
-योगेश कुमार गोयल स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार
जब शीत की जड़ता धीरे-धीरे विदा लेने लगती है और धरती की शिराओं में नवजीवन का प्रवाह महसूस होने लगता है, तब भारतीय कालबोध के आकाश में उज्ज्वल पर्व उदित होता है 'वसंत पंचमी', जो केवल पंचांग की एक तिथि नहीं है बल्कि प्रकृति, मनुष्य और चेतना के बीच स्थापित होता एक जीवंत संवाद है। यह पर्व ज्ञान, सृजन, प्रेम, समता और बलिदान की साझा अनुभूति का उत्सव है। भारत की सनातन परंपरा में वसंत ऋतु को 'ऋतुराज' कहा गया है। 'ऋतुनां कुसुमाकर:', गीता में श्रीकृष्ण द्वारा स्वयं को वसंत का प्रतीक बताना इस ऋतु की महिमा को और भी गहराई प्रदान करता है। वसंत का शाब्दिक अर्थ है 'चमकता हुआ'। संस्कृत के 'वस' धातु से उपजा यह शब्द संकेत करता है कि वसंत के आगमन पर प्रकृति अपने यौवन पर आ जाती है। शीत की कठोरता कम होने लगती है, सूर्य की किरणें ऊष्मा के साथ आशा भी बिखेरती हैं और मंद, सुगंधित पवन जीवन को एक नई गति प्रदान करती है।
आयुर्वेद में इस काल को स्वास्थ्य के लिए अत्यंत अनुकूल बताया गया है। महर्षि चरक का कथन 'वसंत भ्रमणं पथ्यं' यह संकेत देता है कि इस ऋतु में सक्रियता, संतुलित आहार और प्रकृति के साथ सान्निध्य शरीर और मन दोनों के लिए हितकारी है। कड़वे और कसैले तत्वों का सेवन, रक्तशुद्धि और ऊर्जा संतुलन का माध्यम माना गया है। दिन और रात की लगभग समानता, सर्दी और गर्मी के बीच का संतुलन, मानो मानव जीवन को भी हर परिस्थिति में समभाव बनाए रखने की प्रेरणा देता है। प्रकृति के दृश्य इस ऋतु में सृजन की भाषा बोलते हैं। पौराणिक आख्यानों में वसंत पंचमी का मूल सरस्वती के आविर्भाव से जुड़ा है। सरस्वती केवल अक्षरों की देवी नहीं, बल्कि विवेक, संयम और संतुलन की अधिष्ठात्री हैं। भारतीय शिक्षा-दर्शन में ज्ञान को सूचना-संग्रह नहीं, बल्कि चरित्र-निर्माण का माध्यम माना गया है। वसंत पंचमी इसी दर्शन का उत्सव है, जहां विद्या अहंकार नहीं, विनम्रता का आभूषण बनती है।
वसंत पंचमी पर्व का प्रमुख रंग है पीत। पीला रंग सूर्य, ऊर्जा, आशा और सकारात्मकता का प्रतीक है। धार्मिक दृष्टि से वसंत पंचमी को 'अबूझ मुहूर्त' माना गया है। विवाह, गृह प्रवेश, विद्यारंभ जैसे मांगलिक कार्य बिना विशेष गणना के संपन्न किए जाते हैं। छोटे बच्चों का अक्षरारंभ, जिसे 'पाटी पूजन' कहा जाता है, इसी दिन कराया जाता है, मानो सरस्वती स्वयं बालमन में प्रवेश करती हों। यह पर्व ज्ञान के साथ-साथ प्रेम और सौंदर्य का भी पर्व है। इस पर्व का एक गहरा आयाम देशभक्ति और समता से भी जुड़ा है। वसंत पंचमी केवल सौंदर्य और उल्लास का पर्व नहीं है, बल्कि बलिदान और धर्मरक्षा की प्रेरणा भी है। चमकौर साहिब के युद्ध में गुरु गोबिंद सिंह जी के साहिबजादों की शहादत और वीर हकीकत राय का बलिदान इस दिन को साहस और आत्मसम्मान की स्मृति से जोड़ते हैं।
वसंत पंचमी की महिमा केवल भारत तक ही सीमित नहीं है। एशिया और यूरोप की अनेक सभ्यताओं में ज्ञान की देवी के समान स्वरूप (जापान की बेंजाइतेन, थाईलैंड की सुरसवदी, तिब्बत की यांग चेन मा, ग्रीस की एथेना और रोमन मिनर्वा) मिलते हैं। कला, साहित्य और संगीत, तीनों को एक सूत्र में पिरोने वाला यह पर्व भारतीय सांस्कृतिक चेतना का उज्ज्वल प्रतीक है। वसंत पंचमी जीवन को ठहराव से गति की ओर ले जाने का उत्सव है। यह पर्व हमें यही संदेश देता है कि जैसे प्रकृति हर वर्ष स्वयं को नया रूप देती है, वैसे ही मनुष्य को भी भीतर की जड़ता त्यागकर नवचेतना का संचार करना चाहिए। ज्ञान की विनम्रता, कला की तरलता, प्रेम की कोमलता और बलिदान की दृढ़ता, इन सबका समन्वय ही वसंत पंचमी का सार है। प्रकाश का वरण करने का यह संदेश नश्वर समय से परे, मानव चेतना का शाश्वत उद्घोष है।
Updated on:
23 Jan 2026 02:03 pm
Published on:
23 Jan 2026 02:02 pm
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