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मैं बहुत रोया… Irrfan Khan से जब प्रोड्यूसर ने कहा- तुमने खराब एक्टिंग की है इसलिए…

Irrfan Khan: इरफ़ान से यह बातचीत वरिष्ठ फिल्म पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज ने ‘हासिल’ की रिलीज़ के बाद ‘मकबूल’ के इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल, दिल्ली प्रीमियर के बाद किया था। यह इरफ़ान का यह पहला विस्तृत इंटरव्यू था। पत्रिका के पाठकों के लिए नॉटनल प्रकाशन के सहयोग से यहां साभार प्रकाशित किया जा रहा है।

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Irrfan khan birthday

अभिनेता इरफान खान का स्पेशल इंटरव्यू

Irrfan Khan Interview : चर्चा में होने की आपकी जो ट्रायोलॉजी बन गई है…

ट्रायोलॉजी…?

हां, मतलब लोग फिल्मों की ट्रायोलॉजी करते हैं आपके चर्चा में होने की है, तो इसके जो 'हासिल' हैं उसके बारे में…

जी मेरे लिए भी ये ट्रायोलॉजी है, उम्मीद करता हूं कि ऐसे कुछ प्रोजेक्ट मिलते रहेंगे आगे भी-क्योंकि इस तरह के प्रोजेक्ट लिखे नहीं जाते, 'हासिल' जैसा रोल तो मुझे लगता है रेयरली लिखा जाता है। इत्तेफ़ाक से एक के बाद एक मुझे मिल गया, मेरी इसमें कोशिश इतनी ही है कि इतने सालों का मेरा जो इंतजार था शायद वह जस्टीफ़ाई हुआ… और मेरा मानना है कि अगर आपकी कोई इंटेंस डिजायर है और आप उस तरफ काम कर रहे हैं तो एक प्वाइंट के बाद चीजें अपने आप शायद ठीक होने लगती हैं…

लेकिन क्या ऐसा लगता है कि दस साल पहले जो फिल्मों में आपका चुनाव हुआ था, वो भी बड़ी फिल्में थीं 'एक डॉक्टर की मौत' या… गोविंद निहलानी के साथ और जो आपकी दो-एक फिल्में थीं…

असल में वो जो मूवमेंट था पूरा आर्ट सिनेमा का मूवमेंट। जब वो थोड़ा डिक्लाइन की तरफ था, लास्ट स्टेज थी उसकी, उसमें मेरी इंट्री हुई। लोगों ने कहा कि वो जो ब्रेक था वो खराब ब्रेक था मेरे लिए, लेकिन मैं नहीं मानता, क्योंकि मेरे पास कोई च्वाइस थी नहीं और एक्टिंग शैली को लेकर मेरी अपनी जद्दोजहद चल रही थी। मेरा थिएटर से वो ट्रांजिशन पीरियड था और कैमरे को समझने में टाइम लगता है पर मुझे इस बात का अफसोस नहीं है क्योंकि उस समय अगर मैं कुछ बड़ी फिल्में करता और अधकचरेपने से करता तो आज मुझे उसे देखकर जरा ज्यादा अफसोस होता। हो सकता है उस समय मेरा कुछ स्लॉट डिसाइड हो जाता और मैं उसमें घुस जाता। अभी इतना समय इंडस्ट्री में रहने के बाद जो इतना लेट ब्रेक मिला तो उस लेट होने में मेरी समझ कुछ बढ़ गई कि कैसे जाना है। 'वारियर' में ऐसी बहुत सारी चीजें क्लीयर हुईं। 'वारियर' के पहले जो मेरा ट्रैक चल रहा था लाइफ का, 'वारियर' के बाद एकदम से चेंज हो गया। समझ को लेकर कि क्या करना है, क्‍या नहीं करना है, कैसी फिल्में करनी हैं?

ऐसा नहीं लगता कि बीच के जो 8-10 साल गए, जिनको सीरियल में आपने डिवोट किया, भले मजबूरी में आपने किया हो, उसमें बहुत कुछ मिस कर दिया आपने?

मुझे नहीं लगता। अगर उस इंतजार का कोई रिजल्ट नहीं मिलता तो मुझे लगता कि मैंने मिस किया। लेकिन उस दौर ने मुझे बहुत प्रैक्टिस दी। मतलब अपनी टेकनीक तय करने में, कैसे मुझे अपना रोल करना चाहिए इसके लिए, क्राफ्ट पर काम करने के लिए मुझे मौका मिल गया।

आपको एक्टर बनना है और मुंबई में जाकर, यह क्या आपने पहले से सोचा था?

यह मेरे दिमाग में क्लियर था। जब मैं एनएसडी आया था तो फिल्में करने के लिए आया था। फिल्में देखकर मेरे भीतर एक्टिंग करने की इच्छा पैदा हुई और थिएटर से मैं बिल्कुल एक्सपोज नहीं था। थिएटर मैंने इसलिए शुरू किया कि मुझे एनएसडी जाना था। बचपन में फिल्में देखने की इजाजत नहीं थी, लेकिन जब भी देखता था फिल्में, जैसे जादू हो जाता था। याद आती रहती थी वह कहानी, वे कैरेक्टर, तो वो जो जादू था सिनेमा का, उसी ने मुझे यहां खींचा था।

यानी एनएसडी सिर्फ एक जरिया बना। कहानी और कैरेक्टर के अलावा और क्या था जो आपको हॉण्ट करता था?

ग्लैमर वाला पार्ट था और आपके भीतर जो काम्प्लेक्स होते हैं उनसे लड़ने का जरिया, और फिर आपको इज्जत चाहिए, पैसा चाहिए। शुरू में वो भी मोटिवेशन था एक। एनएसडी में आने के बाद अपने को देखने का तरीका थोड़ा बदला, क्योंकि वहां पहली बार पता चला कि आप जो भी बने हुए हैं, बहुत सारी चीजों से मिलकर बने हैं। अपने को डिटैच होकर देखने की एक आदत एनएसडी में पड़ी। तो वहां से सिर्फ पैसा या ग्लैमर वाली बात कट हो गई। आप कितना कुछ लेते हैं, एक्टिंग करते हुए, अपनी पर्सनैलिटी के लिए, यह थोड़ा इम्पोर्टेंट होने लगा। रोल आप करते हैं, एक दूसरे आदमी को समझते हैं, उसके सिचुएशंस डील करते हैं तो वो जो आपकी शख्सियत पर एक एडीशन होता है वह मेरे लिए महत्वपूर्ण हो गया।

सामान्यत: मिडिल क्लास में जब भी यह बात आती है कि मुझे एक्टर बनना है या डिप्लोमेट बनना है या राजनीति में जाना है, यानी कोई भी महत्वाकांक्षा सामने आती है तो माता-पिता कहते हैं कि बेटा, उतना ही पांव फैलाओ जितनी बड़ी चादर हो, यानी डिस्करेज वाली बात… आपके साथ भी कुछ ऐसा हुआ था?

हां, मेरे साथ ऐसा रहा। मेरे पिता की तो मृत्यु हो गई थी, मां नहीं चाहती थी कि मैं जाऊं, और दसवीं से ही मैं कुछ करना चाहता था। पढ़ने-वढ़ने में मेरा मन लगता था नहीं, हालांकि मैं पढ़ता रहता था, सिर्फ इसलिए कि मां को अच्छा लगता था, सुनने में कि बेटा ग्रेजुएट है। कई चीजों के बारे में मुझे लगा कि मैं ये कर नहीं सकता। मैं खेलता था और मुझे एक्टिंग का शौक था। ये लगा कि मैं वही कर सकता हूं,जिसमें मेरा दिल लगे। सिर्फ पैसे के लिए काम करना मेरे लिए पॉसिबल नहीं था। वैसे मैंने काफी टाइम इन्वेस्ट किया, मुंबई आया, ट्रेनिंग की टेकनीक की, और फिर प्रैक्टिकली जब उसे करने लगा तो इट बिकम इम्पॉसिबल। मां को तो शुरू से ही एक्टिंग इज्जत वाला काम नहीं लगता था।

उनको शायद यह लगता हो कि इस क्षेत्र में बहुत सारे लोग जाते हैं, कुछ अचीव नहीं कर पाते…

नहीं, यह नहीं था। उनको यह काम ही खराब लगता था, यह नाच-गाना। मैंने काफी कुछ समझाया मां को कि तुम बेफिक्र रहो। यह मेरे मन में था कि कुछ ऐसा करो दुनिया में कि बेहतर हो। इसके लिए मैं कॉन्शस था।

कौन लोग थे जो इसमें मददगार हुए आपके?

थिएटर से सही तरीके से इन्ट्रोड्यूस कराने वाले रवि चतुर्वेदी थे राजस्थान के। और फिर मोहन महर्षि ने एक बहुत बड़ा रोल प्ले किया मेरे साथ। और फिर पहले प्रयास में मुझे एनएसडी जाने का मौका मिल गया, नहीं मिलता तो आज लगता है कि मैं पागल हो जाता, वह बेचैनी का स्टेज था, जवान थे आप, करना चाहते थे कुछ, जयपुर से मन हट चुका था। दोस्तों का सर्कल बोरिंग हो गया था, वही लड़कियां देखना, सड़कों पर खड़े होना, कॉलेज जाना… तो मेरे लिए जरूरी हो गया था। ऐसा नहीं कि मोहन ने मेरे लिए अलग से कोई पार्शियलिटी की, लेकिन मुझे लगता है कि कोई और होता तो नहीं होता। प्रसन्ना सेकेंड इयर में प्ले करने आए थे। उनके प्ले में पहली बार मुझे एक्टिंग कैसी होनी चाहिए इसकी एक तरह से समझ आई। अपने पास कैरैक्टर को कैसे ला सकते हैं इसका अहसास हुआ। उस वक्त शुरू करने के लिए यह बहुत जरूरी था कि कैसे और कितना आप कैरेक्टर के क्लोज आ जाते हैं, हालांकि हमेशा यह जरूरी नहीं होता, उससे वेरायटी ख़त्म होने लगती है। उसकी वजह से क्या हुआ कि परफ़ार्म जो किया वह काफी कुछ 'ट्रू' हुआ और मैं वहीं ढूंढ़ रहा था कि करते वक्त मन:स्थिति कुछ एक्सपीरिएंस करे। उस मूवमेंट का जिसे आप प्ले कर रहे हैं उसका एक्सपीरिएंस हो, कहीं-न-कहीं। वह मेरी कोशिश थी और उसके पहले नहीं हो पा रहा था और इसके चलते मैं बहुत फ्रस्ट्रेटेड था। हर तरह की कोशिशें कर रहा था। शुरू में जैसे एक रोल मिला तो मैं खूब सोचता था कि तीन सौ साल पहले आदमी कैसा होगा लेकिन उस वक्त कोई समझ नहीं थी। लेकिन कोशिश का मतलब हर तरह की कोशिश… लाल किले में जाकर बैठा रहता था कि कुछ समझ में आ जाए। वह सब बचकानी चीजें थीं।

लेकिन यह डिसीजन आपने कब लिया कि एनएसडी करने के बाद रेपटरी नहीं ज्वाइन करनी, सीधे मुंबई जाना है?

मैंने मुंबई जाने का डिसाइड नहीं किया। थर्ड इयर में मीरा नायर ने अपनी फिल्म 'सलाम बॉम्बे' के लिए बुलाया था, तब वहां जाना हुआ। मैं रेपटरी ज्वाइन करना चाहता था लेकिन रेपटरी की हालत तब बेकार हो चुकी थी। सब जा चुके थे। मनोहरजी जा चुके थे, सुरेखा जी जा चुकी थीं और वह क्रिएटिव इंस्टीटूट की तुलना में दफ्तर जैसा ज्यादा लगता था। तब मेरा मन नहीं हुआ ज्वाइन करने का। मैं दिल्ली में ही रहा। प्ले किया प्रसन्ना के साथ। फिर उसके बाद मेरा कॉल आया, गोविंद निहलानी की तरफ से। इस बार मुंबई गया तो लगा कि अब वापस दिल्ली जाने का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि यहां कुछ और एक्टिविटी थी करने को। तो एक के बाद एक यहां काम मिलता रहा।

कौन-सी फिल्म थी पहली, गोविंद निहलानी के साथ?

'जंजीरे' फिर 'दृष्टि'। फिर सीरियल का सिलसिला शुरू हुआ कि तपन सिन्हा की फिल्म आ गई और इस तरह की कुछ आर्ट फिल्में मैंने की। लेकिन उस दौरान एकाध एक्सपीरिएंस मेरे बड़े अच्छे हुए। श्याम जी के साथ मैंने चेखव की स्टोरी की ‘वार्ड नंबर 6’ वह आज भी लोगों को लगती है कि अभी कल देखी हो…

मुंबई पहुंचने के बाद, गोविंद निहलानी से मिलने का मौका मिल गया लेकिन जो कमर्शियल सेटअप या कमर्शियल फिल्म मेकर्स हैं, उनसे मिलना-जुलना जारी हुआ या कुछ हिचक थी?

हिचक थी मुझे, और थोड़ी झिझक-सी होती थी बताने में कि मैं एक्टर हूं, मुझे काम चाहिए। एकाध बार मैंने कोशिश की, लेकिन उस कोशिश से पता चल गया कि इस तरह से काम मुझे नहीं मिल सकता। तो मैंने उस तरफ फिर ध्‍यान ही नहीं दिया, टीवी का काम आता रहा, मैं करता रहा। कमर्शियल फिल्म में जाने की अंदर से बहुत इच्छा होती थी, लेकिन उसके लिए मैं कुछ कर नहीं सका। आज मुझे लगता है कि अच्छा हुआ जो नहीं हुआ। उस समय मैं घुस जाता तो पता नहीं किस तरह का रोल, किस तरह का स्लॉट मेरे लिए रेडी होता। एक समय तो मैं यह भी सोचता था कि यार जो नूतन के लड़के हैं, मोहनीश बहल, इस तरह का स्लॉट मेरा बन जाए, और उस समय बन जाता तो बहुत मैं खुश होता, लेकिन अब मुझे लगता है कि अच्छा हुआ जो नहीं बना।

मैं जानना चाहता हूं कि कहीं वह रेजिस्टेन्स है क्या, कभी अपमान या दुत्कार या तिरस्कार या इस ढंग की कोई चीज…

हां अपमान का एक अहसास… रेजिस्टेन्स तो काफी फेस किया है मैंने, लेकिन किसी तरह का तिरस्कार या दुत्कार इस तरह का कुछ नहीं हुआ… शुरू-शुरू में एनएसडी से निकलने के बाद मुझे एकाध एक्सपीरिएंस ऐसे हुए थे कि प्रोड्यूसर ने आधे ही पैसे दिए, बोला कि खराब एक्टिंग की है तुमने और क्योंकि एक्टिंग को लेकर मैं इतना कॉन्शस था कि कब सही करूंगा, तारीफ मिलती थी, लेकिन मुझे पता था कि मैं नहीं कर पा रहा हूं, ऊपर से कर रहा हूं, मेरे अंदर नहीं जा रहा है यह, मेरा पूरा शरीर वह नहीं बोल रहा है जो मैं बोल रहा हूं मुंह से, ऐसे दौर में किसी का यह कहना कि तुमने खराब एक्टिंग की है इसलिए पैसा कम दे रहा हूं - मैं बहुत रोया था घर आकर। और इसीलिए मैं झिझकता था लोगों से मिलने में कि कहीं ऐसा न हो कि कुछ और मूड में बात कर लूं। तो आप जो सेल्फ रेस्पेक्ट बिल्डअप कर रहे होते हैं, उसे लेकर मैं बहुत कॉन्शस था कि उसको धक्का न लगे; फिर अपने आपको डील करने में मुश्किल होता।

अच्छा इसकी वजह क्या होगी कि पूरे हिंदी बेल्ट से, यानी हिंदी हार्टलाइन से एक्टर बहुत कम आ पाते हैं? हिंदी फिल्में हालांकि होती हैं हिंदी में…

यहीं से आते हैं मुझे लगता है… जो लोग स्टार बने हैं वे ज्यादातर इसी बेल्ट से हैं और मुझे लगता है लैंग्वेज का इसमें बड़ा हाथ है। आपकी भाषा कितना अट्रैक्ट कर रही है ऑडिएंस को, आपके बोलने का तरीका कितना अट्रैक्ट कर रहा है। ये सभी जो टॉप पर गए हैं उनका हिंदी के साथ बड़ा खेल वाला रिश्ता रहा है। दिलीप साहब से लेकर, राजेश खन्ना से लेकर… राजेश खन्ना साहब सिर्फ बोलते ही थे। मुझे लगा नहीं कि कभी वे बहुत ज्यादा इन्वॉल्व होकर काम करते हैं, वे बहुत स्मूद बोलते थे। अमिताभ बच्चन का लैंग्वेज अपना है। हीरोइन का चक्कर है कि वे काफी साउथ वगैरह से…

(यह इंटरव्यू प्रकाशक नॉटनल (ईबुक) के सौजन्य से अजय ब्रह्मात्मज की किताब 'इरफ़ान… और कुछ पन्ने कोरे रह गए' से साभार प्रकाशित किया जा रहा है।)