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निगहबान- रीलवीर नहीं रियल वीर चाहिए

समय की मांग है कि हम मानसिक दिवालियापन की हद पार करने वाले इस खतरनाक रील की डील से बचें। रील्स को सभ्य समाज अपने परिवार के साथ देख नहीं पा रहा है।

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एआई तस्वीर

संदीप पुरोहित
आज समाज एक अजीब और खतरनाक संक्रमण की चपेट में है। यह कोई जैविक रोग नहीं, बल्कि एक मानसिक और सामाजिक वायरस है, जिसे हम 'रीलवीर' कह सकते हैं। इसका छोटा रूप 'फोटोवीर' है। यह वायरस चुपचाप व्यवहार, प्राथमिकताओं और सोच को बदलता है। काम कम, दिखावा अधिक यही इसका सबसे अहम और स्पष्ट लक्षण है। यह विवेक को चाट जाता है। इससे प्रभावित कोई दुर्घटना होने पर मदद करने की जगह रील बनाकर पोस्ट करने में लग जाता है। क्या करें, इन वीरों को लाइक व्यू की गलाकाट प्रतिस्पर्धा का सामना हर पल करना पड़ता है।

दुर्भाग्य यह है कि इस बीमारी के शिकार केवल युवा ही नहीं, बल्कि छोटे-बड़े नेता, सरकारी बाबू, अधिकारी, महिलाएं और बेरोजगारों की फौज सहित समाज का एक बड़ा तबका हो चुका है। शायद ही कोई वर्ग ऐसा बचा हो, जो इस आकर्षण से पूरी तरह अछूता रहा हो। रीलवीर वह व्यक्ति है, जो हर क्षण को कैमरे में कैद कर 'कंटेंट' बनाना चाहता है, चाहे वह क्षण उपयोगी हो या नहीं। फोटोवीर वह है, जो हर काम से ज्यादा अपनी छवि चमकाने में लगा है। यह एक ऐसी मानसिकता है, जिसमें 'काम' गौण और 'प्रचार' प्रधान हो जाता है। गणतंत्र दिवस पर रीलवीरों की राष्ट्र भक्ति के ज्वार को देख सीमा पर खड़े जवान भी अचंभित हो रहे होंगे। राष्ट्र भक्ति और संविधान का ज्वार उबाल खा रहा था। ऐसा लग रहा था मानो संविधान की हर लाइन उन्हें इंस्टाग्राम के फीचर्स से ज्यादा कंठस्थ हो।

समय की मांग है कि हम मानसिक दिवालियापन की हद पार करने वाले इस खतरनाक रील की डील से बचें। रील्स को सभ्य समाज अपने परिवार के साथ देख नहीं पा रहा है। स्टैंड अप कॉमेडी के रील वीर तो…एजेंडा सेटर्स को भी पहचानना होगा, वह भी रील के खेल के बड़े खिलाड़ी हैं। हमारे राष्ट्र भक्त नेताओं का तो कहना ही क्या… सियासत की प्रयोगशाला में रील वीर के फूल खूब पुष्पित और पल्लवित हो रहे हैं। नेता अब धरातल पर काम करने से ज्यादा सोशल मीडिया पर सक्रिय दिखने को प्राथमिकता दे रहे हैं। समस्या का समाधान करने से पहले उसका वीडियो बनाना जरूरी समझा जाता है। किसी गरीब को सहायता देने से पहले कैमरा ऑन होता है, जैसे सेवा नहीं, बल्कि प्रदर्शन हो रहा हो। राजनीति का उद्देश्य जनसेवा से अधिक जनदर्शन बनता जा रहा है।

सरकार के कर्मचारियों में भी 'सेलिब्रिटी या इंफ्लूंएसर बनने का रोग' तेजी से फैल रहा है। सरकारी सेवा में लगे अधिकारियों के दायित्वों के सफल निष्पादन का मापक अब जनसंतोष नहीं रील के व्यू हो गए हैं। अधिकारी अब दायित्वों से ज्यादा अपने फॉलोअर्स, लाइक्स और व्यूज की चिंता करते दिखाई देते हैं। कार्यालय की गरिमा, गोपनीयता और मर्यादा को ताक पर रखकर वीडियो बनाना एक फैशन बनता जा रहा है। यह केवल अनुशासनहीनता नहीं, बल्कि व्यवस्था की आत्मा पर चोट है।

युवा की ऊर्जा, रचनात्मकता और समय सही दिशा में जाए तो परिणाम सुखद ही आते हैं लेकिन दुर्भाग्य से उनका बड़ा हिस्सा रील बनाने, ट्रेंड फॉलो करने और आभासी प्रसिद्धि की दौड़ में उलझा हुआ है। पढ़ाई, कौशल विकास, सामाजिक सेवा और नवाचार की जगह वे घंटों मोबाइल स्क्रीन पर कई किलोमीटर रील दौड़ा रहे हैं। मनोरंजन अच्छी बात है पर किस कीमत पर? सोशल मीडिया बुरा नहीं है। समस्या इसके अंधाधुंध और गलत उपयोग की है। सोशल मीडिया जागरूकता फैलाने, शिक्षा देने, सामाजिक आंदोलनों को गति देने और सकारात्मक संवाद के लिए एक सशक्त माध्यम हो सकता है।

रील बनाना आत्म-अभिव्यक्ति के लिए अच्छी बात है, लेकिन जब इसका उद्देश्य केवल दिखावे और सस्ती लोकप्रियता तक सिमट जाए तो यह सृजन और सशक्तीकरण के मूल भाव को कमजोर करता है। मेराज फै•ााबादी ने खूब कहा है-शोहरत की भूख हमको कहां ले के आ गई, हम मोहतरम हुए भी तो किरदार बेचकर…आभासी दुनिया से बाहर निकलकर सबको अपना किरदार पहचानना चाहिए। उसी के अनुसार व्यवहार करना चाहिए। समाज और देश को रील नहीं, रियल लोग चाहिए। ऐसे लोग, जो देश की सेवा करें, समस्याओं को समझें और समाधान के लिए संवाद करें। संवाद ऐसा हो जो बदलाव लाए, केवल हल्की छिछोरी वाहवाही बटोरने की ललक छोडऩी होगी। लक्ष्य तप और तपस्या से ही प्राप्त होता है। लाइक से ज्यादा लाइफ बेहतर बने, इस पर फोकस करना चाहिए।

sandeep.purohit@epatrika.com