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375 साल पुरानी महाराणा प्रताप की दुर्लभ राजसी तस्वीर आई सामने, अब 2045 में बनेगा ऐसा अनूठा संयोग

Maharana Pratap Punyatithi 2026: महाराणा प्रताप का सबसे पुराना चित्र जिसमें पहली बार वे राजसी वेशभूषा में आए नजर। उदयपुर के चित्रकार ने वर्षों की मेहनत से चित्र का मूल स्वरूप लौटाया।

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Maharana Pratap Punytithi

चित्र को फाइनल टच देते चित्रकार डॉ. ओमप्रकाश सोनी बिजौलियां (फोटो: पत्रिका)

Rare Royal Portrait of Maharana Pratap: उदयपुर मेवाड़ के नायक महाराणा प्रताप को याद करते ही युद्धभूमि की छवि उभरती है, उनके अधिकांश चित्र भी सैनिक वेशभूषा में ही है। लेकिन वर्ष 2010 में पहली बार महाराणा प्रताप का राजसी वेशभूषा में बना दुर्लभ चित्र सामने आया।

यह चित्र महाराणा प्रताप के प्रपौत्र महाराणा जगतसिंह प्रथम के काल का माना जाता है। इतिहासकारों के अनुसार उस समय के चित्रकारों ने महाराणा प्रताप को देखा था, इसलिए यह चित्र उनकी वास्तविक कद-काठी और चेहरे से मेल खाता है।

करीब 375 वर्ष पुराने इस चित्र में आभामंडल खराब हो चुका था और केवल प्रताप का कटआउट ही बचा था। उदयपुर के चित्रकार डॉ. ओमप्रकाश सोनी (बिजौलियां) ने वर्षों की मेहनत से इसे मूल स्वरूप में पुनर्जीवित किया।

आज महाराणा प्रताप की पुण्यतिथि पर इस दुर्लभ चित्र का पहली बार प्रकाशन किया जा रहा है। ऐतिहासिक तथ्य यह भी है कि छत्रपति शिवाजी के राज्याभिषेक के अवसर पर इसी चित्र की अनुकृति भेजी गई थी।

क्या खास है इस चित्र में

वर्ष 2010 में अपनी पुस्तक महाराणा प्रताप का युग में इसका जिक्र करने वाले इतिहासकार डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू के अनुसार यह महाराणा प्रताप का अब तक ज्ञात सबसे प्राचीन चित्र है। इसमें मेवाड़ की पारंपरिक राजसी वेशभूषा दिखाई देती है। शीर्ष भाग में ईरानी नील पट्टिका पर स्वर्णाक्षरों में प्रताप प्रशस्ति अंकित है।

इसलिए अधिकतर चित्र सैनिक वेश में

महाराणा प्रताप (1572-1597 ई.) का अधिकांश जीवन युद्धों में बीता. इसलिए उनके अधिकांश चित्र सैनिक वेश और शिरस्त्राण-बख्तर में ही उपलब्ध हैं। उनका लोकप्रिय युद्धभूमि वाला चित्र 1900 ई. में दक्षिण के राजा रवि वर्मा ने बनाया था। जिसमें इतिहासकारों के अनुसार उनकी लंबाई कुछ अधिक दर्शाई गई है।

अगली बार 2045 में बनेगा संयोग

महाराणा प्रताप का निधन माघ शुक्ल (जया) एकादशी को हुआ था। आज महाराणा प्रताप की पुण्यतिथि है और संयोगवश आज माघ शुक्ल एकादशी (जया एकादशी) भी है। यह संयोग 19 से 21 वर्ष में एक बार बनता है। सुखाड़िया विवि के आचार्य नीरज शर्मा के अनुसार इससे पहले यह संयोग 1969, 1987, 2007 में बने। अगली बार संयोग 2045, 2064 और 2083 में आएंगे।