
पेड़ के नीचे और कुछ मिल सकता है अक्ष माहेश्वरी, उम्र 11 वर्ष एक बार एक लालची व्यक्ति था। उसने किसी को पेड़ के पास जमीन खोद कर कुछ छुपाते देखा। उसने सोचा अगर कोई कीमती चीज होगी मैं चुपके से ले जाऊंगा और मेरा भाग्य खुल जाएगा। अगली रात वह जमीन खोदकर निकालने लगा। तो उसको सोने की एक ईंट मिली। उसने सोचा पेड़ के नीचे और कुछ मिल सकता है। तो उसने और खुदाई की। अचानक पेड़ उसके ऊपर गिर गया और वह उसके नीचे दब कर घायल हो गया। तब असली मालिक आया और उसने अपनी सोने की ईंट लेकर उसको अस्पताल पहुंचाया। तब लालची व्यक्ति को लगा कि हमको दूसरे की चीज छीनने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।
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मेहनत की कमाई
समरवीर सिंह राठौड़, उम्र 13 वर्ष
रामपुर गांव में 'धनीराम' नाम का एक सीधा-साधा किसान रहता था। धनीराम के पास विरासत में मिली एक छोटी सी जमीन थी, लेकिन वह बहुत आलसी था। वह हमेशा शॉर्टकट से अमीर बनने के सपने देखता था। एक दिन उसे गांव के एक पुराने किस्से का पता चला कि उसके खेत के पुराने बरगद के पेड़ के नीचे पूर्वजों का खजाना गड़ा है। अगले ही दिन, धनीराम अपनी कुदाल लेकर बरगद के पेड़ के पास पहुंच गया। चिलचिलाती धूप में वह घंटों गड्ढा खोदता रहा। जैसे-जैसे सूरज चढ़ता गया, उसका पसीना बहने लगा, लेकिन लालच ने उसे रुकने नहीं दिया। अचानक, उसकी कुदाल किसी कठोर चीज से टकराई। धनीराम की आंखें चमक उठीं। उसने जल्दी-जल्दी मिट्टी हटाई और देखा कि वहां सचमुच एक चमकता हुआ स्वर्ण खंड (सोने का टुकड़ा) था। धनीराम ने कांपते हाथों से उस चमकते हुए सोने को बाहर निकाला। उसने उसे अपने सीने से लगा लिया। उसे लगा कि अब उसे जीवन भर काम करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। लेकिन जैसे ही वह घर की ओर मुड़ा, उसने अपने आसपास की उपजाऊ मिट्टी और खोदे गए गहरे गड्ढे को देखा। उसे महसूस हुआ कि जितनी मेहनत उसने इस एक सोने के टुकड़े के लिए आज की है, यदि वह उतनी ही मेहनत रोज अपनी जमीन पर करता, तो यह धरती उसे हर साल 'अनाज रूपी सोना' देती। धनीराम को समझ आ गया कि भाग्य से मिला धन एक बार खत्म हो सकता है, लेकिन मेहनत से कमाई गई संपत्ति सदा बनी रहती है। उसने उस सोने के टुकड़े को बेचकर नए बीज और हल खरीदे और गांव का सबसे मेहनती किसान बन गया।
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सच्ची खुशी मेहनत में है
ईशिता संघवी, उम्र 13 वर्ष
एक दिन एक जवान आदमी खेत में खड़ा था, उसके हाथ में एक फावड़ा था। वह एक पेड़ के पास मिट्टी खोदने लगा। जब उसने गहराई में खुदाई की, तो उसे एक पीला चमकता हुआ डिब्बा मिला। जैसे ही उसने डिब्बे को उठाया, उसमें से चमक की किरणें निकलने लगीं। उसने सोचा कि यह कोई खजाने का डिब्बा है। वह खुशी से झूम उठा और डिब्बे को खोलने की कोशिश करने लगा। डिब्बे के अंदर सोने के सिक्के और कीमती रत्न थे। अचानक उसकी आंखें चकाचौंध हो गईं और वह सोचने लगा कि इस खजाने का क्या करे। उसने फैसला किया कि वह इस खजाने को अपने परिवार के साथ बांटेगा और इससे अपने जीवन को बेहतर बनाएगा। लेकिन जब उसने डिब्बे को खोलकर देखा, तो उसमें एक नोट भी था जिस पर लिखा था - "सच्ची खुशी मेहनत में है, खजाने में नहीं।" उस आदमी ने सोचा और उसने उस खजाने को एक गरीब आदमी को देने का फैसला किया जिसने उसकी मदद की थी। और उसने अपने जीवन में मेहनत करने का वादा किया।
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गांव में सबकी मदद करेगा
अनीष्क अग्रवाल, उम्र 13 वर्ष
एक बार की बात है। एक गरीब लकड़हारा जंगल में लकड़ी काटने जाता था। उसका नाम था रामू। वह रोज सुबह जल्दी उठता कुल्हाड़ी कंधे पर रखता और घने जंगल की ओर चल पड़ता। उस दिन भी वह पुराने बरगद के पेड़ के पास पहुंचा जो सूख रहा था। रामू ने सोचा, "इस पेड़ की लकड़ी अच्छी बिकेगी।" उसने जोर-शोर से कुल्हाड़ी चलानी शुरू की। कई घंटों की मेहनत के बाद पेड़ गिरने वाला था। अचानक कुल्हाड़ी का एक जोरदार प्रहार हुआ और पेड़ की जड़ के पास से मिट्टी उछल पड़ी। रामू ने देखा तो उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं। वहां एक चमकदार सोने की ईंट पड़ी थी! रामू ने हाथ बढ़ाकर उसे उठाया। ईंट इतनी भारी थी कि उसे दोनों हाथों से पकड़ना पड़ा। उसके मन में हजारों ख्याल दौड़ने लगे अब वह अमीर हो जाएगा, घर बनवाएगा, बच्चों को अच्छी पढ़ाई दिलाएगा, गांव में सबकी मदद करेगा।
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सच्चाई की चमक
जयंत सैनी, उम्र 11 वर्ष
एक गांव में मोहन नाम का एक ईमानदार किसान रहता था। वह रोज मेहनत करके अपना जीवन चलाता था। एक दिन वह खेत में एक पुराने पेड़ की जड़ खोद रहा था। तभी उसकी कुदाल किसी सख्त चीज से टकराई। उसने मिट्टी हटाई तो जमीन में दबा हुआ एक चमकदार डिब्बा दिखाई दिया। मोहन ने डिब्बा खोला तो उसमें सोने की ईंट थी। उसे देखकर वह बहुत खुश हुआ। लेकिन थोड़ी देर बाद उसके मन में अपने माता-पिता की सीख याद आई कि गलत रास्ते से मिला धन सुख नहीं देता। तभी कुछ गांव वाले वहां आए और उसे सोना छिपाने को कहा। मोहन ने उनकी बात नहीं मानी। वह सोने का डिब्बा लेकर सीधे गांव के मुखिया के पास गया और पूरी सच्चाई बता दी। मुखिया ने जांच करवाई और पता चला कि यह सोना किसी पुराने व्यापारी का था। मुखिया और गांव वाले मोहन की ईमानदारी से बहुत खुश हुए। उन्होंने मोहन को इनाम दिया और उसका सम्मान किया। मोहन खुशी-खुशी अपने जीवन में आगे बढ़ने लगा और पूरे गांव में उसकी सच्चाई की प्रशंसा होने लगी।
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पूजा का फल
अविका बंसल, उम्र 12 वर्ष
एक मंदिर के सामने एक पीपल का पेड़ था। पुजारी पीपल के पेड़ की भी पूजा करता था। पेड़ की पूजा करते समय उसे जगह हिलने का आभास होता था। एक दिन उसने देखा कि कुछ पुष्प बिखरे हुए हैं। उसने कुछ सोचा और फावड़ा से उस जगह को खोदा। खुदाई करने पर उसे एक सोने की ईंट नुमा वस्तु मिली। जिसे पाकर वह खुश हो गया। उसे उसकी पूजा का फल मिल गया था।
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सच्चा चरित्र
रितु राठौर, उम्र 11 वर्ष
जंगल के किनारे एक व्यक्ति बैठा हुआ था। उसने साफ-सुथरे और अच्छे कपड़े पहन रखे थे, सिर पर पगड़ी थी और हाथ में फावड़ा। वह कोई गरीब मजदूर नहीं, बल्कि मेहनती और समझदार किसान था। बारिश के बाद उसकी नजर जमीन के एक हिस्से पर पड़ी जहां मिट्टी कुछ धंसी हुई लग रही थी। उसे शक हुआ, तो उसने वहां खुदाई शुरू की। थोड़ी ही देर में उसका फावड़ा किसी सख्त चीज से टकराया। उसने ध्यान से मिट्टी हटाई तो उसकी आंखें खुली रह गईं। जमीन के अंदर से सोने की एक चमचमाती ईंट निकली। पल भर के लिए वह हैरान रह गया। सोने की चमक उसकी आंखों को चकाचौंध कर रही थी, लेकिन उसका मन शांत था। वह सोचने लगा“अगर मैं इसे छुपा लूं तो अमीर बन सकता हूं, लेकिन क्या यह सही होगा?” उसके मन में उसके पिता की सीख गूंजने लगी ईमानदारी सबसे बड़ा धन होती है। उसने सोने की ईंट गांव के सरपंच के पास पहुंचा दी। जांच में पता चला कि यह बहुत पुराने समय का गड़ा हुआ खजाना था। प्रशासन उसकी सच्चाई से प्रभावित हुआ और उसे इनाम दिया गया। उस दिन उस व्यक्ति ने सीखा कि अच्छे कपड़े इंसान को सम्मान दिलाते हैं, लेकिन अच्छा चरित्र उसे महान बनाता है। यही सच्ची सफलता है।
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मेहनत और ईमानदारी का फल
पाखी राठौर, उम्र 9 वर्ष
एक दिन की बात है। एक गांव में रामू काका रहते थे। वे बहुत मेहनती थे लेकिन गरीब थे। रोज सुबह खेत में काम करने जाते थे। उस दिन भी वे अपने खेत में गड्ढा खोद रहे थे। अचानक उनकी कुदाल किसी सख्त चीज से टकराई। रामू काका थोड़ा डर गए, फिर उन्होंने मिट्टी हटाई। मिट्टी के अंदर से एक चमकदार पीले रंग की ईंट जैसी चीज निकली। उसे हाथ में लेते ही बहुत तेज चमक हुई। रामू काका हैरान हो गए। उन्होंने ध्यान से देखा तो पता चला कि वह सोने की ईंट थी। उनकी आंखें खुशी से चमक उठीं। उन्होंने सोचा, “आज भगवान ने मेरी सुन ली।” रामू काका बहुत खुश हुए लेकिन लालच नहीं किया। वे सोने की ईंट लेकर गांव के मुखिया के पास गए और सारी बात बता दी। मुखिया ने गांव वालों को बुलाया। सबने मिलकर तय किया कि उस जगह को अच्छे से खोदा जाए। वहां और भी सोने की ईंटें मिलीं। गांव वालों ने सोना आपस में बराबर बांट लिया। उससे उन्होंने स्कूल बनवाया, कुआं खुदवाया और गरीब लोगों की मदद की। रामू काका ने अपने हिस्से से बच्चों की पढ़ाई शुरू करवाई और अपने खेत को और अच्छा बना लिया। अब रामू काका पहले जैसे गरीब नहीं थे, लेकिन वे वैसे ही सरल और अच्छे इंसान बने रहे। वे रोज कहते थे कि मेहनत और ईमानदारी का फल हमेशा मीठा होता है। गांव के बच्चे उनसे यह कहानी सुनकर खुश होते थे और सीख लेते थे कि लालच बुरा होता है और मिलकर रहने से सब अच्छा होता है।
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ईमानदारी का फल
शिवम नगर, आयु 10 वर्ष
रामू एक गरीब और मेहनती किसान था। एक दिन अपने खेत की कड़ी धूप में खुदाई करते समय उसकी कुदाल एक सख्त चीज से टकराई। मिट्टी हटाने पर उसे सोने की एक चमकती हुई ईंट मिली। उसे देखकर रामू दंग रह गया। एक पल के लिए वह लालच में पड़ा, लेकिन उसकी ईमानदारी जीत गई। उसने सोचा कि बिना मेहनत का धन अपना नहीं होता। वह उस सोने को लेकर सीधे गांव के मुखिया के पास गया और उसे सौंप दिया। रामू की इस सच्चाई से खुश होकर मुखिया ने उसे पुरस्कृत किया। रामू ने साबित कर दिया कि ईमानदारी ही सबसे बड़ा धन है।
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ईमानदारी सबसे बड़ी नीति है
हर्षित अग्रवाल, उम्र 13 वर्ष
एक समय की बात है रामू नाम का एक मेहनती किसान था। पूरे दिन मेहनत करने के बाद एक दिन वह एक विशाल बरगद की छाया में आराम करने के लिए गया। वहां उसने देखा कि पेड़ की जड़ जमीन से कुछ उभरी हुई अलग दिख रही थी। उत्सुकता से उसने अपनी कुदाल उठाई और जमीन को खोदा तो उसकी कुदाल किसी चीज से टकराई। जब उसने मिट्टी हटाकर देखा तो वह दंग रह गया उसे उसमें से चमकती हुई सोने की ईंट दिखी। रामू बहुत खुश हुआ उसने सोचा अब उसकी गरीबी दूर हो जाएगी। फिर उसे अपने पिता की सीख याद आ गई कि "बिना अपनी मेहनत का धन सुख नहीं देता।" वह उस ईंट को लेकर गांव के मुखिया के पास ले गया। यह देखकर पूरा गांव दंग रह गया और उसकी ईमानदारी की प्रशंसा की। गांव के मुखिया ने उस धन का उपयोग स्कूल और अस्पताल बनाने में किया। इससे हमें शिक्षा मिलती है कि 'ईमानदारी सबसे बड़ी नीति है'।
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कंजूस व्यापारी
पार्थ शर्मा, उम्र 11 वर्ष
एक बार एक गांव में एक धनी व्यापारी रहता था। वह बहुत कंजूस था। वह इतना धनी होने के बावजूद फटे-पुराने कपड़ों में रहता था। उसने अपने धन को एक संदूक में रखा था लेकिन उसे धन के चोरी होने का भय सता रहा था। फिर उसे विचार आया कि उसे कहीं गाड़ देना चाहिए। अगले दिन वह धन को गाड़ने गया। उसने एक पेड़ के पास गड्ढा खोदकर संदूक को उसमें दबा दिया। दो चोरों ने उसे संदूक को छुपाते वक्त देख लिया। वे उसी रात को आए और सारा धन चुरा के ले गए। कुछ दिनों बाद वह अपना संदूक देखने पहुंचा। जब उसने देखा कि उसका संदूक गायब है तो वह फूट-फूट कर रोने लगा। उसका मित्र पास से गुजर रहा था। उसने उसे समझाया, "कोई बात नहीं मित्र, वैसे भी वह धन यहां दबा हुआ किसी के काम नहीं आ रहा था। अब किसी के काम तो आ रहा है। यदि तुम्हें दुख है तो तुम कुछ पत्थर एक संदूक में रखकर उन्हें इस जगह दबा दो। इससे तुम्हें संतुष्टि भी मिल जाएगी और उन्हें कोई चुरायेगा भी नहीं।" व्यापारी को अपने मित्र की सलाह सही लगी और उसने कंजूसी छोड़ने का फैसला किया।
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ईमानदारी की चमक
अमन, उम्र 13 वर्ष
एक गांव में रामदास नाम का एक गरीब किसान रहता था। वह रोज जंगल के पास खेत में मेहनत करता था। एक दिन वह पेड़ के पास गड्ढा खोद रहा था, तभी उसकी कुदाल किसी सख्त चीज से टकराई। उसने मिट्टी हटाई तो देखा एक चमकदार सोने की ईंट जमीन में दबी हुई है। रामदास पहले तो बहुत खुश हुआ। उसने सोचा, “अगर यह सोना मेरा हो जाए तो मेरी सारी परेशानियाँ खत्म हो जाएंगी।” लेकिन अगले ही पल उसे अपने पिता की सीख याद आई जो हमारा नहीं है, उसे लेना पाप है। रामदास सोने की ईंट लेकर गांव के मुखिया के पास गया और सारी बात सच-सच बता दी। मुखिया ने पूरे गांव को बुलाया और पूछा कि यह सोना किसका हो सकता है। तभी एक बूढ़ा सेठ आगे आया और बोला, “यह मेरी खोई हुई सोने की ईंट है।” सेठ ने रामदास की ईमानदारी देखकर बहुत खुशी जताई। उसने रामदास को इनाम देना चाहा, लेकिन रामदास ने विनम्रता से कहा, “मुझे इनाम नहीं चाहिए, बस मेरी मेहनत की रोटी काफी है।” सेठ और मुखिया दोनों ने मिलकर रामदास को एक छोटा खेत और कुछ बीज दे दिए, ताकि वह अपना जीवन अच्छे से चला सके। उस दिन के बाद रामदास सिर्फ गरीब किसान नहीं रहा, बल्कि पूरे गांव के लिए ईमानदारी की मिसाल बन गया। सीख: ईमानदारी सबसे बड़ी दौलत होती है, जो जीवन को सच में चमका देती है।
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किसान की किस्मत
पीयूष चौधरी, उम्र 10 वर्ष
एक गांव था। उसमें एक बगीचा था। वहां एक किसान रहता था। वह बहुत गरीब था। उसे अपनी बेटी की शादी के लिए पैसे की जरूरत थी। वह सो रहा था। उसे सपना आया कि बगीचे में आम का पेड़ है, उसके नीचे मिट्टी में सोना है। उसकी नींद खुली और वह बगीचे में गया और ढूंढने लगा। उसने तीन पेड़ के नीचे देखा तो नहीं मिला। उसने चौथे आम के पेड़ के नीचे खोदा तो वहां बहुत सारा सोना मिला। वह खुश हो गया और अपने घर गया और बोला, "देखो मुझे क्या मिला! अब हम अपनी बेटी की शादी कर सकते हैं।" फिर सुबह उसने अपनी बेटी की शादी कर दी और वे खुशी से रहने लगे।
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सहायता का संकल्प
अरहान शरीफ, उम्र 8 वर्ष
एक गांव में दयालु आदमी रहता था। गांव में एक पेड़ था। पेड़ की उसको जड़ चाहिए होती है, वह जब गड्ढा खोदता है, तो उसका फावड़ा किसी चीज से टकराता है। वह हाथ से मिट्टी हटाता है तो उसे चमकीली चीज नजर आती है। वह चमकीली चीज को उठाता है। वह आदमी समझ जाता है कि उसको कुछ कीमती चीज हाथ लगी है। वह चमकीली चीज उठाता है और वह सोचता है कि मैं गांव के हर व्यक्ति की सहायता दूंगा, हर एक की मदद करूंगा।
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मेहनत का असली खजाना
गर्वित कच्छवाहा, उम्र 9 वर्ष
एक समय की बात है, एक गांव में रामू नाम का एक गरीब लेकिन बहुत ही मेहनती किसान रहता था। उसके पास विरासत में मिली एक पुरानी बंजर जमीन थी, जहां कुछ नहीं उगता था। गांव के लोग अक्सर कहते थे कि उस जमीन के नीचे पुराने राजाओं का खजाना छिपा है। एक दोपहर, रामू अपने पुराने नीम के पेड़ के पास खुदाई कर रहा था। अचानक उसकी कुदाल किसी सख्त चीज से टकराई। जैसे ही उसने मिट्टी हटाई, उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं। मिट्टी के नीचे एक चमकता हुआ सोने का बक्सा दबा हुआ था। रामू ने कांपते हाथों से उस बक्से को बाहर निकाला। जैसे ही सूरज की किरणें उस पर पड़ीं, वह सोने की तरह चमकने लगा। रामू सोच में पड़ गया क्या यह वाकई उसकी किस्मत बदलने वाला पल था? लेकिन फिर उसे अपने पिता की बात याद आई, जिन्होंने कहा था, "बेटा, पसीने से कमाई गई रोटी ही सबसे मीठी होती है।" उसने वह बक्सा खोला, तो देखा वह केवल सोने की पॉलिश वाला एक पुराना संदूक था, जिसके अंदर खेती के पुराने औजार और उत्तम बीज रखे थे। रामू समझ गया कि असली खजाना बाहर से मिलने वाली दौलत नहीं, बल्कि वह मेहनत है जो इस जमीन को सोना बना सकती है। उसने उन बीजों को बोया और अपनी मेहनत से उस बंजर जमीन को एक लहलहाते खेत में बदल दिया।
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ईमानदारी का इनाम
अर्जुन पोरवाल, उम्र 12 वर्ष
एक दिन गांव का एक गरीब किसान जंगल के पास लकड़ी काटने गया। पेड़ के नीचे जमीन धंसी हुई लगी, तो उसने खोदना शुरू किया। थोड़ी ही देर में उसे सोने से भरा एक डिब्बा मिला। किसान बहुत खुश हुआ, लेकिन उसे अपने पिता की सीख याद आई ईमानदारी सबसे बड़ा धन है। वह डिब्बा राजा के पास ले गया। राजा उसकी सच्चाई से प्रसन्न हुआ और उसे इनाम दिया। किसान मेहनत और ईमानदारी से सुखी जीवन जीने लगा।
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भरोसे की जीत
देव आदित्य बिश्नोई, उम्र 7 वर्ष
एक आदमी था। उसका नाम सोनू था। वह रामपुर गांव में रहता था। उसकी एक झोपड़ी थी। जिसमें उसकी एक बीवी और तीन बच्चे रहते थे। वह बहुत गरीब था। परंतु वह खुद पर हमेशा भरोसा रखता था। एक दिन वह खेत में काम कर रहा था। खेत में काम करते समय पेड़ के नीचे खुदाई करते समय उसे वहां एक सोने की ईंट मिली। सोने की ईंट देखकर सोनू बहुत खुश हुआ। उसने वह ईंट बाजार में जाकर बेच दी। उसके बदले में उसे बहुत सारे पैसे मिले जिसे लेकर वह घर आ गया। अब वह बहुत अमीर हो गया था और उसके परिवार का पालन पोषण अच्छे से होने लगा।
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पाप और पुण्य
राहुल बजाज, उम्र 9 वर्ष
एक बार एक डाकू था जो चोरी करके अपनी सारी संपत्ति को एक पेड़ के नीचे छुपा देता था। एक बार एक लकड़हारे ने उसे यह सब करते देख लिया। उसके मन में लालच आ गया। उसने उस संपत्ति में से थोड़ा सा धन चुरा कर अपने पास अलग रख लिया। अब वह रोज ऐसा करने लगा। जब भी डाकू धन चुराता, उस धन में से लकड़हारा कुछ धन चुरा लेता। जब उसके पास वह सारा धन इकट्ठा हो गया तो वह धन लेकर अपने घर गया और अपने घर वालों को सारी बात बताई। लेकिन उसके घर वालों ने उस पर बहुत गुस्सा किया और बोला कि सारा धन वापस कर दे। लेकिन वह ऐसा नहीं कर सकता था, इसलिए उसने अपना सारा धन पुण्य के काम जैसे गौशाला का निर्माण करवाना, मंदिर का निर्माण करवाना और कुआं के निर्माण आदि में लगा दिया और वापस अपने घर आकर अपनी बात बताई। अब उसके घर वालों ने उसको माफ कर दिया और अब आराम से रहने लगे। इस तरह उसका पाप पुण्य में बदल गया।
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भक्ति और परोपकार
प्रथम चौरडिया, उम्र 11 वर्ष
एक बार की बात है एक गांव था वहां एक गरीब किसान रहता था। उसका नाम मोहन था। वह सुबह जल्दी उठता और भगवान से प्रार्थना करके खेत में काम करने के लिए चला जाता। वह दिन भर कड़ी धूप में मेहनत करता और रात को आकर सो जाता। वह एक दिन की एक रोटी भी नहीं खा पाता। एक बार जब वह सो रहा था तो उसके मन में एक दृश्य आया कि वह खेती कर रहा है और उसे एक भगवान की मूर्ति मिली। जब उसने उस मूर्ति के नीचे खोदना शुरू किया तब उसे एक पोटली मिली जिसमें बहुत सारे सोने के सिक्के थे। तब अचानक से उसकी नींद खुली। वह अगले दिन भगवान से प्रार्थना करके खेती करने चला गया तब उसे खेती करते समय पेड़ के पास वही मूर्ति दिखाई दी जो उसने सपने में देखी थी। वह उस मूर्ति के पास गया और उस मूर्ति के नीचे खोदने लगा और उसे भी एक पोटली मिली जिसके अंदर बहुत सारे सोने के सिक्के थे। वह बहुत खुश हुआ और भगवान को धन्यवाद किया। फिर उन सिक्कों से पेट भर खाना खाया और बचे हुए सिक्कों से एक मंदिर बनवाया जहां वह रोज सुबह पूजा अर्चना करता था और बाकी सिक्कों से गरीबों के लिए भोजन खरीदा।
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बचत का महत्व
ऋषभ कुमार, उम्र 12 साल
एक बार एक राजा था। जब भी कोई युद्ध जीत कर आता तो जीती हुई संपत्ति में से दसवां हिस्सा आम आदमी का रूप धरकर एक जंगल में जाकर छुपा देता था। वह हर बार ऐसा ही करता था। कुछ सालों बाद वह एक युद्ध में हार गया जिससे उसकी सारी संपत्ति और राज पाठ दुश्मनों ने लूट लिया। अब उसकी प्रजा बहुत परेशान हो गई। लेकिन वह अपनी जनता को दुखी नहीं देख सकता था। तब उसे याद आया कि उसने कुछ संपत्ति जंगल में छिपा रखी है। तब वह अपने सिपाहियों के साथ उस जंगल में आया, उस पेड़ के पास आया और अपनी छुपाई हुई संपत्ति को ले गया और अपनी जनता के साथ एक नई जगह पर जाकर अपना राज्य बसाया। इस प्रकार उसने अपनी जनता को समझदारी से बचा लिया और अपने राज्य को फिर से खड़ा कर लिया।
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ईमानदारी का उजाला
मितांश जैन, उम्र 8 वर्ष
एक गांव में रामू नाम का एक किसान रहता था। वह बहुत मेहनती और अच्छा इंसान था। एक दिन वह खेत में काम कर रहा था। उसकी कुदाल जमीन से टकराई और कुछ तेज आवाज आई। जब उसने मिट्टी हटाई तो उसे सोने की एक ईंट मिली। वह बहुत चमक रही थी। रामू बहुत खुश हुआ। उसने सोचा, “अगर यह सोना मेरा हो जाए तो मैं बहुत अमीर बन जाऊंगा।” लेकिन फिर उसे अपने पापा की बात याद आई। पापा कहते थे कि गलत चीज रखने से भगवान नाराज हो जाते हैं। रामू थोड़ा डर गया और सोचने लगा कि उसे क्या करना चाहिए। फिर रामू ने तय किया कि वह सच्चाई बोलेगा। वह सोने की ईंट लेकर गांव के मुखिया के पास गया और सब बता दिया। मुखिया बहुत खुश हुए। उन्होंने कहा कि रामू बहुत ईमानदार है। बाद में पता चला कि यह सोना किसी व्यापारी का खोया हुआ था। व्यापारी को उसका सोना वापस मिल गया। सब लोगों ने रामू की तारीफ की। उसे इनाम भी मिला। रामू बहुत खुश था। उसने समझ लिया कि सच्चाई और ईमानदारी सबसे अच्छी चीज होती है।
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मेहनत का असली इनाम
गर्वित शर्मा, उम्र 13 वर्ष
एक छोटे से गांव में रघु नाम का एक किसान रहता था। रघु बहुत मेहनती था, पर उसकी किस्मत जैसे उससे रूठी हुई थी। खेत छोटा था, बारिश कम होती थी और फसल भी ठीक से नहीं उगती थी। फिर भी रघु कभी हार नहीं मानता था। एक दिन रघु अपने खेत के किनारे पेड़ के नीचे मिट्टी साफ कर रहा था। उसने सोचा शायद यहां थोड़ा और जमीन साफ करके सब्जी उगाई जा सके। वह अपनी कुदाल से मिट्टी खोदने लगा। कुछ देर बाद उसकी कुदाल किसी सख्त चीज से टकराई ठक! की आवाज आई। रघु ने उत्सुकता से मिट्टी हटाई और देखा कि अंदर एक चमकदार पीला पत्थर था। पहले तो उसे लगा यह कोई साधारण पत्थर होगा, लेकिन जैसे ही उसने उसे धोया, वह चमकने लगा। गांव के बुजुर्गों ने बताया कि यह सोने की ईंट थी, जो कई साल पहले पुराने समय में यहां दफन हो गई थी। रघु खुश तो बहुत हुआ, लेकिन उसमें घमंड नहीं आया। उसने सोचा“यह तो मेरी मेहनत का फल है। भगवान ने मुझे यह इनाम दिया है।” सोने की ईंट बेचकर रघु ने अपनी जमीन सुधारी, सिंचाई का इंतजाम करवाया और गांव के गरीब बच्चों की पढ़ाई का खर्च भी उठाया। धीरे-धीरे रघु का खेत हरा-भरा हो गया। गांव वालों ने उससे पूछा“रघु! तुम्हारी किस्मत कैसे बदल गई?” रघु मुस्कुराया और बोला“किस्मत खुद उन लोगों की मदद करती है, जो मेहनत करना नहीं छोड़ते।” सीख: मेहनत करने वालों की तकदीर बदलती है।
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मेहनत का इनाम
हृदयांश पंचैली, उम्र 11 वर्ष
एक गांव में रामू नाम का मेहनती किसान रहता था। एक दिन जब वह अपने खेत में गहरी खुदाई कर रहा था, तो उसकी कुदाल अचानक किसी सख्त चीज से टकराई। उसने मिट्टी हटाई तो उसे एक चमकती हुई सोने की ईंट मिली। रामू की खुशी का ठिकाना न रहा। उसे अपनी मेहनत का फल मिल चुका था। उसने उस खजाने से अपनी गरीबी दूर की और अपनी ईमानदारी से पूरे गांव का भला किया।
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लालची इंसान
तन्मय वधवा, उम्र 10 वर्ष
बहुत पुराने समय की बात है एक गांव में कुमार वर्मा नाम का एक व्यक्ति रहता था। वह बहुत लालची इंसान था। वह किराने की दुकान का मालिक था। वह लोगों को मिलावट का सामान बेचता था केवल अपने लाभ के लिए। एक दिन उसे स्वप्न आया कि किसी बूढ़े व्यक्ति ने गांव के सबसे बड़े पेड़ के पास अपना सोना दबा रखा है। उसे लगा कि यदि यह स्वप्न सच हो जाएगा तो वह रातों-रात अमीर हो जाएगा। इसी कारण अगले दिन दोपहर के समय जब गांव के अधिकांश लोग सो रहे थे तब वह पेड़ के पास आया और उसने खुदाई की। खुदाई करने के बाद उसे उसी जगह पर सोने का टुकड़ा मिला। वह बहुत खुश हुआ। उसने सोचा इसे यदि शहर ले जाकर बेच दिया जाए तो इसमें बहुत लाभ मिलेगा। जब वह सोना बेचने के लिए शहर आया तो उसे पता चला कि सोना नकली था। उसका स्वप्न पूरा नहीं हुआ और वह बहुत निराश हुआ। उसे पता चला कि लालच बुरी बला है।
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किस्मत का खेल
यशवी जैन, उम्र 13 वर्ष
एक बार की बात है जब एक श्याम नाम का बहुत ही गरीब और मेहनती किसान था। उसका यह नियम था कि वह हर रोज पांच पौधे लगाता था। वह एक वक्त का खाना छोड़ सकता था पर पौधा लगाना नहीं छोड़ता था। एक दिन पौधे लगाते वक्त जब उसने जमीन को खोदा तो उसमें से उसे एक चमकती हुई सोने की ईंट मिली। वह यह देखकर बहुत खुश हुआ और इससे उसकी सारी गरीबी दूर हो गई।
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मेहनत का असली खजाना
विवान प्रजापत, उम्र 11 वर्ष
किसी गांव में रामू नाम का एक बहुत ही सीधा-साधा और मेहनती किसान रहता था। उसके पास पूर्वजों की दी हुई एक छोटी सी जमीन थी, जिस पर वह दिन-रात पसीना बहाता था। रामू के पिता ने मरते समय उससे कहा था, "बेटा, हमारी इस जमीन में एक बहुत बड़ा खजाना छिपा है, बस उसे ढूंढने के लिए तुम्हें सही समय का इंतजार करना होगा।" वर्षों बीत गए, रामू खेती करता रहा लेकिन उसे कोई खजाना नहीं मिला। एक दिन, कड़ी धूप में अपने खेत के किनारे एक पुराने नीम के पेड़ के नीचे सुस्ताते समय उसे अपने पिता की बात याद आई। उसने सोचा कि क्यों न आज इस पेड़ के पास खुदाई करके देखी जाए। उसने अपनी कुदाल उठाई और पेड़ की जड़ों के पास खुदाई शुरू कर दी। काफी गहराई तक खोदने के बाद, अचानक उसकी कुदाल किसी कठोर चीज से टकराई। रामू की धड़कनें तेज हो गई। उसने सावधानी से मिट्टी हटाई तो देखा कि वहां एक चमचमाता हुआ सोने का टुकड़ा (ईंट) पड़ा था। जैसे ही उसने उसे बाहर निकाला, उसकी चमक से रामू की आंखें चौंधिया गईं। रामू की खुशी का ठिकाना न रहा। उसे लगा कि उसके पूर्वजों का आशीर्वाद मिल गया है। सीख—रामू को एक गहरी बात समझ आई। उसने महसूस किया कि असली खजाना केवल वह सोने का टुकड़ा नहीं था, बल्कि वह मेहनत और धैर्य था जो फल देता है।
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किसान की मेहनत का फल
पूर्वी यादव, उम्र 8 साल
एक किसान अपने खेत में दिन रात मेहनत करता था। किसान बहुत ही गरीब था और उसके ऊपर कर्ज था। उसके खेत में एक पेड़ था। एक दिन किसान खुदाई कर रहा था, उसको खुदाई में एक सोने की ईंट मिली। किसान सोने की ईंट देखकर बहुत खुश हुआ। उसको बेचकर किसान का कर्ज चुक गया। इसलिए कहते हैं मेहनत का फल मीठा होता है। इसलिए सबको मेहनत करनी चाहिए।
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परहित सरिस धर्म नहीं भाई
हिमांशी श्रृंगी, उम्र 12 वर्ष
एक गांव में एक छोटा पार्क था, जिसकी जिम्मेदारी गांव के ही एक बागवान के पास थी। एक रात्रि में उसको स्वप्न में पार्क के पेड़ की जड़ों में स्वर्ण धातु छुपी होने का एहसास हुआ, लेकिन एक शर्त के साथ। प्रातः काल उसने फावड़ा लेकर खुदाई शुरू की तो सोने की ईंट निकली। स्वप्न के अनुसार उसने वह स्वर्ण की ईंट गांव के सरपंच को विकास कार्यों के लिए सौंप दी। यह बात तुरंत ही जंगल में आग की तरह फैल गई और सभी लोग बागवान की निष्ठा, ईमानदारी के लिए प्रशंसा करने लगे।
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ईमानदारी का पुरस्कार
हिमांक, उम्र 13 वर्ष
एक छोटे से गांव में हरिया नाम का एक गरीब लेकिन ईमानदार लकड़हारा रहता था। वह रोज जंगल में जाकर लकड़ी काटता और उसी से अपने परिवार का पालन-पोषण करता था। एक दिन लकड़ी काटते समय उसकी कुल्हाड़ी झाड़ियों में गिर गई। जब वह उसे ढूंढने लगा, तो उसे मिट्टी में दबा हुआ एक चमकदार सोने का घन दिखाई दिया। सोने को देखकर उसके मन में क्षण भर के लिए लालच आया, लेकिन उसने तुरंत खुद को संभाल लिया। हरिया ने सोचा कि यह धन उसका नहीं है, इसलिए इसे रखना गलत होगा। वह उसे वहीं छोड़ने ही वाला था कि तभी जंगल के देवता प्रकट हुए। उन्होंने कहा कि यह उसकी ईमानदारी की परीक्षा थी। हरिया की सच्चाई से प्रसन्न होकर देवता ने उसे आशीर्वाद दिया और कहा कि उसकी मेहनत कभी व्यर्थ नहीं जाएगी। उस दिन के बाद हरिया की लकड़ी अच्छे दामों पर बिकने लगी और उसका जीवन सुखमय हो गया।
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Updated on:
04 Feb 2026 07:02 pm
Published on:
04 Feb 2026 07:01 pm
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