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संपादकीय: भ्रमजाल फैलाने से रोकेगी एआइ कंटेंट पर सख्ती

केंद्र सरकार ने एआइ जनित फर्जी फोटो वीडियो और डीपफेक पर रोक लगाने के लिए आइटी नियम 2021 में संशोधन किए हैं। 20 फरवरी से एआइ कंटेंट पर लेबल, स्थायी मेटाडेटा और डिजिटल पहचान अनिवार्य होगी। फेक कंटेंट हटाने की समय सीमा घटाकर तीन घंटे कर दी गई है।

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जयपुर

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ANUJ SHARMA

Feb 12, 2026

AI Generated Content Labeling, Deepfake Regulation India, AI Content Metadata Rules,

फर्जी फोटो-वीडियो और डीपफेक पर रोक लगाने के लिए आईटी नियम 2021 में संशोधन

पिछले कुछ वर्षों में कृत्रिम बुद्धिमता (एआइ) ने जहां रचनात्मकता और सूचना प्रसार को नई गति दी है, वहीं इसके दुरुपयोग ने भी गंभीर चिंता पैदा कर रखी है। डीपफेक वीडियो, फर्जी तस्वीरें और एआइ जनित भ्रामक सामग्री न केवल लोगों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा रही हैं, बल्कि साइबर ठगी और सामाजिक भ्रम का कारण भी बन रही हैं। इन खतरों को मध्य में रखकर केंद्र सरकार की ओर से सूचना प्रौद्योगिकी (आइटी) नियम, 2021 में किए गए हालिया संशोधन को डिजिटल दुनिया में बढ़ती चुनौतियों के बीच एक महत्वपूर्ण कदम कहा जा सकता है।

आगामी 20 फरवरी से लागू होने जा रहे इन नियमों के तहत अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआइ) से तैयार किए गए फोटो और वीडियो पर लेबल लगाना अनिवार्य होगा। इसके साथ ही फेक कंटेंट को हटाने की समय सीमा 36 घंटे से घटाकर तीन घंटे कर दी गई है। नए प्रावधानों के तहत एआइ कंटेंट में स्थायी मेटाडेटा और डिजिटल पहचान चिह्न जोड़ने की अनिवार्यता भी तय की गई है, ताकि ऐसे कंटेंट की पहचान आसानी से की जा सके। यह बदलाव डिजिटल पारदर्शिता और नागरिक सुरक्षा के लिहाज से बेहद अहम है। नए नियमों का सबसे सकारात्मक पहलू यह है कि अब एआइ से बने कंटेंट को छिपाना आसान नहीं रहेगा।

लेबलिंग व डिजिटल पहचान चिह्न से आम व्यक्ति यह समझ सकेगा कि उसके सामने मौजूद सामग्री वास्तविक है या तकनीक से तैयार की गई है। इससे सोशल मीडिया पर फैलने वाली अफवाहों और भ्रामक अभियानों पर भी अंकुश लगाने में मदद मिलेगी। चुनाव, सामाजिक मुद्दों और संवेदनशील घटनाओं के दौरान यह लोकतांत्रिक व्यवस्था को भी सुरक्षित रखने में सहायक होगी, ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए। इन तमाम बातों के बीच सवाल यह भी है कि सिर्फ नियम-कायदे बनाना ही काफी नहीं, बल्कि इन्हें सख्ती से लागू करना भी जरूरी है।

वैसे भी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की संख्या और कंटेंट की मात्रा इतनी अधिक है कि केवल नियमों के सहारे नियंत्रण करना आसान नहीं होगा। इसके लिए तकनीकी निगरानी तंत्र को मजबूत करना, प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही तय करना और उल्लंघन की स्थिति में त्वरित दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित करना आवश्यक है। क्योंकि यदि नियमों का पालन ढीला रहा, तो इनका उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।

इसके साथ ही नागरिकों में डिजिटल साक्षरता बढ़ाना भी उतना ही जरूरी है। लोगों को यह समझना होगा कि हर वायरल वीडियो या तस्वीर सत्य नहीं होती। जागरूक उपयोगकर्ता ही फेक कंटेंट की शृंखला को तोड़ सकता है। सरकार, सोशल मीडिया कंपनियों और शैक्षणिक संस्थानों को मिलकर इस दिशा में काम करना होगा। भ्रमजाल फैलने से रोकने के लिए सरकार और समाज दोनों के साझा प्रयासों की दरकार है।