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NCR में 672 फ्लैटों की बिक्री में बड़ा फर्जीवाड़ा…सीबीआई की जांच में सामने आया काला सच

Flats Sale Fraud in NCR: सीबीआई की चार्जशीट के अनुसार, बिल्डर कंपनी ने फ्लैट पर कब्जा देने के झूठे वादे किए और 672 फ्लैट बेच दिए। इसमें कई फ्लैट ऐसे हैं, जिन्हें दोबारा दूसरे लोगों के हाथ बेचा गया।

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flats sale Fraud in NCR Rouse Avenue Court notice to Rudra Buildwell Constructions Private Limited based on CBI

Flats Sale Fraud in NCR: दिल्ली से सटे राष्ट्री राजधानी क्षेत्र (NCR) में बिल्डर कंपनी का बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है। यह फर्जीवाड़ा सीबीआई ने अपनी लंबी जांच के बाद किया है। इसके लिए दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट में सीबीआई ने आरोपी बिल्डर के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की है, जिसमें घर खरीदारों के साथ बड़ी धोखाधड़ी का खुलासा किया गया है। लंबी जांच प्रक्रिया के बाद अब सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (CBI) ने रियल एस्टेट कंपनी रुद्रा बिल्डवेल कंस्ट्रक्शंस प्राइवेट लिमिटेड और उसके निदेशकों के खिलाफ चार्जशीट दायर की है। यह मामला तथाकथित 'बिल्डर-बैंक नेक्सस केस' से जुड़ा है, जिसमें बड़े बैंकों और बिल्डरों के बीच मिलीभगत के आरोप हैं।

सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में क्या बताया?

दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट में दाखिल की गई चार्जशीट में CBI ने बताया कि रुद्रा बिल्डवेल कंस्ट्रक्शंस प्राइवेट लिमिटेड कंपनी ने फ्लैट का पजेशन देने के झूठे वादे कर कुल 672 फ्लैट बेचे, जिनमें कई फ्लैट पहले से बेचे जा चुके थे। आरोपी बिल्डर ने उन फ्लैटों को दोबारा बेच दिया। सीबीआई का आरोप ये भी है कि बिल्डर ने नए खरीदारों से फ्लैटों की पिछली बिक्री की जानकारी जानबूझकर छिपाई। दूसरी ओर, पहले खरीदारों के फ्लैट बुकिंग कैंसिल होने के बाद भी रिफंड देने से इनकार कर दिया गया।

2012-13 में लॉन्च हुआ प्रोजेक्ट अधूरा मिला

CBI ने अपनी चार्जशीट में कहा है कि बिल्डर ने अपनी परियोजना पूरी नहीं की और खरीदारों को उनके पैसे भी वापस नहीं दिए। चार्जशीट में सीबीआई ने बताया है कि रुद्रा बिल्डवेल ने साल 2012-13 में नोएडा सेक्टर-16 में 'केबीनोव्स अपार्टमेंट्स' नामक प्रोजेक्ट लॉन्च किया था। जांच के दौरान पाया गया कि परियोजना के नाम पर सिर्फ बेसिक सिविल स्ट्रक्चर तैयार किया गया था। इसके तहत बनाए गए फ्लैट रहने योग्य नहीं थे। सीबीआई ने इस मामले में 27 जुलाई 2025 को एफआईआर दर्ज की थी और कंपनी तथा उसके निदेशकों पर आपराधिक साज़िश, धोखाधड़ी और बेईमानी से प्रॉपर्टी की डिलीवरी करवाने का आरोप लगाया है।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर CBI जांच

बिल्डर कंपनी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर शुरू हुई जांच में सीबीआई ने भारी अनियमितता पाई है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल 29 अप्रैल 2025 को CBI को तमाम शिकायतें मिलने के बाद बिल्डर कंपनी के खिलाफ जांच का आदेश दिया था। सुप्रीम कोर्ट को नोएडा, ग्रेटर नोएडा, यमुना एक्सप्रेसवे, गुरुग्राम और गाजियाबाद में हाउसिंग प्रोजेक्ट्स के संबंध में बिल्डरों और बड़े बैंकों के बीच मिलीभगत के संकेत मिले थे। इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट में तकरीबन 1,200 से अधिक होमबायर्स ने याचिका दायर की थी। इन होमबायर्स ने सबवेंशन स्कीम के तहत फ्लैट बुक किए थे। होमबायर्स का आरोप था कि उन्हें पजेशन नहीं मिला, लेकिन बैंक उनसे EMI चुकाने का दबाव डाल रहे थे।

28 मामलों में जांच, 3 में चार्जशीट

CBI ने 20 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उसने बिल्डर-बैंक मिलीभगत के 28 मामलों में से तीन मामलों में चार्जशीट दायर कर दी है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को चार्जशीट पर संज्ञान लेने का निर्देश दिया।
दिल्ली की एक मजिस्ट्रेट कोर्ट ने 27 जनवरी 2026 को चार्जशीट पर संज्ञान लिया। हालांकि पहले 14 मार्च 2022 को परेशान होम बायर्स ने दिल्ली हाई कोर्ट में शिकायतें दर्ज कराई थीं, लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट ने उनकी याचिकाएं यह कहते हुए खारिज कर दी थीं कि उनके पास RERA के सामने वैकल्पिक उपाय मौजूद है। इसके बाद होम बायर्स सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे।

फ्लैट पहले बेचा, फिर दोबारा बेचा गया

चार्जशीट में सामने आया कि शिकायतकर्ता नूपुर चौरसिया ने बिल्डर को 9.45 लाख रुपये दिए और सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, गाजियाबाद से 35 लाख रुपये का होम लोन लिया। लोन जून 2020 में मंजूर हुआ और इसके बाद चौरसिया, बिल्डर और बैंक के बीच सबवेंशन स्कीम के तहत त्रिपक्षीय समझौता हुआ। इसमें तय हुआ था कि चौरसिया को पज़ेशन मिलने तक कोई प्री-EMI नहीं देनी होगी, और पज़ेशन बुकिंग की तारीख से छह महीने के भीतर देने का वादा किया गया था। लेकिन CBI की जांच में खुलासा हुआ कि वही फ्लैट 2017 में मोहम्मद एहतेशाम को 42 लाख रुपये में बेचा जा चुका था, और उनके लोन अकाउंट के बावजूद फ्लैट को चौरसिया को दोबारा बेच दिया गया।

पहले खरीदार को भी नुकसान

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में बताया कि त्रिपक्षीय समझौते का उल्लंघन करते हुए चौरसिया से पिछली बिक्री की जानकारी जानबूझकर छिपाई गई। दूसरी ओर, फ्लैट न मिलने पर नवंबर 2019 में एहतेशाम ने बिक्री रद्द करने की मांग की। बिल्डर ने उन्हें भरोसा दिया था कि कंपनी सभी बकाया राशि के लिए जिम्मेदार होगी। हालांकि, CBI के अनुसार, एहतेशाम का होम लोन अकाउंट बंद नहीं किया गया और उन्हें अंततः 8 लाख रुपये अपनी जेब से चुकाने पड़े।

कोर्ट की टिप्पणी और समन

राउज़ एवेन्यू कोर्ट की एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ज्योति माहेश्वरी ने चार्जशीट पर संज्ञान लेते हुए कहा कि आरोपी ने चौरसिया के साथ सीधे बातचीत की और यह जानते हुए भी कि फ्लैट पहले ही बेचा जा चुका था, धोखे की नीयत से यह जानकारी छिपाई। कोर्ट ने कहा कि आरोपी ने सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया को गलत जानकारी देकर यह दिखाया कि फ्लैट किसी भी प्रकार के बोझ से मुक्त है, ताकि बैंक होम लोन मंजूर कर सके। कोर्ट ने कंपनी और उसके तत्कालीन निदेशक राज कुमार और मंजू राम को 12 फरवरी 2026 को अदालत में पेश होने के लिए समन जारी किया है।