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एम्स जोधपुर ने छाती की पसलियों से बाहरी कान बनाया, 100 बच्चों के लगाए, ऐसे बनाते हैं बाहरी कान

एम्स जोधपुर के नाक, कान व गला रोग (ईएनटी) विभाग के डॉक्टर्स छाती की पसलियों से कार्टिलेज निकालकर उसका बाहरी कान बना रहे हैं और ऐसे बच्चों के लगा रहे हैं, जिनके जन्मजात बाहरी कान यानी पिन्ना नहीं होता है।

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फोटो पत्रिका नेटवर्क

जोधपुर। एम्स जोधपुर के नाक, कान व गला रोग (ईएनटी) विभाग के डॉक्टर्स छाती की पसलियों से कार्टिलेज निकालकर उसका बाहरी कान बना रहे हैं और ऐसे बच्चों के लगा रहे हैं, जिनके जन्मजात बाहरी कान यानी पिन्ना नहीं होता है। ऐसे बच्चों को कम सुनाई देता है, जिससे कम समझ में आता है। इससे उनकी स्पीच भी स्पष्ट नहीं होती। अब तक एम्स में 100 से अधिक बच्चों के बाहरी कान बनाकर लगाए हैं। 60 बच्चे अभी कतार में हैं, जिनकी एक साल की वेटिंग है।

बाहरी कान प्रत्यारोपित करने वाले करीब 50 प्रतिशत बच्चों में एम्स ने कान में बोन कंडक्शन इंप्लांट मशीन भी लगाई है ताकि बच्चे अच्छी तरह से सुन सकें। यह मशीन 5.50 लाख रुपए की आती है। यह मशीन किसी योजना में शामिल नहीं है। मरीज को खुद पैसे देने पड़ते हैं। जन्मजात बच्चों के अलावा जलने और दुर्घटना में घायल हुए मरीजों के लिए भी बाहरी कान बनाकर लगाया जाता है ताकि उनका रंग-रूप प्रभावित न हो।

ऐसे बनाते हैं बाहरी कान

एम्स के ईएनटी विभागाध्यक्ष डॉ. अमित गोयल और डॉ. कपिल सोनी ने बताया कि छाती की पसलियाें में कोमल हड्डी होती है जिनकाे मोड़ सकते हैं। इसलिए पसलियों के हिस्से से बाहरी कान तैयार किया जाता है। उसके बाद सर्जरी करके त्वचा के अंदर बाहरी कान को फिट कर दिया जाता है। छह महीने में बाहरी कान त्वचा के अंदर काफी विकसित हो जाता है। फिर डॉक्टर्स त्वचा से कान को बाहर निकाल देते हैं।

कॉकलियर इंप्लांट फ्री है तो यह क्यों नहीं

जिन बच्चों के कान नहीं होता, उनकी श्रवण शक्ति कमजोर होती है। डॉक्टर्स को ऐसे बच्चों को बोन कंडक्शन इंप्लांट मशीन लगानी ही पड़ती है। साढ़े पांच लाख रुपए की मशीन होने के कारण गरीब लोग वहन नहीं कर पाते। दिसम्बर और जनवरी में दो छोटे गरीब बच्चों के लिए दो भामाशाह ने पैसे दिए थे।

एम्स प्रशासन ने राज्य सरकार को पत्र इस मशीन को लिखकर मुख्यमंत्री आयुष्मान आरोग्य योजना में शामिल करने की बात कही है। कॉकलियर इंप्लांट भी 5.50 लाख रुपए का आता है लेकिन सरकारी योजना में फ्री है और कई अस्पतालों में लगाया जाता है जबकि बोन कंडक्शन इंप्लांट मशीन भी इतने ही रुपए की है और फ्री नहीं है।

10 डॉक्टर्स को ट्रेनिंग दी

एम्स ने गत सप्ताह बाहरी कान बनाने पर देशभर के 10 डॉक्टर्स के लिए हैंड्स ऑन वर्कशॉप रखी, जिसमें जर्मनी से सिलिकोन मंगवाकर उस पर बाहरी कान बनाने की प्रेक्टिस करवाई गई। यह एशिया में इस तरह की पहली वर्कशॉप थी। अब से डॉक्टर अपने अस्पतालों में जाकर बाहरी कान की सर्जरी कर पाएंगे।

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