
बांग्लादेश की जमीनी हकीकत: क्या चुनाव से लोकतंत्र बहाल होगा? (फोटो में बांग्लादेश की महिलाएं) सोर्स: आईएएनएस
Bangladesh Elections: बांग्लादेश में इस चुनाव में एक नई बात हो रही है। चुनाव लड़ रहे 1981 उम्मीदवारों में से 1518 पहली बार चुनावी मैदान में उतरे हैं। और, मतदान से महज एक साल पहले बनी एक पार्टी भी चुनाव लड़ रही है। नेशनल सिटिजंस पार्टी (एनसीपी)। यह फरवरी 2025 में उन युवाओं द्वारा बनाई गई, जिन्होंने शेख हसीना की सरकार का तख़्तापलट किया था। साथ ही, 1991 के बाद पहली बार हो रहा है कि चुनाव शेख हसीना और बेगम खालिदा जिया के बिना हो रहा है। पर सवाल यही है कि क्या चुनाव से लोकतंत्र बहाल होगा?
जवाब: वोट, जिससे हमें सही कीमत पर खाना मिल जाए। स्कूल-कॉलेज मिल जाएं। मेडिकल कॉलेज हो तो, सरकारी हो
जवाब: सांसद बनने के लिए तो आपके पास बहुत पैसा होना चाहिए। मैं तो खेतों में काम करने वाला मजदूर हूं। मैं कभी प्रधानमंत्री नहीं बन सकता। पर मेरा आत्मसम्मान बना रहे, ताकि मैं भी सबके बीच खड़ा रह सकूं। ऐसा होना चाहिए।
यह दक्षिणी ढाका के बाजार में लिए गए एक खेतिहर मजदूर के इंटरव्यू का अंश है। उनके गांव में एक सर्वे हो रहा था। उसी के तहत उनका यह इंटरव्यू लिया गया था।
इंटरव्यू का यह अंश 2011 में छपी किताब 'ट्रिस्ट्स विद डेमोक्रेसी: पॉलिटिकल प्रैक्टिस इन साउथ एशिया' के चैप्टर 'डेमोक्रेसी इन बांग्लादेश: ए विलेज व्यू' में शामिल है। इस चैप्टर के लेखक अरिल्ड एंजेलसेन रूड हैं।
इस सवाल-जवाब से पता चलता है कि आम जनता के लिए लोकतंत्र का मतलब क्या है और उसे लोकतंत्र से क्या उम्मीदें रहती हैं? आज, 2026 में इस पैमाने पर बांगलदेश का सूरत-ए-हाल देखा जाए तो क्या यह कहा जा सकता है कि चुनाव के बाद वहां लोकतंत्र आ जाएगा या तख्तापलट से पहले वहां लोकतंत्र था? बांग्लादेश चुनाव की अहमियत और उसकी कामयाबी को भी इसी पैमाने पर आंका जा सकता है।
इस बातचीत से साफ है कि वोट देना लोकतंत्र का मूल तत्व समझा जाता है। लोकतंत्र बोलते ही दिमाग में पहली बात यही आती है। फिर, वोट के साथ दूसरी उम्मीदें जुड़ी होती हैं- सही या किफ़ायती दर पर खाना, स्कूल-कॉलेज जैसी बुनियादी सुविधाएं और विकास। मतलब लोकतंत्र से विकास जुड़ा हुआ है।
तीसरा तत्व 'प्रतिनिधित्व' या 'रिप्रेजेंटेशन' का है। इस सवाल-जवाब से यही लग रहा है कि आम लोग यह नहीं मानते कि कोई आम आदमी अच्छा नेता साबित होगा।
सर्वे में शामिल ज़्यादातर लोगों की राय से चौथी बात यह निकल कर सामने आई कि नेताओं को अमीर और मददगार होना चाहिए।
मजदूर के जवाब से अंतिम बात यह निकली कि लोकतंत्र का मतलब समानता भी है। गरीब से गरीब व्यक्ति को भी भेदभाव का अहसास नहीं हो। लोकतंत्र का मतलब कहीं न कहीं आत्मसमान भी है। इस किताब को आए 15 साल हो गए हैं, पर क्या बांग्लादेश में उस मजदूर के सपनों का लोकतंत्र हकीकत बन पाया है? समझते हैं।
बांग्लादेश में खाने-पीने की चीजें लगातार महंगी हो रही हैं। खाद्य मुद्रा स्फीति दर (food inflation) नवंबर में 7.36 प्रतिशत, दिसंबर में 7.71 प्रतिशत और जनवरी में 8.29 प्रतिशत पर पहुंच गई। बांग्लादेश की करीब 40 फीसदी आबादी 30 साल से कम की है।
]ढाका स्थित कम्युनिकेशन रिसर्च फ़ाउंडेशन एंड बांग्लादेश इलेक्शन्स के एक हालिया सर्वे में दो-तिहाई से ज्यादा लोगों ने महंगाई को दूसरी सबसे बड़ी समस्या बताया। ताजा सरकारी आंकड़ों के मुताबिक जनवरी में महंगाई दर 8.58 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। जबकि लोगों की कमाई मात्र 0.1 फीसदी बढ़ कर 8.08 पर पहुंची है। चार साल से लगातार कमाई की दर महंगाई दर से पीछे ही चल रही है।
हाल में थिंकटैंक कैंपेन फॉर पॉपुलर एजुकेशन (CAMPE) ने ढाका में एक संवाद कार्यक्रम कराया था। इसमें विशेषज्ञों ने जो बातें बताईं, वे बांग्लादेश में शिक्षा की धुंधली तस्वीर पेश करती हैं। उनके मुताबिक देश में एजुकेशन सिस्टम को मजबूत करने के लिए कोई लंबा और ठोस प्लान ही नहीं है। इस पर पैसा भी जरूरत से काफी कम खर्च किया जा रहा है।
ब्राक यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मंजूर अहमद ने कहा कि 55 साल से हर सरकार ने शिक्षा क्षेत्र की अनदेखी की है। देश में दशकों से एजुकेशन सेक्टर को आगे बढ़ाने की किसी योजना के बिना ही चलाया जा रहा है।
CAMPE के प्रोग्राम मैनेजर अब्दुर रौफ ने कहा कि स्कूलों में दाखिले तो बढ़े हैं, लेकिन नतीजे उम्मीद से कम रहे हैं। उन्होंने गरीबी, बाल मजदूरी, बाल विवाह, मौसमी चुनौतियां, बुनियादी ढांचे की कमी, शिक्षकों की कमी आदि को इसका कारण बताया। उन्होंने शिक्षा पर जीडीपी का 4-6 प्रतिशत खर्च करने की जरूरत बताई।n शिक्षा के लिए बनी राष्ट्रीय नीति 2010 की बनी है। विशेषज्ञ तत्काल इसकी समीक्षा की जरूरत बताते रहे हैं।
बुनियादी ढांचे के विकास की बात करें तो बांग्लादेश यूनिवर्सिटी ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नालजी (BUET) में सिविल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर डॉ मोहम्मद शमसूल हक का कहना है कि समग्र बुनियादी ढांचे- सड़कें, हाईवेज, पुल - आदि की बात करें तो ये सारे प्रोजेक्ट्स बड़े बेतरतीब तरीके से बने हैं। इसलिए इनका उतना फायदा नहीं मिल पाता, जितना मिलना चाहिए। ये सब यात्रियों को ध्यान में रख कर बनाए गए हैं, सामान ढोने को ध्यान में रख कर नहीं। ये सब शहरी यातायात (निजी वाहनों) को ध्यान में रख कर बनाए गए, पब्लिक ट्रांसपोर्ट को ध्यान में रख कर नहीं। ढाका, चटगांव जैसे शहरों में ट्रैफिक जाम कम करने के मकसद से फ्लाइओवर्स बनाए गए, लेकिन असल में जाम ज्यादा होने लगे।
जहां तक समाज में बराबरी की बात है तो बांग्लादेश में 15-65 साल की केवल 14 फीसदी महिलाओं को काम मिला हुआ है। इनमें से 92 फीसदी असंगठित क्षेत्र में काम करती हैं, जहां उन्हें पुरुषों से कम पैसे मिलते हैं और भेदभाव भी झेलना पड़ता है। मैनेजर लेवल पर 92 फीसदी पुरुष काबिज हैं। केवल 15 फीसदी फर्म्स ऐसी हैं, जिनमें महिलाएं ओनर या को-ओनर हैं।
पैसों के मामले में महिलाओं को पुरुषों की तुलना में काफी कम अधिकार दिए गए हैं। चौथाई महिलाएं तो बेगारी (बिना पगार के काम) करती हैं, जबकि केवल पांच फीसदी पुरुष ऐसे काम में लगे होते हैं। ज़्यादातर महिलाओं को अपनी कमाई पुरुषों को देनी होती है। केवल 36 फीसदी महिलाओं के पास बैंक खाते हैं। शादी की न्यूनतम उम्र 18 वर्ष तय की गई है, लेकिन आधी से ज्यादा लड़कियों की शादी इस उम्र तक पहुंचने से पहले ही हो जाती है।
महिलाओं की जो सामाजिक स्थिति है, उसमें वह राजनीति में भी सक्रिय नहीं हो सकतीं। उन्हें अपनी मर्जी से वोट तक नहीं देने दिया जाता। गांवों में तो हालात और भी बुरे हैं।
Updated on:
12 Feb 2026 02:43 pm
Published on:
12 Feb 2026 04:25 am
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