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आप मुखौटा उतारकर एक बार खुद को पहचानिए तो सही

आधुनिक समाज में इंसान नकाब पहनकर जीने लगा है, जिससे उसकी स्वाभाविकता और प्रामाणिकता खो रही है। यह लेख 'अनबीकमिंग' की अवधारणा के माध्यम से बनावटी पहचान छोड़कर आत्मा से जुड़ने, भीतर लौटने और परिणाम नहीं बल्कि स्वयं परिणाम बनने की प्रेरणा देता है।

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कार्तिकेय वाजपेयी, वकील एवं आध्यात्मिक विषयों के लेखक

आधुनिक समाज में इंसान लगातार अपने वास्तविक रूप से दूर होकर अपने ही गढ़े हुए किरदार में जीने लगा है। उसकी पहचान अब वास्तविक नहीं रही, बल्कि वैसी बनती जा रही है जैसी उसकी यादें, उसकी महत्वाकांक्षाएं और दूसरों की अपेक्षाएं चाहती हैं। वह इसी उलझन में फंसा रहता है कि ऊंचाइयां हासिल करने के लिए उसे अब क्या बनना चाहिए, कैसे बोलना चाहिए, कैसे दिखना चाहिए। इसी खींचतान में स्वाभाविकता खो जाती है और जीवन अभिनय में बदल जाता है। कॉर्पोरेट जगत से लेकर सोशल मीडिया तक हालात के मुताबिक चेहरे बदलते रहते हैं और राजनीतिक शुद्धता केवल एक मानक नहीं, बल्कि सावधानी से पहना गया मुखौटा भर बन गई है।

दीर्घकाल में यह बनावटीपन गहरे मनोवैज्ञानिक और नैतिक संकट पैदा करता है। लगातार खुद को संवारते रहने, अपनी बातों और फैसलों को 'कैसा दिखेगा' की कसौटी पर कसने से लोग भीतर ही भीतर थक जाते हैं और उनकी निर्णय लेने की क्षमता केवल छवि की चिंता में डूबे रहने से कमजोर पड़ जाती है। 'अनबीकमिंग' स्वयं को गढ़ते रहने से उपजी इस थकान से बाहर निकलकर भीतर लौटने की परिवर्तनकारी यात्रा है- अपने भीतर, अपनी आत्मा से दोबारा जुडऩे और जीवन के वास्तविक उद्देश्य को पहचानने की यात्रा। यह हमें प्रेरित करती है कि हम वर्तमान को अतीत की आसक्तियों, संस्कारों, भय, पक्षपात और पूर्वाग्रहों के चश्मे से देखने की आदत छोड़ें।

सच्ची प्रामाणिकता कभी शोर नहीं मचाती। वह शांत होती है, निरंतर होती है और प्राय: असुविधाजनक भी। हम जो सचमुच बनना चाहते हैं, उसके लिए जरूरी है कि हम अपने असली 'स्व' को बिना किसी पूर्वधारणा और भविष्य के कल्पित नतीजों के सहारे अपनाएं। परिणाम की चिंता छोड़ दें - खुद ही परिणाम बन जाएं। 'बनने' की कला का अर्थ है अपने इच्छित स्वरूप को पूरी ईमानदारी और आत्मविश्वास के साथ जीना। हमारा उद्देश्य अपने सर्वोत्तम रूप को जीना होना चाहिए, न कि केवल उसका प्रयास।

'अनबीकमिंग' की प्रक्रिया की शुरुआत - 'मैं सब जानता हूं' जैसी निश्चितता छोड़ने की विनम्रता से होती है। नेतृत्व भी प्रामाणिकता की तरह रटे-रटाए जवाबों से नहीं, बल्कि बिना किसी पूर्वधारणा के हर क्षण का सामना करने के साहस से उपजता है। जहां सार से ज्यादा दिखावे को और सच्ची उपस्थिति से ज्यादा प्रदर्शन को महत्व दिया जाता है, 'अनबीकमिंग' साहसी विकल्प बन जाता है। यह हमें स्थापित पहचानों को छोड़ने और उपस्थित सच की तात्कालिकता को अपनाने के लिए प्रेरित करता है। प्रतिस्पर्धा से भरी दुनिया में 'बनने' की दौड़ इस बात पर केंद्रित रहती है कि हम दूसरों की नजर में कैसे दिखाई दें। 'अनबीकमिंग' हमें उस प्रामाणिक स्रोत से जोड़ती है, जो भीतर कहीं सुप्त पड़ा है व भीतर झांकने पर ही पहचाना जा सकता है।