
14 साल में बनी हल्बी रामायण आज राष्ट्रपति के समक्ष (फोटो सोर्स- पत्रिका)
Halbi Ramayan: बस्तर की लोकभाषा और संस्कृति को नई पहचान देने वाली हल्बी रामायण एक बार फिर चर्चा में है। जिस हल्बी रामायण के दोहे-चौपाई आज बस्तर के गांवों की परंपरा और रीति-रिवाज का हिस्सा बन चुके हैं, वही पुस्तक आज जगदलपुर में बस्तर पंडुम कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के समक्ष प्रस्तुत की जाएगी। साहित्य, कला की प्रदर्शनी के स्टॉल में हल्बी भाषा में अनुवादित श्रीरामचरित मानस और श्रीमद्भागवत गीता भी प्रदर्शित की जाएगी।
बस्तर के ‘तुलसीदास’ कहे जाने वाले दिवंगत रामसिंह ठाकुर ने 14 साल की अथक मेहनत से इसे तैयार किया और 1990 में पूरा करते हुए गांव-गांव तक पहुंचाकर सांस्कृतिक चेतना की अलख जगाई। शनिवार को बस्तर पंडुम में राष्ट्रपति मुर्मु के समक्ष इस कृति का प्रदर्शन किया जाएगा।
रामायण ही नहीं, रामसिंह ठाकुर ने श्रीमद्भागवत का भी हल्बी में अनुवाद कर बस्तर की परंपराओं, रीति-रिवाजों और आस्था को नई पीढ़ी से जोड़ा, जिसके दोहे-चौपाइयां आज भी गांवों की सांस्कृतिक धडकऩ के हिस्सा हैं। उनके लिखे हल्बी गीतों का प्रसारण आज भी जगदलपुर आकाशवाणी से किया जाता है। 90 वर्ष की आयु में वर्ष 2019 में उनकी मृत्यु हो गई।
आदिवासी जनजाति से संबंध रखने वाले कला और संस्कृति के क्षेत्र में रामङ्क्षसह ठाकुर का योगदान अंतरराष्ट्रीय स्तर तक चर्चित रहा है। बीते तीन दशकों से वे बस्तर की आदिवासी जीवनशैली, संस्कृति और सामाजिक परिवेश को अपने कैमरे और कूची से सहेजते रहे। ओडिशा, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के कई विश्वविद्यालयों में उनके कार्यों पर शोध भी किए जा चुके हैं। हल्बी रामायण और हल्बी श्रीमद्भागवत के साथ-साथ ‘बस्तर की लोककथाएं’ (1990) और ‘छत्तीसगढ़ की लोककथाएं’ (2007) सहित उनकी कृतियां लोक साहित्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।
‘बस्तर का लोक जीवन’ को ङ्क्षहदी लोक साहित्य की एक प्रमुख कृति के रूप में देखा जाता है। एक संवेदनशील चित्रकार, फोटोग्राफर, शिल्पकार, मूर्तिकार, साहित्यकार, शिक्षक और पत्रकार के रूप में उनका योगदान बहुआयामी रहा है।
रामसिंह ठाकुर के पुत्र राजधानी निवासी राजेंद्र ङ्क्षसह ने बताया कि 1980 से 1990 के दशक में नक्सलियों व मिशनरियों के बढ़ते प्रभावों पर बस्तर क्षेत्र में हल्बी रामायण ने लोगों में आस्था और भक्ति की अलख जगाई। दबाव पूर्वक धर्म परिवर्तन के खेल में तब स्थानीय भाषा में इस लिखित पुस्तक को मध्यप्रदेश सरकार ने गांव-गांव में पंचायतों के माध्यम से वितरित कराया। मध्यप्रदेश सरकार ने 1990 में व छत्तीसगढ़ सरकार के संस्कृति विभाग ने 2015 में इस पुस्तक का प्रकाशन कराया।
बस्तर पंडुम में महामहिम राष्ट्रपति के आगमन की तैयारी पूरी हो चुकी है। कार्यक्रम के दौरान कला, साहित्य के स्टॉल में हल्बी रामायण भी प्रस्तुत की जा रही है। हल्बी रामायण अब बस्तर अंचल की जनजातीय सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा बन चुका है। - प्रतीक जैन, सीईओ, जिला पंचायत, जगदलपुर
Updated on:
07 Feb 2026 08:41 am
Published on:
07 Feb 2026 08:40 am
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