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जो दीखे सो राधिका, न दीखे सो कृष्ण- साधारण सा लगने वाला यह बोल समुद्र-सा गहरा है। ब्रह्म सदा माया के गर्भ में ढका रहता है। अत: माया ही दिखाई देती है। सम्पूर्ण विश्व माया का ही रूप है, मुखौटा है। माया के भीतर ब्रह्म है। ब्रह्म कर्ता नहीं है, स्थिर भाव है। माया गतिमान तत्त्व है, देवीस्वरूपा है। हम अवतार रूप में ब्रह्म को-पुरुष रूप को पूजते हैं। कर्ता रूप में सर्वत्र माया-दुर्गा-प्रकृति पूजते हैं। इसका एक ही अर्थ है कि हर स्त्री की शक्ति का रूप उसके भीतर का पुरुष ही है। उसका बाहरी सौम्य भाव पुरुष को आवरित करता रहता है। पुरुष के भीतरी सौम्य भाव का रक्षक भी स्त्री का पौरुष ही बनता है।
हर व्यक्ति के तीन धरातल है- आधिदेविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक। तीन ही व्यक्ति के शरीर होते हैं-स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर। सूक्ष्म और कारण शरीर आत्मा और प्रारब्ध से जुड़ा है। स्त्री और पुरुष दोनों ही आत्मा के धरातल पर शाश्वत है, आवरणयुक्त है। कर्मफलों को भोगने के लिए तथा एक-दूसरे का उधार चुकाने के लिए संकल्पित है। विवाह के स्थूल संकल्प के पीछे सारा सूक्ष्म क्षेत्र माया का ही है। स्त्री का आत्मा भी पुरुष है और पुरुष का आत्मा भी पुरुष है, माया के कारण ही उनका जीवात्मा रूप है। दोनों के शरीर अग्निसोमात्मक है। फिर भेद कहां है। पुरुष भाव में अग्नि की बहुलता से वह प्रसारसूचक है। स्त्री सौम्या होने से संकुचन की प्रतीक है। स्त्री के तीनों भाव माया-शक्ति-प्रकृति बाहर कार्य करते हैं, जबकि भीतर में वह त्रिपुरुष (अव्यय-अक्षर-क्षर) रूप में कार्य करती हैं। यही त्रिपुरुष रूप बाहरी पुरुष की शक्ति बनकर अद्र्धांगिनी रूप से संग चलता है, षोडशकल पौरुष तत्त्व रूप में। इसी कारण कृष्ण मायारूप स्त्री के विषय में कहते हैं कि यह दैवी त्रिगुणमयी मेरी माया बड़ी दुस्तर है। परन्तु जो मेरी शरण में आते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं—
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।। (गीता 7.14)
यही माया छैणी-हथौड़े से पुरुष की मूर्ति का भी निर्माण करती है। अपने सौम्य भाव से पुरुष की चोट को सहलाती भी जाती है। बाहर स्त्री का मन प्रबल होता है, भीतर बुद्धि और संकल्प। शरीर बाहर काम आता है। भीतर का सूक्ष्म भाग आत्मा से जुड़ा रहता है। जीवन का संचालन भीतर से होता है। जीवात्मा सूक्ष्म शरीर का ही अंग होता है। शरीर स्थूल विश्व को सूक्ष्म से जोडऩे का माध्यम बनता है।
पुरुष भीतर सोम प्रधान है- ऋत है, निराकार है अत: अशक्त है। जैसे स्त्री बाहर अशक्त है। दाम्पत्य भाव में स्थूल और सूक्ष्म के बीच व्यवहार का स्तर अद्भुत होता है। इन्द्रियां सूक्ष्म मन से संचालित होती हैं। वे शरीर के प्राणों के द्वारा कर्मेन्द्रियों का संचालन करती हैं। दैनंदिन कर्मों में शरीर और बुद्धि साधारण रूप में कर्म करते जाते हैं। मन की स्वीकृति रहती है।
स्त्री-पुरुष के मध्य आदान-प्रदान में शरीर गौण और मन प्रधान होता है। सूक्ष्म जीवात्मा प्रधान होता है। शरीर के कर्मों का निमित्त कारण बनता है। इसी में दोनों के सूक्ष्म शरीर- प्रारब्ध-जीवेच्छा संयुक्त रूप से कार्य करते हैं। उसी के अनुरूप स्थूल कर्म होते हैं। जीवात्मा के सूक्ष्म शरीर (पुरुष का स्त्रैण भाव तथा स्त्री का पौरुष तत्त्व) अपनी प्रधान भूमिका में होते हैं। जो कुछ प्रकट में दिखाई देता है, उससे पूरी तरह भिन्न व्यवहार दिखाई देता है। बाहरी स्वरूप में पुरुष आग्नेय और स्त्री सौम्या जान पड़ती है। स्थूल कर्मों की दिशा पुरुष तय करता दिखाई देता है। यदि जीवन से अथवा बाहरी विषयों के साधारण संवाद होते हैं, जहां दाम्पत्य भाव प्रभावित नहीं होता, वहां एक तरफा आदेश भी चल जाता है। पारम्परिक कार्यों, सामाजिक भागीदारी में पुरुष के निर्णय ही मुख्य होते हैं। स्त्री भी पुरुष की प्रतिनिधि बनकर ही कार्य करती है।
घर-परिवार से जुड़े कार्यों में पुरुष का सूक्ष्म भाव प्रभावी कम होता है। परिवार की धुरी स्त्री होती है- परिवार सूक्ष्म आत्माओं का समूह होता है। शरीरों के माध्यम से आदान-प्रदान करते हैं। स्त्री का पौरुष तत्त्व, अन्तर्दृष्टि, संवेदनशीलता की बड़ी एवं महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उसका संकल्पित आत्मबोध ही उसका दिव्य भाव होता है।
सूक्ष्म क्षेत्र में (पति-सन्तान पक्ष में) वह महामाया अथवा जीवात्मा के शक्ति रूप में कार्य करती है। पुरुष अपने सूक्ष्म-सोम से स्त्री के कर्मों को आवरित करके सुरक्षा प्रदान करता है। धुरी के पहिए की भांति गतिमान दिखाई देता है। अत: गृहस्थाश्रम का पूर्ण संचालन-प्रारब्ध कर्मों सहित- स्त्री ही करती है। पुरुष भी प्रारब्ध कर्म करता है-टाल नहीं सकता। तब उसकी ईश्वरेच्छा प्रबल हो जाती है। जीवेच्छा को अभिभूत कर देती है।
विवेक की भूमिका पूरी उम्र काम करती रहती है, किन्तु इस ईश्वरेच्छा को समझने में सर्वाधिक होती है। ईश्वर-इच्छा भी स्त्री-पुरुष दोनों में ही कार्य करती है और जीवेच्छा भी दोनों के मन को प्रभावित किए रहती है। साधारण बुद्धि ईश्वरेच्छा अथवा प्रारब्ध को नहीं समझ पाती। टकराव खड़ा हो जाता है। सम्बन्ध विच्छेद भी हो सकता है। यही जीवन के परीक्षा काल होते हैं। इनमें किए गए व्यवहार सुख-दु:ख का बड़ा कारण बन जाते हैं।
ईश्वर-इच्छा स्थूल शरीर अथवा बुद्धि में नहीं होती, मन में- इन्द्रिय मन में- होती है। सूक्ष्म पर पकड़ चूंकि स्त्री की रहती है, पौरुष तत्त्व की प्रधानता से- वह स्थिति को संभाल सकती है। पुरुष भीतर बिखरा रहता है (ऋत भाव), अत: उसके निर्णय भी अल्पकालीन, सतही होते हैं। बड़े निर्णयों में स्त्री के जीवात्म-रूप संकल्प ही अधिक प्रभावी होते हैं। वही घर छोडऩे पर उतारू होती है, वही आत्महत्या तक कर लेती है, वही शान्त रहकर परिवार को बांधे रख लेती है। यह सब उसके संस्कारों और प्रारब्ध पर निर्भर करेगा।
पुरुष का स्त्रैण अंश पोषित-प्रशिक्षित नहीं होता या बहुत कम होता है। अत: वह स्थूल शरीर, स्थूल बुद्धि पर अधिक निर्भर करता है। बुद्धिमान तो होता है, समझदार कम होता है। बुद्धि की उष्णता, आक्रामकता उसके संवाद में भी और निर्णय में भी, बने रहते हैं। सम्बन्धों के माधुर्य को ध्वस्त कर देते हैं। यहां भी यदि संयुक्त परिवार है तो माता की स्त्रैण भूमिका वातावरण को शान्त कर सकती है। प्रारब्ध में दु:ख लिखा हो तो श्वसुर की आक्रामकता आग में घी का कार्य कर जाती है। महामाया रूप स्त्री की भूमिका ही भविष्य का निर्धारण करती है। स्त्री ही पुरुष की प्रकृति है- जीवात्मा के साथ महामाया है और अव्यय आत्मा की शक्तिरूपा माया है। माया को जीवात्मा के भविष्य की सम्पूर्ण जानकारी होती है। उसी आधार पर महामाया रूप में कार्य करती है। ऐसा भी नहीं है कि प्रकृति-स्त्री रूप में वह भूल जाती है। वही तो ब्रह्म का इस शरीर में संचालन करने को साथ होती है।
शिक्षा के अभाव में स्वयं को शरीर मात्र मान लेने से- पुरुष के जीवात्मा से- उसका सम्पर्क विच्छेद रहता है। अत: वह अपने ब्रह्म के भाग्य को अंशमात्र भी नहीं जान पाती। दोनों का व्यवहार मात्र शरीर तक रहता है। अत: माया का खिलौना बनकर सौ साल पूरे कर जाती है। पुरुष को पुन: ब्रह्म तक लौटाने में उसकी भूमिका ही नहीं रहती। पुरुष को भीतर अकेले ही जीना पड़ता है। स्वयं के उद्धार के लिए भी। हर परिस्थिति में स्त्री का माया भाव स्थायी रहता है। ब्रह्म का स्थूल विवर्त- पशुवत् तैयार करके ही जाती है। यही उसके पौरुष-तत्त्व का अज्ञान अथवा अविद्या रूप है।
क्रमश: gulabkothari@epatrika.com
Updated on:
24 Jan 2026 10:26 am
Published on:
24 Jan 2026 10:25 am
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