3 फ़रवरी 2026,

मंगलवार

Patrika Logo
Switch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

कर्ज के बोझ तले राजस्थान: GSDP का 38% कर्ज, विकास की क्षमता कमजोर

राजस्थान पर बढ़ता कर्ज, कमजोर राजस्व ढांचा और भारी सब्सिडी बोझ राज्य की विकास क्षमता को सीमित कर रहा है, जिससे आर्थिक संकट की आशंका गहराती जा रही है।

3 min read
Google source verification
Chart

Ai generated

जयपुर। पिछले एक दशक में राजस्थान की अर्थव्यवस्था तेजी से कर्ज के बोझ में दबती चली गई है। राज्य का कर्ज अब सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) के करीब 38% तक पहुंच चुका है। इस स्तर के साथ राजस्थान देश के सबसे अधिक कर्ज वाले पांच बड़े राज्यों में शामिल हो गया है। इस सूची में पंजाब, पश्चिम बंगाल, केरल और आंध्र प्रदेश भी हैं। इनमें केवल पंजाब और पश्चिम बंगाल का कर्ज बोझ राजस्थान से अधिक है।


16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट के अनुसार समस्या केवल ज्यादा कर्ज लेने की नहीं है, बल्कि उससे कहीं गहरी है। आयोग का कहना है कि राजस्थान की आर्थिक संरचना इतनी मजबूत नहीं है कि वह विकास के जरिए इस कर्ज के दबाव को कम कर सके। इसी कारण राज्य की अर्थव्यवस्था आर्थिक, जलवायु या राजनीतिक झटकों के प्रति बेहद संवेदनशील बनी हुई है।

सुरक्षा कवच कमजोर

करीब दस साल पहले राजस्थान का कर्ज GSDP का लगभग 25% था। कोविड-19 महामारी के दौरान यह अनुपात 40% से भी ऊपर चला गया। बाद में इसमें थोड़ी गिरावट जरूर आई, लेकिन आयोग का मानना है कि यह राहत सतही है।
महाराष्ट्र या तमिलनाडु जैसे राज्यों के पास बड़ी और विविध अर्थव्यवस्था है, जिससे वे ज्यादा कर्ज उठाने के बावजूद उसे संभाल सकते हैं।

राजस्थान के पास ऐसा मजबूत राजस्व आधार नहीं है। वित्त आयोग ने राजस्थान को उन राज्यों की श्रेणी में रखा है, जहां लगातार बड़ा कर्ज और कमजोर राजस्व ढांचा सरकार की वित्तीय गुंजाइश को सीमित कर देता है। इसका सीधा मतलब है कि किसी संकट के समय सरकार के पास खर्च बढ़ाकर अर्थव्यवस्था को संभालने की क्षमता बहुत कम रह जाती है।

सरकार चलाने के लिए कर्ज

राजस्थान के लिए एक बड़ा खतरे का संकेत उसका लगातार बना रहने वाला राजस्व घाटा है। पिछले एक दशक से राज्य केवल सड़कें, अस्पताल या अन्य विकास कार्यों के लिए ही कर्ज नहीं ले रहा, बल्कि कर्मचारियों के वेतन, पेंशन और सब्सिडी जैसे रोजमर्रा के खर्च चलाने के लिए भी उधार पर निर्भर है।


वित्त आयोग का कहना है कि जब सरकार गैर-उत्पादक खर्चों के लिए कर्ज लेती है, तो उससे भविष्य में आय नहीं बनती, जिससे उस कर्ज को चुकाया जा सके। यही कारण है कि कर्ज का चक्र और गहरा होता चला जाता है। यह स्थिति राज्य की वित्तीय सेहत के लिए बेहद चिंताजनक है।

पहले से बंधा होता है राजस्थान का बजट

राजस्थान के बजट का लगभग आधा हिस्सा पहले से ही तय मदों में चला जाता है। ब्याज भुगतान, वेतन, पेंशन और सब्सिडी जैसे ‘कमिटेड खर्च’ बजट पर हावी हैं। अकेले ब्याज भुगतान ही राज्य के कुल राजस्व खर्च का 20% से अधिक हिस्सा खा जाता है।


इस मामले में राजस्थान की स्थिति पंजाब और पश्चिम बंगाल जैसी कर्जग्रस्त अर्थव्यवस्थाओं के करीब है, जबकि गुजरात और ओडिशा जैसे राज्य अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में हैं। वित्त आयोग ने चेतावनी दी है कि इतना ज्यादा तय खर्च होने से राज्य सरकार विकास से जुड़े निवेशों पर ध्यान नहीं दे पाती, जिससे भविष्य की आय बढ़ने के रास्ते भी सीमित हो जाते हैं।

बिजली क्षेत्र और सब्सिडी की दोहरी मार

राजस्थान की वित्तीय स्थिति को सबसे ज्यादा नुकसान बिजली क्षेत्र से हो रहा है। राज्य की बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) का घाटा GSDP के 6% से भी ज्यादा हो चुका है, जो देश में सबसे ऊंचे स्तरों में से एक है। 2018-19 में डिस्कॉम पर करीब 54,500 करोड़ रुपए का कर्ज था, जो 2023-24 तक बढ़कर 92,000 करोड़ रुपए से ज्यादा हो गया।


वित्त आयोग ने साफ कहा है कि डिस्कॉम का घाटा अंततः राज्य सरकार पर ही बोझ बनता है। इसके साथ ही बिजली सब्सिडी भी एक बड़ी समस्या है। 2023-24 में राजस्थान ने बिजली सब्सिडी पर 27,038 करोड़ रुपए खर्च किए, जो महाराष्ट्र से दोगुना और गुजरात से लगभग तीन गुना है। आयोग के अनुसार, ऐसी जमी-जमाई सब्सिडियां समय के साथ बजट की लचीलापन खत्म कर देती हैं और इन्हें घटाना राजनीतिक रूप से भी मुश्किल हो जाता है।

कमजोर राजस्व और अस्थिर आय के स्रोत

राज्य का अपना राजस्व संग्रह उसकी आर्थिक क्षमता के मुकाबले कम है। संपत्ति कर, शहरी शुल्क और गैर-कर राजस्व के कई स्रोत अभी भी पूरी तरह इस्तेमाल नहीं हो पा रहे हैं। नतीजतन, राजस्थान केंद्र से मिलने वाले अनुदानों और कर्ज पर अधिक निर्भर है।


इसके अलावा पर्यटन, खनन और निर्माण जैसे क्षेत्र राज्य की अर्थव्यवस्था के प्रमुख आधार हैं, जो स्वभाव से अस्थिर हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि कमजोर राजस्व व्यवस्था, बिजली क्षेत्र की अक्षमता और रोजगार पैदा न करने वाली वृद्धि को दूर किए बिना राजस्थान की वित्तीय हालत सुधारना मुश्किल होगा।