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शंकराचार्य का बुलावा! इस्तीफे के बाद बरेली सिटी मजिस्ट्रेट को धर्मक्षेत्र में आने का प्रस्ताव

बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट के इस्तीफे और शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती द्वारा धर्म क्षेत्र में आने के प्रस्ताव ने प्रशासन, शिक्षा और धर्म जगत में बहस छेड़ दी है। यूजीसी से जुड़े विवादों की पृष्ठभूमि में हुआ यह घटनाक्रम वैचारिक प्रतिबद्धता और सार्वजनिक सेवा के रिश्ते पर सवाल खड़े करता है।

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धर्म, शिक्षा और प्रशासन के संगम पर खड़ा एक इस्तीफा: बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट को शंकराचार्य का धर्मक्षेत्र में आने का प्रस्ताव (फोटो सोर्स : WhatsApp News Group)

धर्म, शिक्षा और प्रशासन के संगम पर खड़ा एक इस्तीफा: बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट को शंकराचार्य का धर्मक्षेत्र में आने का प्रस्ताव (फोटो सोर्स : WhatsApp News Group)

 Shankaracharya Invites Bareilly City Magistrate: उत्तर प्रदेश के बरेली जनपद से जुड़ी एक अनोखी और चर्चा में आई घटना ने प्रशासनिक सेवा, धार्मिक नेतृत्व और उच्च शिक्षा से जुड़े विमर्श को एक साथ केंद्र में ला दिया है। शंकराचार्य से जुड़े मुद्दों और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) को लेकर उठे विवादों की पृष्ठभूमि में अपनी सरकारी नौकरी से इस्तीफा देने वाले बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट को ज्योतिर्मठ पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महाराज ने फोन पर बातचीत के दौरान धर्म क्षेत्र में सक्रिय रूप से आने का प्रस्ताव दिया है। इस घटनाक्रम ने सामाजिक और प्रशासनिक हलकों में नई बहस को जन्म दे दिया है।

बताया जा रहा है कि हाल के दिनों में शंकराचार्य परंपरा, सनातन धर्म से जुड़े संस्थागत प्रश्नों और यूजीसी से संबंधित कुछ शैक्षिक-प्रशासनिक मुद्दों को लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में चर्चाएं तेज रही हैं। इन्हीं विषयों से प्रभावित होकर बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट ने अपनी सरकारी सेवा से अलग होने का निर्णय लिया। उनका यह कदम सामान्य प्रशासनिक निर्णय न मानकर एक वैचारिक रुख के रूप में देखा जा रहा है।

सूत्रों के अनुसार, इस्तीफे के बाद शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महाराज ने संबंधित अधिकारी से मोबाइल फोन पर वार्ता की। इस बातचीत में शंकराचार्य ने उनके निर्णय की सराहना करते हुए उन्हें धर्म और संस्कृति के क्षेत्र में अपनी ऊर्जा लगाने का सुझाव दिया। बताया जाता है कि शंकराचार्य ने कहा कि आज के समय में शिक्षित, प्रशासनिक अनुभव रखने वाले और वैचारिक रूप से प्रतिबंध लोगों की धर्म क्षेत्र में आवश्यकता है, जो समाज और राष्ट्र के सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा में भूमिका निभा सकें।

यह प्रस्ताव केवल व्यक्तिगत आमंत्रण भर नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे धर्म और प्रशासन के बीच बढ़ती संवाद प्रक्रिया के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है। लंबे समय से यह चर्चा चलती रही है कि भारतीय प्रशासनिक ढांचे में कार्यरत अधिकारी जब सामाजिक या वैचारिक आधार पर निर्णय लेते हैं, तो उसका प्रभाव व्यापक स्तर पर दिखाई देता है। ऐसे में एक सिटी मजिस्ट्रेट स्तर के अधिकारी का त्यागपत्र और उसके बाद धार्मिक नेतृत्व से सीधा संवाद, इस विमर्श को और गहरा करता है।

शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती महाराज हाल के समय में सनातन धर्म, परंपराओं और धार्मिक संस्थाओं के अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर मुखर रहे हैं। वे समय-समय पर शिक्षा व्यवस्था, सांस्कृतिक पहचान और धार्मिक स्वतंत्रता जैसे विषयों पर अपने विचार सार्वजनिक मंचों से रखते रहे हैं। ऐसे में किसी प्रशासनिक अधिकारी को धर्म क्षेत्र में आने का प्रस्ताव देना उनके व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें वे धार्मिक चेतना और बौद्धिक नेतृत्व को साथ जोड़ने की बात करते हैं।

दूसरी ओर, इस पूरे घटनाक्रम ने प्रशासनिक सेवा की निष्पक्षता और व्यक्तिगत आस्था के बीच संतुलन को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी सेवा में रहते हुए अधिकारियों को संविधान और नियमों के अनुरूप काम करना होता है, लेकिन सेवा से अलग होने के बाद वे अपने व्यक्तिगत विचारों और रुचियों के अनुसार किसी भी क्षेत्र में सक्रिय हो सकते हैं। ऐसे में यह मामला वैधानिक रूप से आपत्तिजनक नहीं, बल्कि एक व्यक्तिगत निर्णय के रूप में देखा जाना चाहिए।

शिक्षा जगत से जुड़े कुछ लोगों ने इसे यूजीसी और पारंपरिक ज्ञान परंपरा के बीच चल रहे वैचारिक अंतर के संदर्भ में भी जोड़ा है। उनका कहना है कि आधुनिक शिक्षा प्रणाली और पारंपरिक धार्मिक-दार्शनिक संस्थानों के बीच संवाद की कमी अक्सर विवादों को जन्म देती है। यदि प्रशासनिक अनुभव रखने वाले लोग इन दोनों के बीच सेतु का काम करें, तो स्थिति अधिक संतुलित हो सकती है।

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हालांकि, इस विषय पर आधिकारिक स्तर पर विस्तृत बयान सामने नहीं आया है, लेकिन यह स्पष्ट है कि यह घटनाक्रम केवल एक व्यक्ति के इस्तीफे तक सीमित नहीं है। यह उस बड़े विमर्श का हिस्सा है, जिसमें धर्म, शिक्षा, प्रशासन और व्यक्तिगत वैचारिक प्रतिबद्धता एक-दूसरे से टकराते और संवाद करते दिखाई दे रहे हैं।

फिलहाल, सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि संबंधित पूर्व सिटी मजिस्ट्रेट आगे किस दिशा में कदम बढ़ाते हैं,क्या वे वास्तव में धर्म क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाएंगे या किसी अन्य सामाजिक क्षेत्र को चुनेंगे। लेकिन इतना तय है कि उनका यह निर्णय और शंकराचार्य का प्रस्ताव आने वाले समय में चर्चा का विषय बना रहेगा।

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