
PM Modi degree controversy: देश के वर्तमान प्रधानंत्री नरेंद्र मोदी की शैक्षणिक डिग्री को सार्वजनिक करने वाले मामले पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि इसका उद्देश्य केवल मामले को सनसनीखेज बनाना है। वहीं, अपीलकर्ताओं की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत ने कहा कि यदि सॉलिसिटर जनरल मामले के मेरिट पर बहस करने को तैयार हैं, तो अदालत नोटिस जारी कर सकती है। उन्होंने अपील दाखिल करने में हुई देरी को मामूली बताते हुए इसे माफ किए जाने की मांग की। अब इस मामले की अगली सुनवाई 27 अप्रैल को होगी।
आपको बता दें कि पीएम मोदी की शैक्षणिक डिग्री को सार्वजनिक करने के लिए याचिका दायर की गई थी, जिस पर मंगलवार को सुनवाई की गई। डीयू की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में कहा कि यह याचिका केवल सनसनी फैलाने के इरादे से दायर की गई है और इसमें कोई ठोस तथ्य नहीं है। उन्होंने अपील दायर करने में हुई देरी और मामले के गुण-दोष दोनों पर जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा। वहीं, अपीलकर्ताओं की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत ने कहा कि यदि सॉलिसिटर जनरल मामले के मेरिट पर बहस करने को तैयार हैं, तो अदालत नोटिस जारी कर सकती है। उन्होंने अपील दाखिल करने में हुई देरी को मामूली बताते हुए इसे माफ किए जाने की मांग की।
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल मेहता ने नोटिस जारी करने पर कड़ा एतराज जताते हुए कहा कि वह पहले से ही अदालत के समक्ष उपस्थित हैं और ऐसे में केवल सनसनी फैलाने के उद्देश्य से नोटिस जारी करना उचित नहीं है। उन्होंने दलील दी कि किसी मामले को अनावश्यक रूप से सुर्खियों में लाने के लिए नोटिस नहीं दिया जाना चाहिए। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की पीठ ने दिल्ली विश्वविद्यालय को देरी माफी से संबंधित याचिकाओं पर अपनी आपत्तियां दाखिल करने के लिए तीन सप्ताह का समय प्रदान किया। मामले की अगली सुनवाई 27 अप्रैल के लिए निर्धारित की गई है।
इस मामले में आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह, आरटीआई कार्यकर्ता नीरज शर्मा और अधिवक्ता मोहम्मद इरशाद की ओर से याचिकाएं दाखिल की गई हैं। ये याचिकाएं 25 अगस्त 2024 को एकल न्यायाधीश द्वारा दिए गए उस फैसले को चुनौती देती हैं, जिसमें प्रधानमंत्री की शैक्षणिक डिग्री से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक करने वाले केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) के वर्ष 2016 के आदेश को रद्द कर दिया गया था। अपने फैसले में एकल न्यायाधीश ने कहा था कि डिग्री और मार्कशीट जैसे शैक्षणिक दस्तावेज आरटीआई अधिनियम के तहत व्यक्तिगत जानकारी माने जाते हैं और इन्हें केवल तभी सार्वजनिक किया जा सकता है, जब इसके पीछे किसी बड़े सार्वजनिक हित का स्पष्ट आधार हो।
Published on:
10 Feb 2026 07:08 pm
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