
Patrika Series Baghi se Nagrik Chambal ki dusri kahani dakait punjab singh gurjar ki nai kahani(photo:AI)
Dakait Punjab Singh Gurjar: कभी ग्वालियर, मुरैना और शिवपुरी के बीहड़ों के बीच बसे गांवों में जिसके कदमों की आहट से सन्नाटा पसर जाता था, आज उसी पंजाब सिंह गुर्जर उसी इलाके के गांवों में विकास की बात कर रहे हैं। 25 हजार के इनामी, सरेंडर दस्यु रहे पंजाब सिंह अब हथियार नहीं, बल्कि लोकतंत्र के रास्ते अपने गांव कोटा बगौरा (शिवपुरी) की तस्वीर बदलना चाहते हैं। patrika.com संवाददाता संजना कुमार से बातचीत में वे दावा करते हैं कि 'गांव की असली तरक्की पक्की सड़कों से ज्यादा पढ़ाई, सेहत और आधुनिक खेती से होगी।' आप भी जानें पूर्व बागी पंजाब सिंह गुर्जर के भविष्य की नई कहानी...
एमपी के ग्वालियर-चंबल संभाग के बीहड़ों की उस दुनिया में पंजाब सिंह का नाम कभी खौफ का पर्याय था। ग्वालियर-चंबल अंचल में सक्रिय उनके गिरोह में गट्टा गुर्जर, सालिकराम और पप्पू गुर्जर करई जैसे नाम शामिल रहे। 303 बोर की बंदूक और माऊजर उनके हथियार थे। पुलिस मुठभेड़ों, छापों और खौफ के बीच 10 साल तक जंगलों में जिंदगी काटने के बाद उन्होंने सरेंडर किया। आज हालात ये हैं कि उनके गैंग के ज्यादातर सदस्य या तो मारे जा चुके हैं या जिंदगी की दौड़ से बाहर हो चुके हैं। उनकी गैंग के पंजाब और सालिकराम ही बचे हैं।
पंजाब सिंह गुर्जर की यह कहानी सिर्फ अपराध से पश्चाताप की नहीं है, बल्कि गांव का एक कर्ज चुकाने की भी है। पंजाब सिंह मानते हैं कि बागी जीवन के दौरान उनके गांव ने पुलिस की दहशत झेली, कई बार उजड़ने का दर्द सहा। 'मेरी वजह से गांव कई बार डर के साये में जीता रहा। अब बंदूक छोड़ी है तो सरपंच बनकर गांव को सूद समेत लौटाने की हसरत है।' उनके शब्दों में अपराध की स्वीकारोक्ति भी है और भविष्य को सुधारने की बेचैनी भी।
आज पंजाब सिंह खेती-किसानी से जुड़े हैं। पैतृक गांव भंवरपुरा, घाटीगांव सर्किल से लेकर वर्तमान में शिवपुरी के कोटा बगौरा तक उनकी दिनचर्या खेतों और चौपालों में गुजरती है। वे मानते हैं कि अगर गांव के युवाओं को पढ़ाई और हुनर मिल जाए, महिलाओं को सेहत और स्वावलंबन का सहारा मिले और किसानों को नई तकनीकें सिखाई जाएं, तो बीहड़ की पहचान खुद-ब-खुद बदल सकती है।
शिक्षा: गांव में बच्चों के लिए बेहतर स्कूलिंग, ड्रॉपआउट रोकने पर फोकस।
सेहत: प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाएं, समय पर इलाज और जागरुकता।
खेती: परम्परागत खेती से आगे बढ़कर नई तकनीक, सिंचाई और बाजार तक सीधी पहुंच।
हालांकि पंजाब सिंह का अतीत उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती आज भी है। समाज का भरोसा जीतना आसान नहीं। लोग सवाल पूछते हैं, क्या ये बदलाव सच्चा है? कहीं यह राजनीति की राह भर तो नहीं है? पंजाब इन सवालों से भागते नहीं हैं। वे कहते हैं, 'गलतियों से भागने का समय खत्म हो चुका है। अब जवाबदेही निभाने का वक्त है।'
चंबल अंचल ने पहले भी बदलाव की कहानियां देखी हैं, जहां बंदूकें रखी गईं और समाज की मुख्यधारा में लौटने की कोशिश हुई। पंजाब सिंह की कहानी भी उसी कड़ी का एक नया अध्याय है। फर्क बस इतना है कि इस बार बीहड़ों से निकली आवाज विकास की है, न कि दहशत की। क्या पंजाब सिंह गुर्जर वाकई गांव की किस्मत बदल पाएंगे? यह फैसला वक्त और गांव की जनता करेगी। लेकिन इतना तय है कि चंबल की धरती पर 'बंदूक नहीं, कुर्सी' से बदलाव की यह कोशिश अपने आप में एक बड़ी खबर है, जो डर के अतीत से उम्मीद के भविष्य तक की दूरी नाप रही है।
• निवास: पैतृक गांव भंवरपुरा, घाटीगांव सर्किल, अब शिवपुरी के कोटा बगौरा गांव में खेती-किसानी।
• दस्यु जीवन: 25 हजार का इनामी। गिरोह में गटटा गुर्जर, सालिकराम, पप्पू गुर्जर करई शामिल थे।
• हथियार: 303 बोर की बंदूक, माऊजर।
• वर्तमान स्थिति: गैंग के ज्यादा सदस्य मारे जा चुके हैं, पंजाब और सालिकराम बचे हैं।
10 साल जंगल और बीहड़ में बागी बनकर गुजारने वाले पंजाब सिंह गुर्जर का मानना है कि गांव का विकास सिर्फ पक्की सड़कों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि आने वाली पीढ़ी को पढ़ाई, सेहत और खेती में सुधार की तकनीकें मिलनी चाहिए। पंजाब कहते हैं, "बागी जिंदगी में मेरी वजह से यह गांव कई बार पुलिस की दहशत से सहमा और उजड़ा है। अब बंदूक छोड़ी है तो सरपंच बनकर गांव को सूद समेत लौटाने की हसरत है।"
Published on:
28 Jan 2026 06:46 pm

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