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77 साल पहले 26 जनवरी की सुबह गौरव का एहसास और जिज्ञासा लेकर आई, स्कूल-कॉलेजों में चला झंडा फहराने का दौर

रायपुर। 26 जनवरी 1950 की सुबह का स्वागत किया था। उस पल के सही मायने उन दिलों में आज भी ताजा है, जिन्होंने झंडा फहराने में शामिल होने के बाद जाना कि हमारे देश का भी एक संविधान है।

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77 साल पहले 26 जनवरी की सुबह गौरव का एहसास और जिज्ञासा लेकर आई,स्कूल-कॉलेजों में चला झंडा फहराने का दौर

रायपुर। लोगों ने गणतंत्र राष्ट्र होने के गौरवशाली पल का एहसास लेकर 26 जनवरी 1950 की सुबह का स्वागत किया था। उस पल के सही मायने उन दिलों में आज भी ताजा है, जिन्होंने झंडा फहराने में शामिल होने के बाद जाना कि हमारे देश का भी एक संविधान है, जो हमें अधिकारों के साथ ही कर्तव्यों से भी जोड़ने वाला है। इसे बताने के लिए गोष्ठियों और संवादों में भी लोग शामिल हुए।

संविधान का महत्व बताने की गई गोष्टी

मोहबाबाजार निवासी 87 वर्षीय वीके अडवाल ले बताया कि उस सुबह गली -मोहल्लों से लेकर मंदिरों में मी उत्सव का माहौल था। सुबह झंडा फहराने का दौर स्कूल-कॉलेजों में चला । प्रयुद्धजनों ने संविधान के महत्व को बताने के लिए चर्चा और गोष्ठी की थी। इसमें हर वर्ग के लोगों की सह‌नामिता थी।

मठ-मंदिरों में फहराया गया था झंडा

मठपारा के बजरंग चौक निवासी 80 वर्षीय चेतन भारती ने बताया कि आजादी की खुशी के तीन साल बाद दूसरी खुशी गणतंत्र राष्ट्र होने का मिला। सुबह टाउन हाल, कमिश्नरी सहित मठ-मंदिरो में झंडा फहराया गया। साथ ही लोगों की जिज्ञासा को देखते हुए गोष्ठियों के जरिए बताया गया कि संविधान लागू होने से हमें एक राष्ट्र के रूप में पहचान मिली है।

वह सुबह उत्साह व जिज्ञासा लेकर आई थी

80 वर्षीय इतिहासकार प्रो. रमेन्द्रनाथ मिश्र ने बताया कि गुलामी के दिनों को इस रायपुर में बड़े भाई ने देखा था। जब देश का संविधान लागू हुआ, उससे जुड़ी बातें बड़े भाई स्व. सुरेन्द्र नाथ मिश्र से सुना है। यह बताते थे कि. 26 जनवरी की वह सुबह लोगों के लिए नई जिज्ञासा लेकर आई थी। खुशी में लोगों ने दुकानों पर मिठाई चांटी कई जगह तिरंगा फहराया।

लोगों में देश के प्रति निष्ठा कम हो गई

पुरानी बस्ती बनियापारा निवासी 90 वर्षीय कृष्ण गोपाल अग्रवाल यादें साझा करते हुए बताया कि जो उत्साह 77 साल पहले मैंने देखा था अब वह आत्मीय एहसास खो गया है। मध्यता के उस गौरव को माना तो दिया, लेकिन दिलों में देश के प्रति सच्ची निष्ठा लोगों में पहले देखने को मिलती थी वह अब जाने कहां खो गई है।