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Rajasthan News: पश्चिमी राजस्थान में थार की उपजाऊ रेतीली मिट्टी उगल रही ‘सोना’

पश्चिमी राजस्थान में थार की उपजाऊ रेतीली मिट्टी आज सचमुच सोना उगल रही है, लेकिन फलोदी के खेतों में पैदा हुआ जीरा गुजरात के नाम से देश-विदेश के बाजारों में बिक रहा है और मुनाफा वहां के उद्योग समेट रहे हैं।

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Photo- Patrika

पश्चिमी राजस्थान में थार की उपजाऊ रेतीली मिट्टी आज सचमुच सोना उगल रही है, लेकिन विडंबना यह है कि उस पर मुहर किसी और राज्य की लग रही है। राजस्थान का नवगठित फलोदी जिला प्रदेश का सबसे बड़ा जीरा उत्पादक क्षेत्र होने के बावजूद आज तक अपना जीरा ब्राण्ड विकसित नहीं कर पाया है। नतीजा यह है कि फलोदी के खेतों में पैदा हुआ जीरा गुजरात के नाम से देश-विदेश के बाजारों में बिक रहा है और मुनाफा वहां के उद्योग समेट रहे हैं।

जीरा उत्पादन में सिरमौर, पहचान में पीछे

जानकारों की मानें तो फलोदी जिले में रबी सीजन के दौरान कुल 3.30 लाख हेक्टेयर बुवाई क्षेत्र में से करीब 1.50 लाख हेक्टेयर, यानी 45 प्रतिशत से अधिक हिस्से में जीरा बोया जाता है।

प्रति हेक्टेयर औसतन 10 क्विंटल उत्पादन के हिसाब से जिले में करीब 15 लाख क्विंटल जीरा हर साल पैदा हो रहा है। यह मात्रा किसी भी कृषि-आधारित जिले को राष्ट्रीय स्तर का ब्राण्ड बनाने के लिए पर्याप्त है।

गुणवत्ता में भी सिरमौर

गौरतलब यह भी है कि फलोदी का जीरा अपनी तेज खुशबू, उच्च तेल मात्रा और बेहतर दानेदार गुणवत्ता के लिए जाना जाता है। यहां की जलवायु, सर्दी का पैटर्न और मिट्टी जीरा उत्पादन के लिए सर्वाधिक अनुकूल मानी जाती है। यही कारण है कि किसानों के लिए जीरा अब रबी की मुख्य नकदी फसल बन चुका है।

फैक्ट फाइल

  • 3.30 लाख हेक्टेयर में इस साल हुई है फलोदी में रबी फसल की बुवाई
  • 1.50 लाख हेक्टेयर जमीन पर किसानों ने दी जीरा को तरजीह
  • 15 लाख क्विंटल जीरा उत्पादन का इस साल है अनुमान
  • 5 जिलों के मध्य स्थिति होने से सीमावर्ती क्षेत्र में बड़ी मंडी का मिले दर्जा
  • 50 से अधिक प्रोसेसिंग युनिट स्थापित हो, तो भी पड़ेंगी कम।
  • 5 लाख से अधिक किसान परिवारों को मिलेगा उद्योगों का लाभ

गुजरात कूट रहा चांदी

गौरतलब है कि ब्राण्डिंग और प्रोसेसिंग के अभाव में फलोदी का अधिकतर जीरा सीधे बिचोलियों के माध्यम से गुजरात पहुंच जाता है। वहां इसकी सफाई, ग्रेडिंग, पैकिंग और निर्यात कर इसे ‘गुजराती जीरा’ के रूप में बेचा जाता है। इससे जहां गुजरात को औद्योगिक लाभ और रोजगार मिल रहा है, वहीं फलोदी के किसान सिर्फ कच्चा माल बैचने तक सीमित रह गए हैं।

औद्योगिक उदासीनता बन रही बाधा

आजादी के आठ दशक बाद और नलकूप आधारित कृषि व्यवस्था के तीन दशक गुजरने के बावजूद फलोदी में जीरा प्रोसेसिंग यूनिट, ब्राण्ड पैकिंग हब और निर्यात केंद्र स्थापित नहीं हो पाए। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह स्थिति प्रशासनिक उदासीनता, कमजोर राजनीतिक इच्छाशक्ति और दीर्घकालिक सोच के अभाव का परिणाम है। यदि स्थानीय स्तर पर उद्योग विकसित होते तो हजारों युवाओं को रोजगार मिलता और किसानों को उनकी उपज का वास्तविक मूल्य मिल पाता।

जिला बनने के बाद जगी नई उम्मीद

फलोदी को जिला का दर्जा मिलने के बाद अब उम्मीद जगी है कि जीरा को उसकी वास्तविक पहचान दिलाने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएंगे।

  • नरेश व्यास, सम्भाग अध्यक्ष, भारतीय किसान संघ

विकसित हो प्रोसेसिंग कलस्टर तो लगेगा जीआई टैग

‘फलोदी जीरा’ के नाम से जीआई टैग, ब्राण्ड रजिस्ट्रेशन और सरकारी समर्थन से प्रोसेसिंग क्लस्टर विकसित किए जाएं, जिससे फलोदी का नाम कृषि उत्पादन में आगे बढ़ेगा और यहां की गुणवत्ता व क्वालिटी में भी निखार आएगा।

  • जयप्रकाश लालजी पुरोहित, अध्यक्ष कृषि उपज मण्डी व्यापार संघ

ब्राण्ड बने तो बदलेगी तस्वीर

यदि फलोदी का जीरा ब्राण्ड बनता है तो न केवल किसानों की आय में बढ़ोतरी होगी, बल्कि पैकेजिंग, परिवहन, मार्केटिंग और निर्यात से जुड़े हजारों नए रोजगार भी पैदा होंगे। यह पहल फलोदी को सिर्फ कृषि उत्पादन का केंद्र ही नहीं, बल्कि एग्री-इंडस्ट्रियल हब के रूप में स्थापित कर सकती है।

  • रामनिवास भादू, उद्यमी

फलोदी को मिले अपनी उपज का ब्राण्ड

जिला बनने के बाद यहां की छिपी ताकत को उभारने की जरूरत है। यहां की आबोहवा और कृषि उत्पादक क्षमता का लाभ किसानों के साथ व्यापार व रोजगार के अवसर बढ़ाने वाला साबित हो, इसके प्रयास किए जाने की जरूरत है।

  • रेशमाराम गोदारा, सामाजिक कार्यकर्ता