
छत्तीसगढ़ में पिछले पांच वर्षों में सड़कों पर मवेशियों की वजह से 400 से अधिक लोगों की मौतों का आंकड़ा राजमार्गों पर लगे उस बोर्ड के कारण ज्यादा दुख पहुंचाता है, जिस पर सुरक्षित और मंगलमय यात्रा की बात लिखी हुई है।क्योंकि सिर्फ सुरक्षित यात्रा की कामना करने भर से जिंदगी सुरक्षित नहीं हो जाती है, बल्कि यात्रा मार्ग को भी सुरक्षित करना होता है। सरकारों ने अधिकतर प्रमुख सड़क मार्गों को तो अच्छा कर दिया है, लेकिन उन सड़कों पर मवेशियों की 'बैठकों' को रोकने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए हैं।
सड़कों पर मवेशियों की वजह से रोजाना दुर्घटनाएं हो रही हैं। इससे जान-माल का भी नुकसान हो रहा है। सड़कों को मवेशी मुक्त करने के लिए निचले कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने कई बार दिशा-निर्देश दिए हैं। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट कई बार इसके जिम्मेदारों को फटकार भी लगा चुके हैं।
हाईकोर्ट ने निर्देश दिए थे कि भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) के परियोजना निदेशक एनएचएआई द्वारा उठाए गए कदमों पर कोर्ट के समक्ष व्यक्तिगत हलफनामा दायर करें। राज्य सरकार के साथ मिलकर संयुक्त कार्यवाही में एनएच की सड़कों को पशु विचरण क्षेत्र मुक्त करें। हद तो तब हो गई जब एनएचएआई ने मवेशी मुक्त सड़क करने की बजाय 'पशु दुर्घटना संभावित क्षेत्र' के बोर्ड लगाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली।
वहीं, पिछले साल जुलाई में प्रदेश के मुखिया ने मवेशियों की वजह से बढ़ती सड़क दुर्घटनाओं और मौतों पर चिंता जाहिर करते हुए यात्रा को सुरक्षित और सड़कों को मवेशी मुक्त करने की जिम्मेदारी चार विभागों- लोक निर्माण विभाग, नगरीय प्रशासन विभाग, पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग, पशुधन विकास विभाग- को सौंपी थी। इन सब कवायद के बावजूद 'भैंस के आगे बीन बजाए, भैंस खड़ीपगुराय' (इसे कहावत के अर्थ में ना लेकर शब्दार्थ में ही लेवें) की स्थिति ही है, यानी कि सड़कों पर मवेशी राज कायम है। -अनुपम राजीव राजवैद्य anupam.rajiv@in.patrika.com
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Published on:
30 Jan 2026 02:21 am
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