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दूसरी शादी के बाद भी विधवा महिला पारिवारिक पेंशन की हकदार? दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को सुनाया फैसला

Family Pension Verdict: दिल्ली हाई कोर्ट में पारिवारिक पेंशन से जुड़े एक मामले की सुनवाई हुई। इस मामले में पेंशन से जुड़े नियमों पर हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर

Family Pension Verdict:दिल्ली हाईकोर्ट में पारिवारिक पेंशन से संबंधित एक केस की सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान मृत कर्मचारी के बाद मिलने वाली पेंशन को लेकर बहस हुई। इस केस की सुनवाई जस्टिस अनिल क्षत्रपाल और अमित महाजन की बेंच ने की। इस मामले में पेंशन से जुड़े नियमों को लेकर सवाल खड़े हुए, साथ ही यह भी चर्चा हुई कि परिवार की जिम्मेदारी किसकी बनती है और आश्रितों का हक क्या है। कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान साफ किया गया कि पारिवारिक पेंशन आखिर किस लिए दी जाती है और किन हालात में यह किसे मिलनी चाहिए।

क्या था मामला?

यह पूरा मामला केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के एक जवान से जुड़ा था, जिनकी ड्यूटी के दौरान मौत हो गई थी। उनकी मौत होने के बाद उनकी पत्नी को तय नियमों के तहत पारिवारिक पेंशन मिल रही थी। कुछ समय बाद महिला ने दूसरी शादी कर ली। महिला के दूसरी शादी होने पर मृत जवान के माता-पिता ने कोर्ट में दावा किया कि पुनर्विवाह के बाद महिला अब पेंशन की हकदार नहीं है, इसलिए महिला को पेंशन नहीं दी जानी चाहिए। इसी विवाद के चलते मामला दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा।

माता-पिता के तर्क

हाईकोर्ट में माता-पिता ने अपनी बात सामने रखते हुए कहा कि वह पूरी तरह से अपने बेटे पर निर्भर थे। उनका कहना था कि बहू के दोबारा शादी कर लेने के बाद अब उन्हें ही पारिवारिक पेंशन मिलनी चाहिए। इसी बात को लेकर उन्होंने दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और पेंशन से जुड़े नियमों पर सवाल उठाए। शहीद सैनिक के माता-पिता का कहना था कि पुनर्विवाह के बाद बहू का अपने दिवंगत पति से रिश्ता अपने-आप खत्म हो जाता है, इसलिए उसे पेंशन देना सही नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि इस व्यवस्था की वजह से बुजुर्ग माता-पिता को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ रहा है। उनके अनुसार यह नियम ठीक नहीं है और बराबरी के सिद्धांतों के अनुसार भी नहीं है। इसी आधार पर उन्होंने केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियम 1972 के नियम 54 और 2009 के कार्यालय ज्ञापन को मनमाना और असंवैधानिक बताते हुए चुनौती दी।

हाईकोर्ट का स्पष्ट रुख

दिल्ली हाईकोर्ट ने जवान के माता-पिता की तरफ से सभी दलीलों को मानने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि पारिवारिक पेंशन कोई पुश्तैनी हक या संपत्ति नहीं है, बल्कि यह सरकार की तरफ से दी जाने वाली एक सामाजिक सुरक्षा सुविधा है। अदालत ने कहा कि नियम में पहले से तय है कि पेंशन किसे और किस तरह से दी जानी है। अगर किसी कर्मचारी के बाद उसकी पत्नी जीवित है तो वह ही पारिवारिक पेंशन की हकदार है, भले ही उसने दूसरी शादी कर ली हो। इस वजह से माता-पिता को पेंशन देने का सवाल ही नहीं उठता। कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकार का यह नियम पेंशन देने के साथ-साथ विधवाएं दोबारा शादी कर सकें और सम्मान के साथ जीवन जी सकें।

जवान के परिवार वालों को आर्थिक सहायता जरूरी

हाई कोर्ट ने कहा कि सेना और अर्धसैनिक बलों में तैनात जवान देश की सुरक्षा के लिए बड़ा बलिदान देते हैं, इसलिए उनके परिवार को आर्थिक परेशानी में नहीं छोड़ा जा सकता। कोर्ट ने साफ किया कि माता-पिता को पारिवारिक पेंशन तभी मिलती है जब मृत कर्मचारी के पीछे न तो पत्नी हो और न ही कोई संतान। अगर विधवा जीवित है और नियमों के अनुसार पेंशन की हकदार है, तो माता-पिता को पेंशन नहीं दी जा सकती है।