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संपादकीय: हिंसा की डरावनी तस्वीरों से निष्पक्ष चुनावों पर संदेह

यह स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक संकेत है। चिंता की बात यह भी है कि फरवरी में प्रस्तावित चुनावों तक बांग्लादेश में हिंसक घटनाओं के और बढऩे की आशंका जताई जा रही है।

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पक्षपात रहित और पारदर्शी प्रशासन के साथ-साथ मानवाधिकारों के प्रति प्रतिबद्धता ही किसी स्थिर व लोकतांत्रिक देश की नींव रख सकती है। पड़ोसी बांग्लादेश में स्थिति इसके ठीक विपरीत है। वहां हिन्दुओं के खिलाफ हिंसा और बर्बरता की घटनाएं चरम पर पहुंच गई हैं। अठारह दिन में ही छह हिन्दुओं की हत्या, उनके घरों व प्रतिष्ठानों पर हमले, मंदिरों में तोडफ़ोड़ और आम नागरिकों को निशाना बनाया जाना इस बात का संकेत है कि वहां अराजकता का माहौल है और कानून-व्यवस्था ठप हो गई है। इससे न केवल बांग्लादेश में आंतरिक सुरक्षा पर सवाल खड़े हो गए हैं, बल्कि वहां आने वाले चुनावों की निष्पक्षता को लेकर भी गहरा संदेह पैदा हो गया है।


बांग्लादेश ही नहीं, पड़ोसी देश पाकिस्तान भी राजनीतिक रूप से अस्थिर रहता आया है। चुनाव लोकतंत्र की आत्मा होते हैं। ऐसी स्थिति में जब समाज का एक वर्ग भय के साये में जीने को मजबूर हो, तब निष्पक्ष मतदान की कल्पना भी नहीं की जा सकती। यदि लोग अपनी जान-माल की सुरक्षा को लेकर आशंकित हैं, तो वे मतदान केंद्र तक पहुंचने का साहस नहीं कर पाएंगे। ऐसे में चुनाव केवल औपचारिकता बनकर रह जाएंगे। यह स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक संकेत है। चिंता की बात यह भी है कि फरवरी में प्रस्तावित चुनावों तक बांग्लादेश में हिंसक घटनाओं के और बढऩे की आशंका जताई जा रही है। साफ है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो यह स्थिति और विस्फोटक हो सकती है। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों और मानवाधिकार संगठनों की जिम्मेदारी बनती है कि वे समुचित दखल देकर सक्रिय भूमिका निभाएं। ऐसी स्थिति में केवल कूटनीतिक बयान या औपचारिक चिंता पर्याप्त नहीं है।

जरूरत इस बात की है कि अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों की देखरेख में वहां चुनाव संपन्न कराए जाएं, ताकि सभी नागरिक भयमुक्त वातावरण में मतदान कर सकें। इसी से लोकतंत्र पर भरोसा कायम रह सकेगा। अंतरिम सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी कानून व्यवस्था बहाल करना और दोषियों को सख्त सजा दिलाना होनी चाहिए। हिंसा के मामलों में निष्पक्ष जांच, जवाबदेही और पीडि़तों को न्याय मिलना अनिवार्य है। यदि राजनीतिक दबावों या वैचारिक पक्षपात के चलते अपराधियों को संरक्षण मिलता है, तो यह संदेश जाएगा कि कानून कमजोर है और हिंसा को मौन समर्थन प्राप्त है। यह स्थिति समाज में और अधिक असंतोष और अराजकता को जन्म दे सकती है।
बांग्लादेश को यह समझना होगा कि विविधता उसकी ताकत है, कमजोरी नहीं। सामाजिक एकजुटता, संवाद और पारस्परिक सम्मान ही लंबे समय तक शांति स्थापित कर सकते हैं। आज बांग्लादेश एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। यदि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा नहीं की गई, तो आने वाली पीढियां इसकी कीमत चुकाएंगी।