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बजट 2026: सावधानी व व्यावहारिकता का भाव

खर्च की दिशा में बजट ने पूंजीगत निवेश पर जोर कायम रखा है। बुनियादी ढांचे पर खर्च बढ़ाकर 12.2 लाख करोड़ रुपए करने का प्रस्ताव है, जो विकास के लिहाज से जरूरी है, बशर्ते यह उच्च गुणवत्ता का हो और निजी निवेश को पीछे न धकेले। सेवाओं के क्षेत्र में भी भारत की वैश्विक हिस्सेदारी 10 प्रतिशत तक ले जाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा गया है। एमएसएमई पर फोकस भी खास महत्व रखता है।

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अजीत रानाडे, वरिष्ठ अर्थशास्त्री

आज भारत की अर्थव्यवस्था की बाहरी तस्वीर आश्वस्ति प्रदान करने वाली दिखाई देती है। तिमाही आधार पर विकास दर मजबूत बनी हुई है, महंगाई काबू में है, बैंकों के मुनाफे बेहतर हुए हैं और एनपीए में भी कमी आई है। लंबे समय तक कर्ज घटाने के बाद कंपनियों की माली हालत में भी सुधार है। लेकिन यही सतही शांति दरअसल सतर्क रहने का संकेत देती है। इसी कारण केंद्रीय बजट को किसी उत्सव की तरह नहीं, बल्कि एक कड़ी परीक्षा के रूप में देखना जरूरी है। क्योंकि यह ‘सब कुछ ठीक-ठाक’ वाली स्थिति पूरी तरह स्थायी नहीं है।
दरअसल यह ‘गोल्डीलॉक्स’ चमक शर्तों पर टिकी है। विकास की रफ्तार का बड़ा सहारा केंद्र सरकार का भारी पूंजीगत खर्च रहा है। यह इंजन हमेशा के लिए नहीं चल सकता, क्योंकि इससे कर्ज पर दबाव बढ़ता है। दूसरी ओर, कम महंगाई का एक कारण खाद्य पदार्थों के दामों में गिरावट भी है, जो लंबे समय तक बनी रहे, यह जरूरी नहीं। बजट-पूर्व संकेत भी चेताते हैं कि वित्त वर्ष 2026 के अप्रैल से दिसंबर के बीच देश के आठ प्रमुख उद्योगों का उत्पादन साल भर पहले की तुलना में सिर्फ 2.6 प्रतिशत ही बढ़ पाया, जो अर्थव्यवस्था की अंदरूनी कमजोरी की ओर इशारा करता है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लगातार नौवां बजट इस मूल भाव के साथ पेश किया—सावधानी के साथ व्यावहारिक फैसले। यानी सरकारी खर्च और घाटे को तय रास्ते पर बनाए रखते हुए अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने व विकास क्षमता बढ़ाने की दिशा में हल्का-सा धक्का देने की कोशिश।
सबसे पहले आंकड़ों पर नजर डालें। सरकार ने कुल खर्च 53.5 लाख करोड़ रुपए रखने का प्रस्ताव किया है, जो पिछले संशोधित अनुमान से करीब 7.7 प्रतिशत ज्यादा है। वहीं उधारी को छोडक़र सरकार की आमदनी 36.5 लाख करोड़ रुपए रहने का अनुमान है, जो 7.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी दिखाता है राजकोषीय घाटा जीडीपी का 4.3 प्रतिशत तक सीमित रखने का लक्ष्य रखा गया है, जो 4.5 प्रतिशत से नीचे रहने के वादे के अनुरूप है। यह संयम इसलिए जरूरी है, क्योंकि आज की दुनिया में हालात अचानक बदल सकते हैं। विदेश से पैसा जुटाना कभी भी महंगा हो सकता है और किसी देश की साख पर जरा-सी आंच भी विदेशी पूंजी की लागत बढ़ा देती है। लेकिन सरकार के लिए पैसा जुटाने का माहौल सहज नहीं है। इस साल केंद्र सरकार ने करीब 17.2 लाख करोड़ रुपए उधार लेने की योजना बनाई है और राज्यों की उधारी अलग से 12.6 लाख करोड़ है—दोनों मिलकर बॉन्ड बाजार पर भारी दबाव डालते हैं। इसीलिए रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरें नरम किए जाने के बावजूद लंबे समय के सरकारी बॉन्डों पर ब्याज करीब 7 प्रतिशत पर अटका हुआ है। यह स्थिति निजी कंपनियों को नया निवेश करने से हतोत्साहित करती है। सरकारी राजस्व की बढ़त भी कमजोर है। अप्रैल-नवंबर में केंद्र सरकार का कर संग्रह सिर्फ 3.3 प्रतिशत बढ़ा, जबकि पूरे साल के लिए 10.8 प्रतिशत बढ़ोतरी का अनुमान था। अगर इस साल अर्थव्यवस्था की नाममात्र वृद्धि 8 प्रतिशत के आसपास ही रहती है या लोगों का खर्च कमजोर बना रहता है, तो राजकोषीय गणित संभालना कठिन होगा। तब विकास को सहारा दे रहे उसी पूंजीगत खर्च में कटौती का दबाव बन सकता है।
इसी बीच प्रतिभूति लेन-देन कर (एसटीटी) में किया गया हल्का बदलाव भी इसी वजह से था—सरकार को कुछ अतिरिक्त राजस्व मिले और शेयर बाजार के डेरिवेटिव कारोबार में जरूरत से ज्यादा सट्टेबाजी पर लगाम लगे। हालांकि इससे बाजारों में उथल-पुथल हुई, जिससे उबरने की उम्मीद है। खर्च के मोर्चे पर देखें तो बजट में पूंजीगत खर्च पर जोर बरकरार रखा गया है। बुनियादी ढांचे पर होने वाला सरकारी निवेश करीब 9 प्रतिशत बढ़ाकर 12.2 लाख करोड़ करने का प्रस्ताव है— बशर्ते यह उच्च-गुणवत्ता का हो और निजी निवेश को हाशिये पर न धकेले।
इसके साथ ही बजट ने सेवाओं के क्षेत्र में भारत की वैश्विक हिस्सेदारी 10 प्रतिशत तक पहुंचाने का बड़ा लक्ष्य रखा है। यह लक्ष्य केवल सॉफ्टवेयर तक सीमित नहीं है, बल्कि कंटेंट निर्माण, डिजाइन, स्वास्थ्य, पर्यटन तथा मेडिकल टूरिज्म को भी इसमें शामिल किया गया है। सेवाओं के इन क्षेत्रों में भारत को पहले से तुलनात्मक बढ़त हासिल है, पर बड़ी बढ़त के लिए कौशल-उत्पादकता में छलांग जरूरी होगी। यानी असली चुनौती है— बेहतर प्रशिक्षण और ज्यादा उत्पादक कामकाज। इसी सोच के तहत शिक्षा से रोजगार और उद्यमिता तक की पूरी कड़ी जोडऩे, औद्योगिक क्लस्टरों को प्रशिक्षण संस्थानों से जोडऩे और पुराने क्लस्टरों को पुनर्जीवित करने की बात कही गई है। मसलन, वस्त्र और चमड़ा जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षण संस्थानों को उसी क्षेत्र के औद्योगिक क्लस्टरों से जोड़ा जाएगा। साथ ही देश भर में फैले 200 से अधिक पुराने औद्योगिक क्लस्टरों को फिर से सक्रिय करने की योजना है। इससे रोजगार बढ़ाने में मदद मिलेगी, क्योंकि सप्लायर नेटवर्क, परिवहन व्यवस्था, गुणवत्ता मानक और कुशल श्रमिक—सभी एक साथ मजबूत होंगे।
छोटे और मझोले उद्योगों (एमएसएमई) पर बजट का ध्यान खास तौर पर सराहनीय है। समय पर भुगतान न मिलना और काम चलाने के लिए पूंजी की कमी छोटे कारोबारों को अंदर ही अंदर खत्म कर देने वाली समस्याएं हैं। टीआरईडीएस के जरिए बिल डिस्काउंटिंग को मजबूत करने जैसे कदम भले ही बहुत आकर्षक न लगें, लेकिन ऐसे ही सुधार छोटे उद्यमों को टिकाए रखते हैं और उन्हें औपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनाते हैं। फिर भी निजी निवेश वह कड़ी है, जो अब तक कमजोर बनी हुई है। यहीं बजट जीएसटी इनपुट टैक्स क्रेडिट जैसे एक सरल, लेकिन प्रभावी सुधार से चूक गया। पूंजीगत सामान पर टैक्स क्रेडिट का वर्षों तक फंसा रहना नई फैक्ट्रियां लगाने और क्षमता बढ़ाने के फैसलों को टाल देता है। यह सुधार निवेश की लागत घटा सकता था और निजी क्षेत्र को ठोस प्रोत्साहन दे सकता था। बजट का एक कमजोर पक्ष यह भी है कि इसमें वितरण के सवालों पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया है। ऊंची विकास दर और आर्थिक स्थिरता के साथ असमानता बढ़ सकती है, खासकर तब जब रोजगार सृजन धीमा हो। कृषि का हिस्सा घटने के बावजूद बड़ी आबादी का उसी पर निर्भर रहना इसी असंतुलन को दिखाता है। यदि इन मुद्दों को सीधे और साफ ढंग से नहीं साधा गया, तो आर्थिक आंकड़ों और नीतिगत दावों पर लोगों का भरोसा कमजोर पड़ सकता है। एक और चिंता घरेलू वित्तीय बचत की घटती हिस्सेदारी है। पेंशन, बीमा और दीर्घकालीन घरेलू पूंजी को मजबूत करना जरूरी है, ताकि विकास के लिए स्थायी संसाधन उपलब्ध हों। इस दिशा में वित्तीय क्षेत्र सुधारों के लिए उच्चस्तरीय समिति का प्रस्ताव सकारात्मक संकेत देता है। कुल मिलाकर यह बजट आत्ममुग्धता से परे संतुलित और समझदारी भरा कहा जा सकता है। इसमें राजकोषीय सतर्कता, पूंजीगत खर्च और कौशल निर्माण पर ध्यान दिया गया है। लेकिन यदि भारत की विकास यात्रा को सरकार-केंद्रित मॉडल से निकालकर निजी निवेश आधारित बनाना है, तो आगे का रास्ता बड़ी घोषणाओं से नहीं, बल्कि ऐसे शांत और ठोस सुधारों से निकलेगा, जो निवेश के रास्ते खोलें, रोजगार की गुणवत्ता सुधारें और विकास के लाभ समाज के बड़े हिस्से तक पहुंचाएं। क्षमता निर्माण की इस सोच का मतलब यह भी होना चाहिए कि सरकार स्वास्थ्य, शिक्षा और शोध जैसे क्षेत्रों पर अपना खर्च ठोस रूप से बढ़ाए।