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आर्थिक अवसर और वैश्विक रणनीति का संगम

भारत के वस्त्र, रत्न-आभूषण, चमड़ा, कृषि एवं श्रम-प्रधान उद्योग वे क्षेत्र हैं, जहां उत्पादन केवल पूंजी से नहीं, बल्कि श्रम, कौशल और परंपरा से जन्म लेता है।

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भारत और अमरीका के मध्य व्यापारिक समझौता दोनों देशों के रिश्तों में ऐसा मोड़ है जहां आर्थिक अवसर, कूटनीतिक अपेक्षाएं और रणनीतिक विवेक आमने-सामने खड़े हैं। इस समझौते को यदि केवल आंकड़ों, शुल्क दरों और निर्यात-आयात की भाषा में पढ़ा जाए तो उसका अर्थ सीमित रह जाएगा। वैश्विक शक्ति-संतुलन और उभरते बहुधु्रवीय परिप्रेक्ष्य में यह समझौता निर्णायक क्षण के रूप में उभरता है। अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की ओर से घोषित यह समझौता, जिसमें भारत पर लगाए जाने वाले शुल्क को 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत किया गया है, प्रथम दृष्टि में भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए राहत का संकेत देता है।


भारत के वस्त्र, रत्न-आभूषण, चमड़ा, कृषि एवं श्रम-प्रधान उद्योग वे क्षेत्र हैं, जहां उत्पादन केवल पूंजी से नहीं, बल्कि श्रम, कौशल और परंपरा से जन्म लेता है। अमरीकी बाजार में शुल्क में कटौती भारतीय उत्पादों को अधिक प्रतिस्पर्धी मूल्य देगी, निर्यात की संभावनाएं बढ़ाएगी और घरेलू उद्योगों के लिए नई गति प्रदान करेगी। परंतु यह अवसर सिर्फ आर्थिक लाभ का प्रश्न नहीं है। यह भारत की विनिर्माण क्षमता, श्रम कौशल और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में उसकी बढ़ती प्रभावशाली भूमिका का सजीव प्रतिबिंब भी है। दरअसल, इस समझौते को ट्रंप पर बने वैश्विक और व्यापारिक दबाव के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए। भारत की ओर से रूस से कच्चा तेल खरीदने के निर्णय के कारण भारत-अमरीका व्यापार वार्ता ठप पड़ गई थी। अगस्त में अमरीका की ओर से द्वितीयक शुल्क लगाए जाने के बावजूद भारत ने रूस से तेल आयात करना जारी रखा, जिससे स्पष्ट हो गया कि भारत अपने रणनीतिक और ऊर्जा हितों से समझौता नहीं करेगा। इसी बीच, पिछले महीने भारत और यूरोपीय संघ के बीच ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौता हो गया, जिसने अमरीका के लिए नई चुनौती खड़ी कर दी। करीब दो दशक की लंबी बातचीत के बाद यह समझौता दोनों अर्थव्यवस्थाओं की अमरीका पर निर्भरता को कम करने के प्रयास का प्रतीक बन गया। इसे वैश्विक व्यापार संरचना में महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा जा रहा है, जो ट्रंप की आक्रामक व्यापार नीतियों के संतुलन का प्रयास है।


भारत-ईयू 'मेगा डील' ने वाइट हाउस पर दबाव बढ़ाया और अमरीका को भारत के साथ पुन: व्यापार वार्ता में जुटने के लिए प्रेरित किया। इसका परिणाम ट्रेड डील के रूप में सामने आया है जिसे ट्रंप प्रशासन की उस रणनीति के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है जिसमें सख्त व्यापार रुख और प्रमुख साझेदार खोने के जोखिम के बीच संतुलन साधा गया। यह पूरी प्रक्रिया न केवल भारत की बढ़ती वैश्विक आर्थिक शक्ति को उजागर करती है, बल्कि उसकी कूटनीतिक महत्वाकांक्षाओं को भी मजबूती देती है। हालांकि यह समझौता जिस समय सामने आया है, वह समय सामान्य नहीं है। विश्व व्यवस्था एक गहरे संक्रमण से गुजर रही है। चीन के साथ अमरीका का व्यापार युद्ध, वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं का पुनर्गठन और 'फ्रेंड-शोरिंगÓ की नीति- इन सबके बीच भारत को एक वैकल्पिक उत्पादन केंद्र के रूप में देखा जा रहा है। प्रश्न यह नहीं है कि भारत को इससे लाभ होगा या नहीं। प्रश्न है कि यह लाभ कितना स्थायी होगा। यही वह बिंदु है जहां इस समझौते का भूराजनीतिक पक्ष उभरता है और वही सबसे अधिक विचारणीय है। बहरहाल, भारत की ऊर्जा नीति कभी किसी एक धु्रव पर आश्रित नहीं रही। रूस से तेल आयात, विशेषकर यूक्रेन युद्ध के बाद भारत के लिए सस्ते कच्चे तेल का स्रोत भर नहीं था। वह न तो पश्चिम के विरोध में था न ही रूस के समर्थन में- वह केवल भारतीय हितों के पक्ष में था।


भारत ने जब बाद में रूसी तेल आयात में आंशिक कमी की तो भी उसके पीछे वैश्विक कीमतों में बदलाव, बीमा और शिपिंग प्रतिबंध तथा बाजार की व्यावहारिक स्थितियां थीं। इसलिए यह अपेक्षा कि भारत अपनी ऊर्जा नीति को अमरीकी रणनीतिक आवश्यकताओं के अनुरूप ढालेगा, न तो व्यावहारिक है और न भारत के हित में। फिलहाल इस आशंका पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत नहीं है। इतना अवश्य है कि भारत, रूस से आयात घटाकर अमरीका-वेनेजुएला से तेल खरीद बढ़ा सकता है। फिर भी वेनेजुुएला से तेल की मात्रा अभी सीमित है और लॉजिस्टिक चुनौतियां बरकरार हैं। ईरान के साथ चाबहार बंदरगाह परियोजना का प्रश्न अवश्य गूढ़ हो जाता है। चाबहार भारत के लिए केवल एक बंदरगाह नहीं, एक ऐसा मार्ग है जो पाकिस्तान की भौगोलिक बाधा को लांघकर अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच बनाता है। यह परियोजना भारत की उस रणनीतिक कल्पना का हिस्सा है जिसमें वह स्वयं को केवल दक्षिण एशिया तक सीमित नहीं रखता बल्कि यूरेशियाई शक्ति-संरचना में सक्रिय भूमिका निभाना चाहता है। इस व्यापार समझौते में चाबहार पोर्ट पर काई ठोस विवरण शामिल नहीं हैं, लेकिन यह अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हुआ है। भारत को अमरीका से मिले 6 माह के प्रतिबंध छूट ने चाबहार के रणनीतिक भविष्य पर अस्थायी राहत दी थी, जो अप्रेल 2026 तक ही वैध है। 2026-27 के बजट में चाबहार परियोजना के लिए कोई धन आवंटित नहीं किया गया है जो यह संकेत देता है कि भारत इस परियोजना पर पुनर्विचार कर रहा है। हालांकि अगर भारत इस परियोजना से पीछे हटता है तो रिक्त स्थान को भरने के लिए चीन तत्पर खड़ा है।


भारत-अमरीका संबंध दीर्घकालिक रणनीतिक हितों पर आधारित हैं। भविष्य की स्थिरता इसी में निहित है कि भारत आत्मविश्वास के साथ आर्थिक और रणनीतिक क्षमताओं को सुदृढ़ करे तथा अमरीका सहित अपने अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ सहयोग को व्यापक क्षेत्रीय संतुलन और दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों की दिशा में आगे बढ़ाए।