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Sex Ratio: हरियाणा में लिंग अनुपात में हुआ जबरदस्त सुधार, पहले राष्ट्रीय औसत से था बहुत पीछे, जानिए दूसरे राज्यों का क्या है हाल?

Sex ratio at birth: हरियाणा कभी लिंग अनुपात के मामले में सबसे पिछड़े राज्यों में से एक था, लेकिन कुछ उपायों के बाद अब वहां इस मामले में काफी सुधार दर्ज किया गया है। आइए, विस्तार से पढ़ें।

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Sex Ratio at Birth in India

हरियाणा में लिंगानुपात में काफी सुधार दर्ज किया गया है।

Sex Ratio in Haryana: हरियाणा में पिछले पांच वर्षों में सर्वश्रेष्ठ लिंग अनुपात हासिल करने में एक दशक से चलाया गया लंबा अभियान ने बड़ी भूमिका निभाई। इन उपायों में कानून प्रवर्तन उपाय, अंतरराज्यीय छापे और अल्ट्रासाउंड केंद्रों की निगरानी में चिकित्सा अधिकारियों को शामिल करना प्रमुख हैं।

2011 में हरियाणा में 1000 लड़कों पर 834 लड़कियां

वर्ष 2011 की जनगणना में जन्म के समय लिंग अनुपात के मामले में राज्य सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले राज्यों में शुमार था। राज्य में प्रति 1,000 लड़कों पर 834 लड़कियां थीं। वहीं 2025 में यह आंकड़ा 923 रहा। वर्ष 2023 में सरकार ने संसद में एक सवाल के जवाब में बताया था कि लिंगानुपात राष्ट्रीय औसत 933 के करीब है। वर्ष 2024 में राष्ट्रीय लिंगानुपात गिरकर 910 हो गया था। यह बीते 8 वर्षों में सबसे बड़ी गिरावट थी।

भ्रूण हत्या के कारण राज्य में लिंगानुपात था गड़बड़

हरियाणा में भ्रूण हत्या का सिलसिला पुराना है। स्टेटिस्टिकल हैंडबुक ऑफ हरियाणा में उल्लिखित आंकड़ों के अनुसार, 1901 की जनगणना में राज्य का लिंगानुपात 867 था। वहीं भारत को स्वतंत्रता मिलने के बाद 1951 में हुई पहली जनगणना में हरियाणा का लिंगानुपात 871 था। मतलब पांच दशक में सिर्फ 10 अंकों का सुधार दर्ज किया गया। वर्ष 1951 के बाद वर्ष 2011 में यानी छह दशक बाद जनगणना लिंगानुपात 8 अंक बढ़कर 879 हो गया। हालांकि इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2011 में हरियाणा में 1000 लड़कों पर 834 लड़कियां थीं। इसी रिपोर्ट के अनुसार हरियाणा में यह अनुपात 1000:923 का हो गया।

10 वर्षों में 65 हजार लड़कियों की बचाई गई जान

लिंगानुपात में सुधारों के बारे में हरियाणा के अधिकारियों का कहना है कि 2015 से लिंग अनुपात में सुधार के प्रयासों के कारण 65,000 से अधिक लड़कियों की जान बचाई गई है।

लिंगानुपात सुधारने में पुलिस सहित कई विभाग हुए एकजुट

लिंगानुपातों में किए जा रहे सुधारों की साप्ताहिक निगरानी की गई। इस काम में स्वास्थ्य विभाग से लेकर पुलिस विभाग को जोड़ा गया। वर्ष 2015 से 2025 के बीच हरियाणा में चिकित्सा पेशेवरों और अल्ट्रासाउंड केंद्र मालिकों के खिलाफ पीएनडीटी (Pre-Natal Diagnostic Techniques) और एमटीपी (Medical Termination of Pregnancy) कानूनों के तहत 1,375 एफआईआर दर्ज की गईं। रिकॉर्ड बताते हैं कि कोविड-19 से प्रभावित वर्ष 2020 में भी लगातार अभियान चलाया गया। वर्ष 2020 में लगभग 100 एफआईआर दर्ज की गईं, तो 2021 में यह संख्या बढ़कर 142 हो गई। वर्ष 2023-24 में इसमें गिरावट आई लेकिन अगले ही वर्ष यानी 2025 में हरियाणा के अधिकारियों ने 154 मामले दर्ज किए।

लिंगानुपात में सबसे टॉप और सबसे खराब जिले

पीएनडीटी और एमटीपी एक्ट के तहत सबसे अधिक 126 एफआईआर फरीदाबाद जिले में दर्ज की गई। इसके बाद सोनीपत में 115 और गुरुग्राम में 112 एफआईआर दर्ज की गईं। जन्म के समय लिंग अनुपात के मामले में शीर्ष तीन जिले पंचकुला (971), फतेहाबाद (961) और पानीपत (951) हैं।

हरियाणा के फरीदाबाद, सोनीपत और गुरुग्राम में लिंग अनुपात राज्य के औसत से कम है। इन जिलों में लिंगानुपात क्रमशः 916, 894 और 901 है।

भ्रूण हत्या को रोकने के लिए की गई छापेमारी

हरियाणा के स्वास्थ्य अधिकारियों ने यह पाया कि राज्य के लोग लिंग निर्धारण परीक्षण कराने के लिए सीमावर्ती राज्यों में पहुंच रहे थे। वे दूसरे राज्यों में चोरी छिपे गर्भपात भी करवा ले रहे थे। स्वास्थ्य विभाग और पुलिस विभाग ने मिलकर हरियाणा से लगने वाली चार राज्यों उत्तर प्रदेश, दिल्ली, पंजाब और राजस्थान में घुसकर छापेमारी की। 2025 में उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक 218 अंतरराज्यीय लिंग निर्धारण केंद्रों पर छापेमारी की गई। इसके बाद दिल्ली में 89, पंजाब में 83 और राजस्थान में 26 छापेमारी की गईं।

गर्भवती महिलाओं को जारी की गई विशेष आईडी

पंचकुला में पीएनडीटी के नोडल अधिकारी डॉ. अरुण ने जमीनी स्तर पर राज्य के भीतर समन्वय के बारे में इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “पंचकुला में लगभग 57 अल्ट्रासाउंड केंद्र हैं। ये सभी हमारे व्हाट्सएप समूह का हिस्सा हैं। हम नियमित निरीक्षण और त्रैमासिक बैठकें करते हैं। पिछले साल हमने ‘आरसीएचआईडी’ या ‘प्रजनन एवं बाल स्वास्थ्य पहचान’ भी शुरू की, जो प्रत्येक गर्भवती महिला को जारी की जाने वाली 12 अंकों की एक विशिष्ट आईडी है, जिसकी जांच किसी भी निजी या सरकारी स्वास्थ्य संस्थान में की जाती है। इसके परिणामस्वरूप गर्भवती महिलाओं के पंजीकरण में 37 प्रतिशत अंकों की वृद्धि हुई। प्रत्येक गर्भपात को ट्रैक किया गया, जिसमें कारणों को दर्ज किया गया।”

यह कदम बना गेमचेंजर

हरियाणा में अप्रैल 2025 में शुरू की गई सहेली परियोजना में आंगनवाड़ी या आशा कार्यकर्ताओं को विशेष रूप से उन गर्भवती महिलाओं की निगरानी के लिए शामिल किया गया था जिनकी कम से कम एक बेटी है। इसके परिणामस्वरूप एक वर्ष में गर्भावस्था के दौरान गर्भपात की दर में 57 प्रतिशत अंकों की गिरावट आई। इसके अलावा हरियाणा सरकार द्वारा अवैध लिंग निर्धारण केंद्रों या अवैध गर्भपात के बारे में जानकारी देने वालों को 1 लाख रुपये का इनाम देने की योजना भी निर्णायक साबित हुई। एक सूचना के अनुसार, पिछले 10 वर्षों में ऐसी सूचना देनेवालों को लगभग 5 करोड़ रुपये दिए जा चुके हैं।

'लिंगानुपात सुधरने से समाज में बराबरी आ जाएगी, यह धारणा गलत'

क्या लिंगानुपात में सुधार से समाज में बराबरी आएगी? इस सवाल पर जेंडर को लेकर काम करने वाले आजाद फाउंडेशन की दिल्ली प्रमुख मधुबाला ने पत्रिका से कहा, 'देश में लिंगानुपात सुधरने से बराबरी आ जाएगी, यह धारणा गलत है। लोगों की मानसिकता में जबतक बदलाव नहीं आएगा तब तक समाज में बराबरी नहीं आ सकती है। लोगों को यह समझना होगा कि बच्चा किसी भी जेंडर का हो, वह खूबसूरत है। मैं यहां सिर्फ लड़का और लड़की की बात नहीं कर रही हूं। मैं यहां ट्रांस की बात कर रही हूं।'

उन्होंने बताया कि यह नजरिया कि समाज को चलाने वाला पहला व्यक्ति पुरुष है और वही सबकुछ कर सकता है, इस सोच को तोड़कर आगे बढ़ना होगा। हमारे रीति-रिवाजों में पुरुषों को हर काम में आगे रखा जाता है। इन रीतियों के बीच हर कोई पलता है और बड़ा होता है और वह यह सब देखते हुए आगे बढ़ता है और इन्हीं बातों से उसकी मानसिकता तैयार होती है। घर चलाने का हक, पॉपर्टी का हक, घर और परिवार में निर्णय लेने का अधिकार आदि। इन बातों को औरतें भी देखती हैं और इससे उनकी कंडीशनिंग होती रहती है। महिलाएं यह समझ बना लेती है कि उनकी समाज और घर में कोई वैल्यू नहीं है। फिर उनको यह लगने लगता है कि बेटी की जब वैल्यू ही नहीं है तो उसे क्यों पैदा करें? इन बातों से पुरुष सत्ता ताकतवर होती जाती है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था और जेंडर गैप खत्म होगा तो समाज में बराबरी आएगी। इसके साथ समाज में जाति व्यवस्था और दूसरे तरह के छूआछूतों को दूर करने होंगे, तभी बराबरी आएगी।'