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संपादकीय: व्यवस्था और अभिभावकों की साझी जिम्मेदारी

आंकड़े इस बात को बखूबी बयां करते हैं कि किस तरह से नाबालिगों का वाहन चलाना जोखिम भरा है। वर्ष २०२३-२४ के दौरान देश में नाबालिगों द्वारा वाहन चलाने से 11,890 हादसे हुए जिनमें 2,537 मौतें हो गईं।

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सुप्रीम कोर्ट का यह कहना कि बच्चों को ऐश के लिए पैसा और कार की चाबियां थमाने के लिए माता-पिता जिम्मेदार हैं, यह केवल एक टिप्पणी नहीं, बल्कि समाज के लिए चेतावनी भी है। खासतौर से यह चेतावनी उन अभिभावकों के लिए है, जो जाने-अनजाने अपने नाबालिग बच्चों के हाथों में न सिर्फ वाहन, बल्कि जोखिम और मौत की चाबियां सौंप रहे हैं। चेतावनी उस व्यवस्था के लिए भी है, जो हादसों के बाद महज मौतों और घायल होने वालों के आंकड़े गिनकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेती है।


आंकड़े इस बात को बखूबी बयां करते हैं कि किस तरह से नाबालिगों का वाहन चलाना जोखिम भरा है। वर्ष २०२३-२४ के दौरान देश में नाबालिगों द्वारा वाहन चलाने से 11,890 हादसे हुए जिनमें 2,537 मौतें हो गईं। ये महज नंबर नहीं है। हर नंबर के पीछे एक परिवार का उजडऩा, एक भविष्य का खत्म होना तो है ही, इसमें समाज की सामूहिक विफलता छिपी है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि नाबालिगों को वाहन चलाने देना महज कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि सामाजिक अपराध है, जिसकी जिम्मेदारी सीधे तौर पर माता-पिता पर आती है। अदालत का यह रुख उस मानसिकता पर करारा प्रहार है, जिसमें बच्चा है, सीख जाएगा या थोड़ा बहुत चलाने से क्या होगा जैसी दलीलें दी जाती हैं। हकीकत यह है कि आज बच्चों के हाथ में मोबाइल की तरह ही वाहन की चाबी आसानी से पहुंच रही है।


आधुनिकता और दिखावे की होड़ में अभिभावक यह भूल जाते हैं कि सड़क कोई खेल का मैदान नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और अनुशासन भरी राह है। वाहन चलाना केवल संतुलन और रफ्तार का सवाल नहीं, बल्कि निर्णय क्षमता, कानून की समझ और मानवीय संवेदनशीलता की मांग करता है। ये सब नाबालिग उम्र में स्वाभाविक रूप से विकसित नहीं होती। इसीलिए कानूनी प्रावधान भी इसी हिसाब से किए गए हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हादसे के बाद नाबालिग के नाम पर सहानुभूति बटोरना या परिवार की सामाजिक हैसियत का हवाला देना सजा से बचने का रास्ता कतई नहीं हो सकता। कानून की नजर में जिम्मेदार वही होगा, जिसने नियम तोडऩे की छूट दी- चाहे वह माता-पिता हों, वाहन मालिक हों या लाइसेंसिंग और पुलिस व्यवस्था की ढिलाई। यह तथ्य भी उतना ही चिंताजनक है कि कई मामलों में हादसे के बाद सबूत मिटाने, ड्राइवर बदलने या रसूख के दम पर मामले को हल्का करने की कोशिशें होती हैं।अभिभावकों को समझना होगा कि बच्चों को अनुशासन सिखाना, 'ना' कहना और नियमों की सीमा तय करना भी उतना ही जरूरी है जितना उन्हें सुविधाएं देना। सरकार और प्रशासन को लाइसेंस प्रणाली, वाहन पंजीयन और यातायात निगरानी को और सख्त बनाना होगा। अब भी अनसुनी की गई, तो हर अगला हादसा सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि सामूहिक लापरवाही का प्रमाण होगा।

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