
उपभोक्ता आयोग ने माना सेवा में कमी, 50 हजार मुआवजा देने के आदेश
घरेलू बिजली कनेक्शन में सुधार का काम एक डॉक्टर के लिए जानलेवा साबित हो सकता था। मीटर और सर्विस लाइन बदलने के दौरान बरती गई गंभीर लापरवाही को जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोषण आयोग (उपभोक्ता फोरम) ने स्पष्ट रूप से सेवा में कमी माना है। आयोग ने बिजली वितरण कंपनी को दोषी ठहराते हुए पीड़ित डॉक्टर को 50 हजार रुपए की क्षतिपूर्ति और 2 हजार रुपये वाद व्यय देने के आदेश दिए हैं।
मामला वर्ष 2014 का है। शिकायतकर्ता डॉक्टर पंकज श्रीवास्तव के आवास पर घरेलू बिजली कनेक्शन से जुड़ा कार्य किया जा रहा था। आरोप है कि बिना किसी पूर्व सूचना के बिजली कंपनी के कर्मचारियों और अधिकृत ठेकेदार ने पुराना मीटर और सर्विस लाइन हटाकर नया कनेक्शन लगाने की प्रक्रिया शुरू की। इस दौरान लाइन से जुड़ा सर्विस केबल जमीन पर खुला छोड़ दिया गया और बिजली आपूर्ति बंद किए बिना ही काम चलता रहा। शिकायत के अनुसार कर्मचारियों ने यह कहकर आश्वस्त किया कि लाइन में करंट नहीं है और कोई खतरा नहीं है। इसी भरोसे पर डॉक्टर ने रास्ते में पड़े तार को हटाने का प्रयास किया, लेकिन वह करंट की चपेट में आ गए। तेज झटका लगते ही वह जमीन पर गिर पड़े और सिर, गर्दन व कमर में गंभीर चोटें आईं। स्थिति इतनी गंभीर थी कि उन्हें मृत समझकर कर्मचारी मौके से भाग गए। परिजनों ने साहस दिखाते हुए लकड़ी के डंडे से तार अलग किया और डॉक्टर की जान बचाई। बाद में उन्हें तत्काल अस्पताल में भर्ती कराया गया। घटना के बाद डॉक्टर ने इसे बिजली कंपनी की घोर लापरवाही बताते हुए जिला उपभोक्ता आयोग में परिवाद दायर किया। उनका कहना था कि यह स्पष्ट रूप से सेवा में कमी और उपभोक्ता की सुरक्षा से खिलवाड़ का मामला है। वहीं, बिजली कंपनी ने अपने जवाब में आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि कार्य अधिकृत ठेकेदार द्वारा किया गया था और दुर्घटना के लिए स्वयं शिकायतकर्ता जिम्मेदार है।
सुनवाई के दौरान आयोग ने दोनों पक्षों के तर्क, शपथपत्र और दस्तावेजों का बारीकी से परीक्षण किया। आयोग ने माना कि मीटर और सर्विस लाइन बदलने का कार्य बिजली कंपनी की जानकारी और नियंत्रण में कराया जा रहा था। ऐसे में ठेकेदार की लापरवाही के लिए कंपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती। खुले में छोड़ा गया करंटयुक्त तार उपभोक्ता के लिए जानलेवा खतरा था, जो स्पष्ट रूप से सेवा में कमी को दर्शाता है।
-स्थायी या अस्थायी विकलांगता तथा इलाज पर हुए खर्च के पर्याप्त दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए गए हैं। इसी कारण दावा आंशिक रूप से स्वीकार किया गया। आयोग ने बिजली कंपनी को निर्देश दिए कि वह 45 दिनों के भीतर डॉक्टर को 50 हजार रुपये मुआवजा और 2 हजार रुपए वाद व्यय के रूप में अदा करे। तय अवधि में भुगतान नहीं होने की स्थिति में राशि पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।
Published on:
09 Feb 2026 11:21 am
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