
आंखों में जलन, चुभन, भारीपन और सांस के मरीजों की पेरशानी तेजी से बढ़ रही है। एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआई) 200 के पार यानी खराब श्रेणी में बना है
बीते सात दिनों में औसत एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआई) 200 के पार यानी खराब श्रेणी में बना है
शहर में सुबह और शाम की हवा अब राहत नहीं, बल्कि बीमारी बांट रही है। लोगों को जो हल्की धुंध दिखाई दे रही है, वह कोहरा नहीं बल्कि धूल और प्रदूषण से बना घातक स्मॉग है। इसका सीधा असर लोगों की सेहत पर दिखने लगा है। आंखों में जलन, चुभन, भारीपन और सांस के मरीजों की पेरशानी तेजी से बढ़ रही है। बीते सात दिनों में औसत एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआई) 200 के पार यानी खराब श्रेणी में बना है। प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण पीएम 2.5 यानी धूल के बारीक कण हैं जो फेफड़ों तक पहुंचकर गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ाते हैं। पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ अनीश पाण्डे के मुताबिक, इस तरह से देखें तो मौजूदा हालात में शहरवासी रोजाना 10 सिगरेट पीने के बराबर पदूषण सांस के जरिए शरीर में ले रहे हैं। इससे आंखों में जलन, चुभन, भारीपन, सांस फूलना और दमा के मरीजों की परेशानी तेजी से बढ़ी है।
हवा में धूल के कण (पीएम 2.5) की मात्रा 22 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर…ये प्रदूषण एक सिगरेट के धुएं के बराबर, हर दिन 10 सिगरेट के बराबर प्रदूषण फेफड़ों में
पर्यावरण विशेषज्ञ पाण्डे के मुताबिक, मौजूदा हालात में ग्वालियरवासी रोजाना करीब 10 सिगरेट पीने के बराबर प्रदूषण सांस के जरिए शरीर में ले रहे हैं, चाहे वे धूम्रपान करते हों या नहीं। विशेषज्ञों के अनुसार जब हवा में पीएम 2.5 (धूल के बेहद बारीक कण) की मात्रा 22 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर होती है, तो उसे एक सिगरेट के धुएं के बराबर माना जाता है। ग्वालियर में बीते सात दिनों में पीएम 2.5 का स्तर करीब 200 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर तक पहुंच गया है। इसी आधार पर यह आकलन किया गया है कि शहरवासी रोजाना 10 सिगरेट जितना ज़हर सांस में भर रहे हैं।
ऐसे समझे प्रदूषण बढऩे की तीन बड़ी वजह
धूल निर्माण कार्य : शहर में चल रहे निर्माण कार्यों से सडक़े खुली हैं। वाहनों में भी महीन धूल उडकऱ हवा में घुल रही है जो कि सीधे लोगों के फेफड़ों तक पहुंच रही है।
वाहन प्रदूषण : पीक आवर्स में रेंगता ट्रैफिक नाइट्रोजन ऑक्साइड और अन्य जहरीली गैसों का स्तर बढ़ रहा है। खासकर डीजल वाहनों का धुआं स्मॉग को और घना बना देता है।
मौसम की मार : ठंड में हवा की रफ्तार कम हो जाती है। इससे प्रदूषक कण ऊपर फैलने की बजाय जमीन के पास ही जमा हो जाते हैं। 10 से 15 दिनों तक धूल नीचे जमी रहने से यह स्मॉग बन जाती है।
पीएम 2.5 जो दिखता नहीं, वही सबसे खतरनाक
पीएम 2.5 के कण इतने महीन होते हैं कि नाक और गले की फिल्टरिंग को पार कर जाते हैं। यह सीधे फेफड़ों में जमा हो जाते हैं जो कि खून में घुलकर दिल और दिमाग तक असर डालते है। यही कारण है कि यह प्रदूषण धीमा ज़हर बनकर काम करता है।
चेतावनी साफ है, सिस्टम खामोश
डॉक्टर और पर्यावरण विशेषज्ञ लगातार चेतावनी दे रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर न तो धूल नियंत्रण है, न ट्रैफिक मैनेजमेंट और न ही सख्त कार्रवाई। ग्वालियर की हवा अब सिर्फ खराब नहीं, बल्कि लगातार जानलेवा होती जा रही है।
Published on:
19 Jan 2026 11:16 pm
बड़ी खबरें
View Allग्वालियर
मध्य प्रदेश न्यूज़
ट्रेंडिंग
