
कुडलसंगम स्थित संगमेश्वर मंदिर
संगम पर बसा शिवधाम
बागलकोट जिले के कुडलसंगम स्थित ऐतिहासिक और पवित्र संगमेश्वर मंदिर, जो दो पवित्र नदियों के संगम पर स्थित होने के कारण आध्यात्मिक ऊर्जा का अनूठा केंद्र माना जाता है। संगमेश्वर मंदिर कृष्णा और मलप्रभा नदियों के संगम पर स्थित है। नदी संगम को भारतीय परंपरा में विशेष पवित्र माना जाता है, और इसी कारण यह स्थल सदियों से भक्तों की आस्था का केंद्र बना हुआ है। यहां भगवान शिव संगमेश्वर रूप में विराजमान हैं और लिंगायत समुदाय के लिए यह अत्यंत पावन तीर्थस्थल माना जाता है।
बसवन्ना से जुड़ा आध्यात्मिक केंद्र
कुडलसंगम का महत्व 12वीं सदी के महान संत और समाज सुधारक बसवन्ना से भी जुड़ा है। माना जाता है कि उन्होंने अपने जीवन का प्रारंभिक काल यहीं बिताया और अपने आराध्य को कुडलसंगम देव कहकर संबोधित किया। इस कारण यह स्थान लिंगायत दर्शन और सामाजिक समरसता के संदेश का भी प्रमुख केंद्र बन गया।
प्राचीन चालुक्य स्थापत्य की झलक
मंदिर का मूल निर्माण चालुक्य काल (लगभग 8वीं से 11वीं शताब्दी) में हुआ माना जाता है। पत्थरों से निर्मित यह मंदिर शुरुआती चालुक्य स्थापत्य शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग, विशाल मंडप, नक्काशीदार स्तंभ तथा द्रविड़ शैली का शिखर मंदिर को विशिष्ट सौंदर्य प्रदान करते हैं। समय-समय पर इसमें अन्य संरचनाएं भी जोड़ी गईं, जिससे परिसर का विस्तार हुआ।
बसवन्ना समाधि और आध्यात्मिक परिसर
मंदिर के निकट बसवन्ना की समाधि स्थित है, जो कभी-कभी नदी के जलस्तर बढऩे पर आंशिक रूप से जल में डूब जाती है। इसे भक्त भगवान में उनकी पूर्ण एकता का प्रतीक मानते हैं। परिसर में श्रद्धालुओं के ठहरने की व्यवस्था, बसवन्ना की शिक्षाओं को दर्शाता संग्रहालय तथा संगम दृश्य बिंदु भी आकर्षण का केंद्र हैं।
भक्ति, संस्कृति और विरासत का संगम
लिंगायत परंपरा के प्रमुख उत्सवों और यात्राओं के दौरान यहां हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। संगमेश्वर मंदिर केवल पूजा का स्थान ही नहीं, बल्कि कर्नाटक के भक्ति आंदोलन, स्थापत्य कला और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां विशेष पूजा-अर्चना और संगम स्नान का महत्व और भी बढ़ जाता है। भक्तों के लिए यह स्थान शिवभक्ति, शांति और आध्यात्मिक अनुभूति का अनूठा केंद्र है।
Published on:
11 Feb 2026 08:57 pm
