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छलकता दूध, भागते शेर और खुबानी का फसलचक्र दर्शा रहे बदलते जलवायु की कहानी

कड़वा होता अमृतः बीकानेर हाउस में सस्टेना प्रदर्शनी नई दिल्ली। दिल्ली एनसीआर की ट्रेनों में रोजाना हजारों लीटर दूध का सफर ग्रामीण और शहरी अर्थव्यवस्था के बीच एक तार को दर्शाती फिल्म। गिर के जंगलों से बाहर निकल चारों और बन गए आम के फार्म हाउसों के बीच सेंचुरी से बाहर पहियों पर सवार हो […]

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मारी वाड़ी मां- मृगेन राठौड़ का गिर के शेरों और आम की कहानी कहता स्कल्पचर

कड़वा होता अमृतः बीकानेर हाउस में सस्टेना प्रदर्शनी

नई दिल्ली। दिल्ली एनसीआर की ट्रेनों में रोजाना हजारों लीटर दूध का सफर ग्रामीण और शहरी अर्थव्यवस्था के बीच एक तार को दर्शाती फिल्म। गिर के जंगलों से बाहर निकल चारों और बन गए आम के फार्म हाउसों के बीच सेंचुरी से बाहर पहियों पर सवार हो भागते गिर के शेरों की स्कल्पचर इंस्टालेशन। लद्दाख के आसमानी रेगिस्तान में खुबानी का बीज से फल का सफर और असमय की बरसात व स्नोफॉल से बदलते मौसम का प्रदर्शन करता पजल खेल। बीकानेर हाउस में शुरू हुई सस्टेना कला प्रदर्शनी में ये तीनों प्रस्तुतियां प्रदर्शनी के शीर्षक, बिटर नेक्टर यानी कड़वा अमृत को रेखांकित कर बता रही हैं कि किस तरह से इंसान के कारण प्रकृति का अमृत कड़वा हो रहा है।

रिफ्रेमः अनुजा दासगुप्ता का लद्दाख में खुबानी के फसल चक्र को दर्शाता पजल गेम खेलते दर्शक

काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर और ठुकराल व टागरा की ओर से प्रस्तुत इस प्रदर्शनी में फल के विभिन्न चक्रों, खाद्य प्रणालियों और मौसम के आधार पर जलवायु परिवर्तन की पड़ताल की गई है। प्रदर्शनी 15 फरवरी तक चलेगी। गौरतलब है कि जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते तापमान और अनियमित बारिश से पूरे देश में खाद्य तंत्र में बदलाव हो रहे हैं। सीईईडब्ल्यू के एक शोध के अनुसार पिछले दशक में दक्षिण-पश्चिम मानसून में बारिश में कमी का सामना करने वाला प्रमुख क्षेत्र सिंधु-गंगा मैदान, पूर्वोत्तर भारत और ऊपरी हिमालय का है, जो कृषि के प्रमुख क्षेत्र हैं। प्रदर्शनी में तीन मुख्य फेलो कलाकारों के अलावा अभिनंद किशोर, लक्षिता मुंजाल, सिद्धांत कुमार, स्मिता मिंडा, हरमीत सिंह रतन, पूजा कलाइ और अंकुर यादव की कलाकृतियां भी प्रदर्शित हैं।

दूध का सफरः शहरों की जरुरत पूरी करता ग्रामीण भारत

वेदांत पाटिल की फिल्म, स्पीलेज टू स्पोइलेज दिल्ली व एनसीआर में दूध के परिवहन को बताती है। वे ग्रामीण से शहरी क्षेत्रों में दूध के नाजुक सफर और इसके पीछे के अदृश्य श्रम, बुनियादी ढांचे और पारिस्थितिकीय दबावों को सामने लाते हैं। गौरतलब है कि शहरी घरों में ग्रामीण घरों की तुलना में अब तीस प्रतिशत ज्यादा दूध की खपत होने लगी है।

पजल गेमः लद्दाख की पारिस्थितिक की पहेली

लद्दाख की रहने वाली अनुजा दासगुप्ता का रिफ्रेम एक हल्की लकड़ी से बने चौकोर बॉक्स का खेल है। इन चौकोर बॉक्स को जोड़ते जाने पर बड़ी तस्वीर बनती है। जिसमें खुबानी के फसल चक्र को दर्शाया गया है। पहाड़ी रेगिस्तान लद्दाख में खुबानी की फसल और बेमौसम की बारिश, बर्फबारी पूरे क्षेत्र की पारिस्थितिक तंत्र को उजागर करती है। इस तस्वीर में अधिक ऊंचाई पर रहने वाले समुदायों की एक-दूसरे पर निर्भरता, उनके मौसमी ज्ञान और जलवायु के प्रति उनकी जागरूकता को दर्शाती है।

इंसान-जानवर संघर्षः पहियों पर भागते गिर के शेर

प्रदर्शनी के मध्य में गुजरात में बड़ौदा मृगेन राठौड़ का एक बड़ा सा स्कल्पचर गिर के एशियाटिक शेरों और वहां उनकी बढ़ती संख्या के साथ ही वहां विकसित हो गए आम के फार्म हाउस को सहज ही उभार देता है। राठौड़ बताते हैं कि गिर में मारी वाड़ी मां से पर्यटकों का स्वागत होता है और वहां आम के फार्म हाउस विकसित हो गए हैं जहां पर्यटकों को गिर के शेर दिखाए जाते हैं। शेरों की संख्या बढ़ रही है और उनके विचरण का दायरा लगातार बढ़ रहा है। वे इसके जरिए आम के मोनोकल्चर, वन-पारिस्थितिकी तंत्रों और मानवों व पशुओं के विस्थापन की पड़ताल करते हैं।