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नागौर में पर्यावरण संरक्षण सिर्फ फाइलों तक सीमित, हकीकत में धुएं और कचरे का साम्राज्य

मानसून सीजन में पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रभारी मंत्री की ओर से लगाए गए पौधे सूखे, प्रशासनिक लापरवाही से जनता की सेहत और प्रकृति दोनों खतरे में

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शहर के बालवा रोड स्थित डम्पिंग यार्ड में डाले जा रहे कचरे का लम्बे समय से निस्तारण नहीं होने से पहाड़ बन गए हैं

शहर के बालवा रोड स्थित डम्पिंग यार्ड में डाले जा रहे कचरे का लम्बे समय से निस्तारण नहीं होने से पहाड़ बन गए हैं

नागौर. एक ओर सरकार पर्यावरण संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण और हरियाली बढ़ाने के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर नागौर जिले में ये दावे जमीनी हकीकत से कोसों दूर नजर आ रहे हैं। शहर के बालवा रोड स्थित डम्पिंग यार्ड में डाले जा रहे कचरे का लम्बे समय से निस्तारण नहीं होने से पहाड़ बन गए हैं और ठेकेदार की ओर से खुलेआम कचरा जलाया जा रहा है, जिससे जहरीला धुआं आसपास के इलाकों में फैल रहा है। यह सब कुछ जिला स्तरीय अधिकारियों की नाक के नीचे हो रहा है, लेकिन जिम्मेदार आंखें मूंदे बैठे हैं।

बालवा, सलेऊ व डॉ. भीमराव अम्बेडकर हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी के निवासियों का कहना है कि डम्पिंग यार्ड में रोजाना नागौर शहर का 40 से 50 टन सूखा व गीला कचरा लाकर डाला जाता है और उसे निस्तारण के नाम पर आग के हवाले कर दिया जाता है। प्लास्टिक, पॉलीथिन, मेडिकल व घरेलू कचरे के जलने से उठने वाला धुआं न सिर्फ पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहा है, बल्कि आसपास के ग्रामीणों एवं शहरवासियों के साथ स्कूल व कॉलेज के विद्यार्थियों के स्वास्थ्य पर भी गंभीर असर डाल रहा है। सांस की बीमारियां, आंखों में जलन और एलर्जी जैसी समस्याएं बढ़ती जा रही हैं, लेकिन प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और जिला प्रशासन की चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है।

सिटी पार्क में प्रभारी का लगाया पौधा जला

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि गत वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस पर 5 जून को पर्यावरण संरक्षण का ढोल पीटते हुए प्रभारी मंत्री कन्हैयालाल चौधरी सहित जिले के भाजपा नेताओं की ओर से लगाया गया पीपल का पौधा महज दो महीने में ही सूख गया। पौधरोपण के समय फोटो खिंचवाकर और सोशल मीडिया पर प्रचार कर इसे बड़ी उपलब्धि बताया गया, लेकिन पौधों की देखरेख और संरक्षण की जिम्मेदारी किसी ने नहीं ली। नतीजा यह हुआ कि हरियाली के नाम पर लगाए गए पौधे अब सूखकर नष्ट हो चुके हैं। सरकार की ‘एक पेड़ मां के नाम’ और ‘एक पेड़ देश के नाम’ जैसी योजनाएं भी नागौर में सिर्फ बजट खर्च करने और कागजी खानापूर्ति तक सीमित नजर आ रही हैं। हर साल लाखों रुपए पौधरोपण पर खर्च दिखा दिए जाते हैं, लेकिन न तो पौधों का सर्वाइवल रेट देखा जाता है और न ही उनकी निगरानी की जाती है। सवाल यह है कि क्या ये योजनाएं वास्तव में पर्यावरण बचाने के लिए हैं या सिर्फ सरकारी रिकॉर्ड सजाने के लिए?

गंभीर प्रदूषण संकट की चपेट में आ सकता है नागौर

पर्यावरण प्रेमी पद्मश्री हिम्मताराम भांभू का कहना है कि यदि समय रहते कचरा जलाने पर रोक नहीं लगाई गई और वैज्ञानिक तरीके से कचरा प्रबंधन नहीं किया गया, तो आने वाले समय में नागौर गंभीर प्रदूषण संकट की चपेट में आ सकता है। इसके बावजूद स्थानीय निकाय विभाग (डीएलबी) और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की निष्क्रियता यह संकेत देती है कि पर्यावरण संरक्षण उनकी प्राथमिकता में कहीं नहीं है।

ठेकेदार को दे चुके 9 नोटिस, फिर भी जूं तक नहीं रेंगी

नागौर शहर से निकलने वाले कचरे का निस्तारण करने के लिए बालवा रोड डम्पिंग यार्ड में डेढ़ हैक्टेयर जमीन पर आरडीएफ व कंपोस्ट प्लांट तैयार करने के लिए 28 अगस्त 2023 को डीएलबी ने कार्यादेश जारी किए। 26 अक्टूबर 2023 को नगर परिषद ने ठेकेदार को प्लांट बनाने के लिए डेढ़ हैक्टेयर जमीन दे दी। इसके हिसाब से ठेकेदार को मार्च 2025 तक सॉलिड वेस्ट प्लांट का काम पूरा करना था। इसके बाद 3 मई 2024 को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से सीटीई (स्थापित करने की सहमति) जारी होने के बाद ठेकेदार ने काम शुरू किया। यदि सीटीई जारी करने की दिनांक से भी जोड़ा जाए तो 18 महीने में यानी दिसम्बर 2025 तक ठेकेदार को प्लांट का काम पूरा करना था, लेकिन 30 प्रतिशत कार्य करने के बाद काम बंद कर दिया। नगर परिषद की ओर से ठेकेदार को 9 नोटिस दिए जा चुके हैं, इसके बावजूद काम बंद है। ठेका डीएलबी निदेशालय स्तर से हुआ है, इसलिए स्थानीय अधिकारी निरस्त करने के लिए भी अधिकृत नहीं हैं। डीएलबी निदेशक की उदासीनता का खमियाजा नागौर के लोगों को भुगतना पड़ रहा है। गौरतलब है कि प्लांट शुरू होने के बाद ठेकेदार को आगामी 20 साल तक रखरखाव व संचालन करना होगा।

जानिए, क्या है आरडीएफ और कंपोस्ट प्लांट

आरडीएफ यानी अपशिष्ट व्युत्पन्न ईंधन, जो घरेलू और व्यावसायिक कचरे से बनाया जाता है। इसमें बायोडिग्रेडेबल सामग्री और प्लास्टिक होता है। कांच और धातु जैसी गैर-दहनशील सामग्री को हटाकर बाकी सामग्री को काटा जाता है। आरडीएफ को सीमेंट फैक्टरियों में भेजा जाता है। कंपोस्टिंग, इसमें पौधों और जानवरों के अपशिष्ट पदार्थों को सड़ाकर खाद में बदलने की प्रक्रिया है।

ठेकेदार को 9 नोटिस दे चुके

बालवा रोड डम्पिंग यार्ड में डेढ़ हैक्टेयर जमीन पर आरडीएफ व कंपोस्ट प्लांट तैयार करने वाले संवेदक को काम में देरी करने पर अब तक 9 बार नोटिस दे चुके हैं। साथ ही निदेशालय स्तर पर अवगत कराया गया है।

- मनीष बिजारणिया, सहायक अभियंता, नगर परिषद, नागौर