
वंदे मातरम् (AI Generated Image)
Vande Mataram: वंदे मातरम् भारत का राष्ट्रीय गीत है, जिसकी रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय (चटर्जी) ने की थी। यह गीत उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल है। साल 1896 में कोलकाता में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे पहली बार गाया था। 1905 में बंगाल विभाजन के दौरान यह गीत जन-जन की आवाज बन गया और स्वतंत्रता संग्राम में जोश और देशभक्ति का प्रतीक बना। वंदे मातरम् मातृभूमि के प्रति सम्मान और आजादी की भावना को व्यक्त करता है। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने इसे राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के बराबर सम्मान प्रदान किया।
यहां पढ़ें- वंदे मातरम् और उसका हिंदी भावानुवाद।
वन्दे मातरम्!
सुजलाम्, सुफलाम्, मलयजशीतलाम्,
शस्यश्यामलाम्, मातरम्!
वन्दे मातरम्!
शुभ्रज्योत्स्नापुलकितयामिनीम्,
फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनीम्,
सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम्,
सुखदां वरदां मातरम्!
वन्दे मातरम्!
कोटि-कोटि-कण्ठ-कल-कल-निनाद-कराले,
कोटि-कोटि-भुजैर्धृत-खरकरवाले,
अबला केन मा एत बले?
बहुबलधारिणीं नमामि तारिणीं,
रिपुदलवारिणीं मातरम्!
वन्दे मातरम्!
तुमि विद्या, तुमि धर्म,
तुमि हृदि, तुमि मर्म,
त्वं हि प्राणा: शरीरे!
बाहुते तुमि मा शक्ति,
हृदये तुमि मा भक्ति,
तोमारई प्रतिमा गडि मन्दिरे-मन्दिरे!
वन्दे मातरम्!
त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी,
कमला कमलदलविहारिणी,
वाणी विद्यादायिनी,
नमामि त्वाम्!
नमामि कमलाम्, अमलाम्, अतुलाम्,
सुजलाम्, सुफलाम्, मातरम्!
वन्दे मातरम्!
श्यामलाम्, सरलाम्, सुस्मिताम्, भूषिताम्,
धरणीं, भरणीं, मातरम्!
वन्दे मातरम्!
मैं उस मातृभूमि को प्रणाम करता हूं,
जो जल से परिपूर्ण है, फल-फूल से भरी है,
जिसकी हवा चंदन-सी शीतल है,
जिसके खेत हरियाली से लहलहाते हैं।
वन्दे मातरम्!
मैं उस मां को नमन करता हूं,
जो चांदनी रात की तरह उज्ज्वल और शान्त है,
जिसके वृक्ष फूलों से सजे हैं,
जो सदा मुस्कुराती है, मधुर वाणी बोलती है,
जो सुख और वरदान देने वाली है।
वन्दे मातरम्!
जिसके करोड़ों कंठों से गर्जना उठती है,
जिसके करोड़ों भुजाएं शत्रुओं को रोकने में सक्षम हैं,
फिर भी वह सरल और कोमल दिखाई देती है—
ऐसी अपार शक्ति से युक्त मां को मैं नमन करता हूं,
जो संकट से उबारने वाली और शत्रुओं का नाश करने वाली है।
वन्दे मातरम्!
तू ही विद्या है, तू ही धर्म है,
तू ही हृदय है, तू ही आत्मा का रहस्य है,
तेरे बिना शरीर में प्राण नहीं टिकते।
भुजाओं में तू शक्ति बनकर बसती है,
हृदय में तू भक्ति बनकर निवास करती है,
हर मंदिर में तेरी ही प्रतिमा गढ़ी जाती है।
वन्दे मातरम्!
तू ही दुर्गा है—दसों दिशाओं में शस्त्र धारण करने वाली,
तू ही लक्ष्मी है—कमल पर विराजमान,
तू ही सरस्वती है—ज्ञान देने वाली।
मैं तुझे नमन करता हूं—
पवित्र, उज्ज्वल, अतुलनीय,
जल और फल से समृद्ध मातृभूमि को।
वन्दे मातरम्!
श्यामल, सरल, सदा मुस्कुराती और सुशोभित,
धरती को धारण करने वाली,
सबका पालन-पोषण करने वाली माँ को नमन।
वन्दे मातरम्!
Published on:
11 Feb 2026 11:18 am
