
Rajasthan High Court (Patrika File Photo)
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने NDPS एक्ट के तहत दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति की अपील पर सुनवाई करते हुए उसकी सजा को अपील के निस्तारण तक निलंबित कर दिया और उसे जमानत पर रिहा करने के आदेश दिए।
हाईकोर्ट ने आपराधिक अपीलों की भारी पेंडेंसी पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि अदालत में हजारों आपराधिक अपीलें 20 से 30 वर्षों से लंबित हैं, जिनमें जेल अपीलें भी शामिल हैं। ऐसे मामलों में बंदियों के लिए जल्द सुनवाई की कोई संभावना नजर नहीं आती। अदालत ने कहा कि ऐसे हालात में किसी अपरिवर्तनीय जोखिम से बचते हुए मानव गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सर्वोपरि रखा जाना चाहिए।
यह आदेश न्यायमूर्ति फरजंद अली ने 27 जनवरी को पारित किया। वह निम्बाराम नामक व्यक्ति की ओर से दायर सजा निलंबन याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। निम्बाराम को 22 जनवरी को NDPS एक्ट के तहत दोषी ठहराते हुए सात साल के कठोर कारावास और 50 हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई गई थी।
कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि हाईकोर्ट में हजारों आपराधिक अपीलें पिछले 20–30 वर्षों से लंबित हैं, जिनमें जेल अपीलें भी शामिल हैं, जहां शीघ्र सुनवाई की संभावना नहीं दिखती। ऐसे मामलों में अदालत को सुरक्षित पक्ष अपनाते हुए मानव गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्राथमिकता देनी चाहिए।
- ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सजा अपील के अंतिम निस्तारण तक निलंबित रहेगी।
- अभियुक्त को 50,000 रुपये के निजी मुचलके और 25,000-25,000 रुपये के दो जमानतदारों पर रिहा किया जाएगा।
अदालत ने कहा कि इस मामले में NDPS एक्ट की धारा 50 की स्पष्ट अवहेलना का मुद्दा सामने आया है। धारा 50 में तलाशी के दौरान अभियुक्त को यह अधिकार बताया जाना अनिवार्य है कि वह किसी मजिस्ट्रेट या राजपत्रित अधिकारी की मौजूदगी में तलाशी की मांग कर सकता है।
- यदि ये मुद्दे अपीलकर्ता के पक्ष में तय होते हैं, तो बरी होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
- उठाए गए आधार महत्वपूर्ण हैं और गहन जांच व साक्ष्यों के पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता है।
- यह प्रक्रिया अंततः अभियुक्त के पक्ष में जा सकती है।
निम्बाराम की ओर से अधिवक्ता एसएस खीचड़ ने दलील दी कि अभियुक्त पूरे ट्रायल के दौरान जमानत पर रहा और उसने कभी स्वतंत्रता का दुरुपयोग नहीं किया। हाईकोर्ट में मामलों की भारी पेंडेंसी के कारण अपील की शीघ्र सुनवाई संभव नहीं है मामले में कानून और तथ्यों से जुड़े गंभीर सवाल हैं। NDPS एक्ट की धारा 50 का घोर उल्लंघन हुआ है। ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया, जिससे दोषसिद्धि कानूनी रूप से कमजोर है।
राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त सरकारी अधिवक्ता सुरेंद्र बिश्नोई ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने कहा दोषसिद्धि के बाद निर्दोषता की धारणा समाप्त हो जाती है। NDPS अधिनियम के अपराध गंभीर प्रकृति के होते हैं। सजा निलंबन को नियमित प्रक्रिया नहीं बनाया जा सकता, खासकर तब जब ट्रायल कोर्ट ने पूर्ण साक्ष्य मूल्यांकन के बाद दोषसिद्धि की हो।
Published on:
29 Jan 2026 08:52 pm
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