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स्वास्थ्य शिविरों के नाम पर शहर में ठगी का संगठित खेल, मरीजों को डराकर महंगे निजी हायर सेंटर रेफर करने का बन चुका है पूरा मॉडल

शहर और जिले में निजी अस्पतालों द्वारा लगाए जा रहे तथाकथित स्वास्थ्य शिविर अब जनसेवा का माध्यम नहीं रह गए हैं। ये शिविर डर, भ्रम और भय के जरिए कमाई का सुनियोजित तंत्र बनते जा रहे हैं। हाल ही में आयोजित हुए शिविरो में सामने आया है कि ऐसे अधिकांश शिविर खासतौर पर रविवार के […]

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शहर और जिले में निजी अस्पतालों द्वारा लगाए जा रहे तथाकथित स्वास्थ्य शिविर अब जनसेवा का माध्यम नहीं रह गए हैं। ये शिविर डर, भ्रम और भय के जरिए कमाई का सुनियोजित तंत्र बनते जा रहे हैं। हाल ही में आयोजित हुए शिविरो में सामने आया है कि ऐसे अधिकांश शिविर खासतौर पर रविवार के दिन लगाए जाते हैं, जब शासकीय अस्पतालों की ओपीडी सीमित रहती है और आम नागरिक विकल्प की कमी के कारण इन शिविरों पर भरोसा कर लेता है। इसी मजबूरी का फायदा उठाकर मरीजों को सामान्य जांच के बाद ही गंभीर बीमारी का भय दिखाया जाता है।

सामान्य जांच, लेकिन बीमारी बता रहे जानलेवा

सूत्रों के अनुसार इन शिविरों में ब्लड प्रेशर, शुगर, ईसीजी जैसी सामान्य जांच के बाद मरीज को हार्ट, किडनी या अन्य गंभीर बीमारी बताकर मानसिक रूप से घेर लिया जाता है। इसके बाद तत्काल इलाज की जरूरत बताकर महंगे निजी अस्पतालों या बड़े शहरों के तथाकथित हायर सेंटर में रेफर कर दिया जाता है। कई मामलों में मरीज और उसके परिजन डर के कारण बिना सोचे-समझे एंबुलेंस से सीधे निजी अस्पताल पहुंचा दिए जाते हैं।

जांच से दवा तक, हर स्तर पर वसूली

इन शिविरों में जांच और दवाओं के नाम पर भी जमकर वसूली की जा रही है। महंगी दवाएं लिखी जाती हैं, जिनकी तत्काल कोई आवश्यकता नहीं होती और न ही उनके सस्ते या वैकल्पिक विकल्प मरीज को बताए जाते हैं। जांच, दवा, एंबुलेंस और रेफर, हर स्तर पर कमीशन की पहले से तय सेटिंग होने की बात सामने आ रही है।

डॉक्टर कौन? डिग्री कहां? अनुमति किसकी?

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि कई शिविरों में यह तक स्पष्ट नहीं होता कि जांच करने वाला व्यक्ति वास्तव में डॉक्टर है भी या नहीं। न तो शिविर स्थल पर डॉक्टर का नाम, डिग्री और मेडिकल काउंसिल पंजीयन संख्या प्रदर्शित की जाती है और न ही स्वास्थ्य विभाग की अनुमति या निगरानी दिखाई देती है। कई बार ऐसे शिविरों की जानकारी स्वास्थ्य विभाग को दी ही नहीं जाती।

सेकंड ओपिनियन ने खोली सच्चाई

हाल ही में जिले के एक रविवार शिविर का मामला सामने आया, जहां एक मरीज को बायपास सर्जरी की जरूरत बताकर बड़े शहर के निजी अस्पताल रेफर कर दिया गया। परिजनों ने जब दूसरे चिकित्सक से परामर्श लिया तो बीमारी सामान्य पाई गई। यदि समय रहते सेकंड ओपिनियन नहीं लिया जाता, तो मरीज अनावश्यक इलाज और भारी आर्थिक बोझ के जाल में फंस सकता था।

नियम क्या कहते हैं

नियमों के अनुसार किसी भी स्वास्थ्य शिविर के आयोजन के लिए स्वास्थ्य विभाग को पूर्व सूचना और अनुमति देना अनिवार्य है। शिविर स्थल पर डॉक्टर का नाम, डिग्री और मेडिकल काउंसिल पंजीयन संख्या स्पष्ट रूप से प्रदर्शित होना चाहिए। केवल शिविर के आधार पर मरीज को तत्काल हायर सेंटर रेफर करना नियम सम्मत नहीं है। डर दिखाकर इलाज या दवा थोपना न केवल अनैतिक है, बल्कि नियमों के भी खिलाफ है।

सतर्कता ही बचाव का रास्ता

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि नागरिकों को ऐसे शिविरों को लेकर विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए। यदि किसी बीमारी को गंभीर बताया जाए तो तुरंत सेकंड ओपिनियन लें। सरकारी अस्पताल या मेडिकल कॉलेज में जांच अवश्य कराएं। दवाओं की जरूरत, अवधि और विकल्पों के बारे में सवाल करना जरूरी है। खासकर रविवार को लगने वाले शिविरों में बिना पुष्टि किसी भी इलाज या रेफर के लिए सहमति देना मरीज के लिए भारी नुकसान का कारण बन सकता है।

स्वास्थ्य विभाग का दावा: होगी सख्त कार्रवाई

इस पूरे मामले पर मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. आरपी गुप्ता ने कहा कि निजी अस्पतालों द्वारा लगाए जा रहे स्वास्थ्य शिविरों पर विभाग की कड़ी नजर है। बीएमओ और अन्य स्वास्थ्य अधिकारियों को निर्देश दिए जा रहे हैं कि ऐसे शिविरों की जांच कर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करें। नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर संबंधित संस्थानों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।