
कोलकाता. सरस्वती पूजा केवल विद्यार्थियों का पर्व नहीं है, बल्कि यह साहित्य, कला और बदलते सामाजिक रिश्तों का प्रतिबिंब है। माघ महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को जब पूरा देश बसंत पंचमी मनाता है, तब बंगाल के घर-घर में मां सरस्वती का स्वागत एक अनूठे अंदाज में किया जाता है। समय के साथ सरस्वती पूजा का स्वरूप भी बदल रहा है। यह अब केवल एक धार्मिक अनुष्ठान से बढ़कर एक 'डिजिटल' और 'इको-फ्रेंडली' उत्सव का रूप ले चुकी है। जहां पहले यह केवल घर और स्कूलों तक सीमित थी, अब यह 'थीम आधारित' और 'सोशल मीडिया सेंट्रिक' हो गई है। वहीं पर्यावरण के प्रति बढ़ती जागरूकता ने भी पूजा के तरीके को बदला है। काफी लोग 'प्लास्टर ऑफ पेरिस' के बजाय मिट्टी और प्राकृतिक रंगों की मूर्तियों पर जोर दे रहे हैं। नए ट्रेंड के तहत इस साल पारंपरिक मूर्तियों के साथ-साथ 'इको-फ्रेंडली और 'बीज-मूर्तियों' का जबरदस्त क्रेज है।
'हाते खोड़ी': अक्षर ज्ञान का पहला कदम
बंगाल में इस दिन की सबसे महत्वपूर्ण परंपरा 'हाते खोड़ी' है। जिन बच्चों की शिक्षा शुरू होने वाली होती है, वे आमतौर पर इस दिन पहली बार स्लेट और चॉक थामते हैं। पुजारी बच्चे का हाथ पकड़कर स्लेट पर 'अ, आ, इ' या 'ॐ' लिखवाते हैं। माना जाता है कि देवी सरस्वती के आशीर्वाद से बच्चे का बौद्धिक जीवन उज्जवल होगा।
पूजा से पहले कुल (बेर) खाना वर्जित
बंगाल में सरस्वती पूजा से पहले कुल (बेर) खाना वर्जित माना जाता है। इसे देवी सरस्वती का प्रिय फल माना जाता है और पूजा के दिन इसे प्रसाद के रूप में अर्पित करने के बाद ही इसका सेवन की परंपरा है। मान्यता है कि पूजा से पहले इसे खाना अशुभ है। यह परंपरा बंगाल की विशिष्ट धार्मिक‑सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है। कई लोग बच्चों को समझाने के लिए ऐसा भी कहते है कि अगर पूजा से पहले बेर खाया, तो मां सरस्वती नाराज हो जाएंगी और परीक्षा में नंबर कम आएंगे।
खिचड़ी और 'गोटा सेद्धो' का भोग
सरस्वती पूजा के बाद भोग में खिचड़ी, लाबड़ा (मिश्रित सब्जी) और चटनी का विशेष महत्व है। लेकिन पूजा के अगले दिन, यानी षष्टी पर 'गोटा सेद्धो' खाने की एक खास रस्म है। इस तिथि को 'शीतल षष्ठी' कहा जाता है। 'गोटा सेद्धो' के भोग में पांच या सात प्रकार की साबुत सब्जियों को एक साथ उबालकर ठंडा खाया जाता है, जो बदलते मौसम में सेहत के लिए शुभ माना जाता है।
'इको-फ्रेंडली' और 'बीज-मूर्तियां' पसंद कर रहे लोग
लोग अब 'इको-फ्रेंडली' और 'बीज-मूर्तियाँ' पसंद कर रहे हैं, 'सोशल मीडिया' पर वीडियो वायरल होने के बाद इनकी मांग बढ़ गई है। ये मूर्तियाँ' गमले में भी विसर्जित की जा सकती हैं, जिनसे बाद में तुलसी या अन्य पौधे उग आते हैं। इससे नदियों में होने वाला प्रदूषण भी कम होता है।
- तापस मजूमदार, शिल्पकार
Published on:
23 Jan 2026 02:43 pm

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