
खेत तालाब
जल गंगा संवर्धन अभियान के तहत जिले में जल संरक्षण और ग्रामीण रोजगार सृजन के उद्देश्य से स्वीकृत किए गए खेत तालाबों का काम प्रशासनिक लापरवाही की भेंट चढ़ता नजर आ रहा है। जिले में कुल 1889 खेत तालाब स्वीकृत किए गए थे, लेकिन निर्धारित छह माह की समय सीमा बीत जाने के बावजूद अब तक केवल 303 तालाब ही पोर्टल पर पूर्ण दर्शाए जा सके हैं। शेष 1576 तालाब अब भी निर्माणाधीन बताए जा रहे हैं, जबकि कई स्थानों पर कार्य वास्तविक रूप से पूरा हो चुका है।
इस योजना के लिए लगभग 66 करोड़ रुपए की राशि स्वीकृत की गई थी, जिसमें से करीब 28 करोड़ रुपए खर्च भी हो चुके हैं। इसके बावजूद न तो जल संरक्षण का उद्देश्य धरातल पर पूरी तरह साकार हो पा रहा है और न ही मजदूरों को समय पर मजदूरी मिल पा रही है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि कार्य पूर्ण होने के बाद भी संबंधित उपयंत्री और सहायक यंत्री कार्य पूर्णता प्रमाण-पत्र (सीसी) जारी नहीं कर रहे हैं, जिससे पंचायतों में नए विकास कार्य अटक गए हैं।
गौरिहार जनपद की स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक बनी हुई है। यहां स्वीकृत 201 खेत तालाबों में से मात्र 25 को ही पूर्ण दिखाया गया है, जबकि 176 तालाब पोर्टल पर अब भी अधूरे दर्ज हैं। बीते दिनों कलेक्टर और जिला पंचायत सीईओ द्वारा बैठक लेकर गौरिहार के सहायक यंत्री मधु प्रजापति को स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि जो तालाब पूर्ण हो चुके हैं, उनकी सीसी शीघ्र जारी की जाए। लेकिन निर्देशों के 20 दिन बाद भी केवल एक तालाब की ही सीसी जारी हो सकी।
हालत यह है कि जनपद में सीसी जारी करने के लिए कैंप आयोजित होने के बावजूद संबंधित अधिकारी उसमें रुचि लेते नजर नहीं आए। पंचायतों से जियो-टैगिंग की फोटो मंगाई जा रही है, जबकि कार्य की ईएमबी सत्यापन और भौतिक जांच की जिम्मेदारी स्वयं सहायक यंत्री की होती है। पोर्टल पर पहले से ही जियो-टैग फोटो उपलब्ध होने के बावजूद मौके पर जाकर कार्य देखने से बचने के लिए पंचायतों पर अतिरिक्त बोझ डाला जा रहा है। इस लापरवाही का सीधा असर पंचायत स्तर पर विकास कार्यों पर पड़ रहा है। पुराने कार्य पोर्टल पर पेंडिंग होने के कारण नए कार्य स्वीकृत नहीं हो पा रहे हैं।
गौरिहार के अलावा जिले के अन्य जनपदों में भी स्थिति कुछ अलग नहीं है। बड़ामलहरा में 233, बिजावर में 195, बकस्वाहा में 144, छतरपुर में 195, लवकुशनगर में 165, नौगांव में 234 और राजनगर में 234 खेत तालाब जल गंगा संवर्धन अभियान के पोर्टल पर लंबित दिख रहे हैं। कुल मिलाकर, कलेक्टर और जिला पंचायत सीईओ की बैठकों और निर्देशों के बावजूद जमीनी स्तर पर अपेक्षित सुधार नहीं दिख रहा है। यदि समय रहते उपयंत्री और सहायक यंत्री स्तर पर जवाबदेही तय नहीं की गई, तो जल संरक्षण और ग्रामीण रोजगार के उद्देश्य से शुरू की गई यह महत्वपूर्ण योजना कागजों में ही सिमटकर रह जाने का खतरा बना हुआ है।
Published on:
10 Feb 2026 10:46 am
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