
नई दिल्ली। आर्द्रभूमियां केवल पारिस्थितिकी तंत्र नहीं, बल्कि सदियों से मानव ज्ञान, संस्कृति और संरक्षण परंपराओं से जुड़ी जीवंत सांस्कृतिक विरासत हैं। वेटलैंड्स इंटरनेशनल साउथ एशिया की ओर से इंडिया इंटरनेशनल सेंटर एनेक्सी में विश्व आर्द्रभूमि दिवस 2026 के अवसर पर आयोजित सेमिनार में विशेषज्ञों ने इस तरह की बातें रखी। सेमिनार की थीम आर्द्रभूमि और पारंपरिक ज्ञान: सांस्कृतिक विरासत का उत्सव रहा।
मुख्य अतिथि संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) भारत के प्रमुख डॉ. बालकृष्ण पिसुपति ने कहा कि आर्द्रभूमियां संस्कृति, आजीविका, खाद्य प्रणालियों और मानव कल्याण से गहराई से जुड़ी हुई हैं। उन्होंने कहा कि पारंपरिक ज्ञान कोई लोककथा नहीं, बल्कि पीढिय़ों से विकसित अनुभव आधारित विज्ञान है, जिसे आधुनिक विज्ञान के साथ सम्मानपूर्वक जोडऩा जरूरी है, खासकर बदलते जलवायु परिदृश्य में। पिसुपति ने रामसर कन्वेंशन को आर्द्रभूमि संरक्षण का अहम ढांचा बताते हुए जैव विविधता अधिनियम, पीपुल्स बायोडायवर्सिटी रजिस्टर और बायोडायवर्सिटी हेरिटेज साइट्स जैसे भारतीय कानूनी प्रावधानों के प्रभावी उपयोग पर जोर दिया।
भारत में आर्द्रभूमि विनियमन और शासन को मजबूत करना विषय पर पैनल चर्चा भी हुई, जिसमें संरक्षण कानूनों के क्रियान्वयन में कमियों, संस्थागत बिखराव और जन-जागरूकता की कमी पर चिंता जताई गई। वेटलैंड्स इंटरनेशनल साउथ एशिया के अध्यक्ष प्रो. सी.के. वर्षनेय ने कहा कि रामसर मान्यता संरक्षण की शुरुआत होनी चाहिए, अंत नहीं। उन्होंने आर्द्रभूमियों के संरक्षण के लिए मजबूत शासन, बेहतर निगरानी और समुदायों की सक्रिय भागीदारी पर बल दिया। सेमिनार के दौरान आर्द्रभूमि विषयक कई प्रकाशनों, तकनीकी संसाधनों और पोस्टरों का विमोचन भी किया गया। इसमें सरकारी एजेंसियों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों, शिक्षाविदों, नागरिक समाज और मीडिया से जुड़े प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।
Published on:
03 Feb 2026 04:23 pm
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