटन केंद्र बनाया जा सकता है
लोहारकी में मखमली रेतीले टीले पर्यटन स्थल बनने की पूरी क्षमता रखते हैं। प्रशासन की ओर से संरक्षण और प्रचार किया जाए तो यह क्षेत्र विश्व पर्यटन मानचित्र पर स्थापित हो सकता है।
— जसवंतसिंह रावलोत, सामाजिक कार्यकर्ता, लोहारकी
Published on:
04 Feb 2026 11:26 pm
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