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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: जिला जज के बार-बार ट्रांसफर पर रोक! सुरक्षित रखा पद और वेतन का सम्मान

2021 में सात बार ट्रांसफर झेल चुके राजस्थान के एक जज ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। अब सुप्रीम कोर्ट से जज को राहत मिली है।

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Court Order

प्रतीकात्मक फोटो ( स्रोत Gemini )

Court Order राजस्थान में न्यायिक अधिकारियों के तबादलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने राजस्थान के प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट जज ( PDJ ) दिनेश कुमार गुप्ता की रैंक वेतन और प्रशासनिक दर्जे की रक्षा करते हुए उन्हें बड़ी राहत दी है। बता दें कि गुप्ता ने पिछले साल अदालत का दरवाजा खटखटाया था जिसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि 2021 से अब तक उनका सात बार ट्रांसफर किया जा चुका है, जो मौजूदा ट्रांसफर पॉलिसी का सीधा उल्लंघन है।

ये है पूर मामला

जज दिनेश कुमार गुप्ता ने अपनी याचिका में कहा था कि उन्हें जानबूझकर टारगेट किया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद हाई कोर्ट ने उन्हें लेबर कोर्ट-कम-इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल ( जयपुर मेट्रोपॉलिटन ) में पीठासीन अधिकारी के रूप में तैनात किया था। याचिकाकर्ता ने इस पर भी चिंता जताई थी कि यह पोस्टिंग उनके 'प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट जज' के कद और रैंक के अनुरूप नहीं है। इसी याचिका की सुनवाई करते हुए अब सुप्रीम कोर्ट ने उन्हे राहत दी है।

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने दिए ये निर्देश

Live Law के अनुसार CJI सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने इस मामले की सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता के हितों की रक्षा के लिए कुछ निर्देश भी दिए। निर्देशों में कहा गया कि, वेतन और भत्ते बरकरार रहेंगे। लेबर कोर्ट में पोस्टिंग के दौरान भी याचिकाकर्ता को वे सभी वेतन और भत्ते मिलेंगे जो एक 'प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट जज' को मिलते हैं। इसके साथ ही प्रशासनिक दर्जा भी रहेगा। याचिकाकर्ता किसी जूनियर या अन्य डिस्ट्रिक्ट जज को रिपोर्ट नहीं करना पड़ेगा। उनकी कार्यप्रणाली का प्रशासनिक नियंत्रण सीधे उस सेशंस डिवीजन के प्रशासनिक पोर्टफोलियो जज के पास होगा।

नजीर बन गया फैसला ( Court Order )

इतना ही नहीं कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भले ही पद का नाम अलग हो लेकिन याचिकाकर्ता के 'मूल रैंक' और 'प्रशासनिक दर्जे' में कोई कमी नहीं आएगी। राजस्थान हाईकोर्ट ने इन निर्देशों को स्वीकार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट में किए गए आवेदन का निपटारा कर दिया। अब इस फैसले को नजीर के रूप में माना जा रहा है। यह फैसला उन अधिकारियों के लिए एक बड़ी नजीर है जो तबादला नीति के उल्लंघन और बार-बार होने वाले ट्रांसफर से प्रभावित होते हैं।