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जैन विश्व भारती में विरल दीक्षा समारोह, मुमुक्षु सलोनी व मुमुक्षु खुशी ने स्वीकारा संयम जीवन

दीक्षा संस्कार के पश्चात मुमुक्षु सलोनी नखत का आध्यात्मिक नामकरण ‘साध्वी सुकृतप्रभा’ तथा मुमुक्षु खुशी सुराणा का नामकरण ‘समणी गीतप्रज्ञा’ किया गया।

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चूरू. लाडनूं. जैन विश्व भारती (Jain Vishva Bharati Ladnun) की सुधर्मा सभा में आयोजित दीक्षा समारोह उस समय ऐतिहासिक बन गया जब आचार्य महाश्रमण ने मुमुक्षु सलोनी नखत को साध्वी दीक्षा तथा मुमुक्षु खुशी सुराणा को समणी दीक्षा प्रदान की। दीक्षा संस्कार के पश्चात मुमुक्षु सलोनी नखत का आध्यात्मिक नामकरण ‘साध्वी सुकृतप्रभा’ तथा मुमुक्षु खुशी सुराणा का नामकरण ‘समणी गीतप्रज्ञा’ किया गया। योगक्षेम वर्ष के इस दीक्षा समारोह एक विरल विशेषता यह रही कि मुमुक्षु सलोनी नखत की दीक्षा की घोषणा मात्र दो घंटे पूर्व ही हुई। इतने अल्प समय में घोषणा और तत्क्षण दीक्षा सम्पन्न होना अत्यंत दुर्लभ अवसरों में ही संभव होता है।

दीक्षा समारोह में आचार्यश्री ने दीक्षार्थियों से प्रश्नोत्तर कर उनका परीक्षण किया। आगम वाणी के उच्चारण के साथ ही कुछ क्षण पूर्व तक संसारी जीवन में स्थित मुमुक्षु संयम जीवन में प्रविष्ट हो गईं। उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं ने ‘मत्थेण वन्दामि’ के घोष के साथ नवदीक्षितों को वंदन किया। दीक्षा संस्कार के अंतर्गत साध्वी दीक्षा का केशलोचन संस्कार, आचार्यप्रवर की आज्ञा से साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभा द्वारा सम्पन्न हुआ। तत्पश्चात धर्मध्वज ‘रजोहरण’ नवदीक्षित साध्वी को प्रदान किया गया। उल्लेखनीय है कि जैन विश्व भारती, लाडनूं में चल रहे योगक्षेम वर्ष प्रवास के दौरान यह पहला दीक्षा समारोह है।

मंगल देशना में आचार्यप्रवर ने कहा कि 32 आगमों में से दशवैकालिक सूत्र एक मूल आगम है, जो साधु-साध्वियों के लिए अत्यंत स्मरणीय एवं मननीय है। इसमें साधु के आचरण, वाणी, गोचरी की विधि तथा भिक्षु के लक्षणों का विस्तार से वर्णन है। उन्होंने प्रेरणा दी कि साधु-साध्वियां एवं समणियां इस आगम को कंठस्थ रखें और नियमित पारायण करें। यदि प्रतिदिन संभव न हो तो सप्ताह में एक बार अवश्य करें।

उन्होंने कहा कि आचार्य भिक्षु का 300वां जन्म वर्ष ‘भिक्षु चेतना वर्ष’ के रूप में मनाया जा रहा है। दशवैकालिक के दसवें अध्ययन में ‘भिक्खू-भिक्खू’ शब्द की पुनरावृत्ति हमें उसके आदर्शों को आत्मसात करने की प्रेरणा देती है। साधु-साध्वियों, समणियों एवं मुमुक्षुओं में सेवा भाव बना रहे। अपनी शारीरिक एवं बौद्धिक सक्षमता का उपयोग दूसरों के सहयोग और धर्मसंघ की प्रभावना के लिए करें, क्योंकि सक्षमता की सार्थकता उसके सदुपयोग में ही है।

सेवा केंद्रों के संदर्भ में आचार्य ने कहा कि छापर का संत सेवा केंद्र अब जैन विश्व भारती सेवा केंद्र में विलीन हो गया है। उन्होंने उग्रविहारी तपोमूर्ति मुनि कमलकुमार को लाडनूं सेवा केंद्र के लिए नियुक्त किया। योगक्षेम वर्ष के अंतर्गत प्रेक्षाध्यान एवं तत्वज्ञान के प्रशिक्षण कार्यक्रम भी संचालित होंगे। इस अवसर पर ‘योगक्षेम वर्ष कैलेंडर’ एवं ‘मार्गदर्शिका’ पुस्तिकाओं का विमोचन किया गया तथा उनके संदर्भ में प्रेरणा प्रदान की गई।

कार्यक्रम में साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभा ने विचार व्यक्त किए। मुमुक्षु चंदन ने दीक्षार्थी बहनों का परिचय प्रस्तुत किया। मुमुक्षु खुशी सुराणा ने अपने भाव व्यक्त किए। परमार्थिक शिक्षण संस्था से मोतीलाल जीरावाला ने आज्ञापत्र का वाचन किया। दीक्षार्थियों के परिजनों ने गुरुचरणों में पत्र अर्पित कर अपनी सहमति व्यक्त की। मंच संचालन मुनि दिनेश कुमार ने किया। इस अवसर पर बहिर्विहार से मुनि सुमति कुमार, साध्वी तिलकश्री, साध्वी कनकरेखा एवं साध्वी स्वर्णरेखा का समूह उपस्थित हुआ। योगक्षेम वर्ष के संदर्भ में अन्य क्षेत्रों से साधु-साध्वियों के आगमन का क्रम निरंतर जारी है।

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