
प्रतीकात्मक तस्वीर | Photo - Patrika
UGC Controversy : यूजीसी इन दिनों विवाद के कारण चर्चा में है। 13 जनवरी को प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन) रेगुलेशंस 2026 जारी किया गया। इस रेगुलेशन में 3 (C) को भेदभावपूर्ण बताकर उच्च जाति के लोग विरोध कर रहे हैं। इसके अलावा सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर जातिगत अभद्र टिप्पणी की जा रही है। इस मुद्दे को लेकर 'पत्रिका' के रवि कुमार गुप्ता ने यूजीसी के एक्स चेयरमैन (2006-2011) प्रोफेसर सुखदेव थोराट (Sukhadeo Thorat) से बातचीत की। इसको लेकर प्रोफेसर थोराट ने बताया है कि ये दलित, आदिवासी और ओबीसी के लिए कितना सही, यूजीसी रेगुलेशन 2026 में क्या कमियां हैं, 2012 में कैसे बना था रेगुलेशन और अगड़ी जाति के दिक्कत होने की असली वजह क्या है?
प्रोफेसर थोराट ने शिक्षण संस्थान में जातिगत भेदभाव को समझाते हुए कहते हैं कि दलित लड़कियों को "कोटे से हो या कोठे से…", ये कहकर शोषण किया जाता है, ये बात आईआईटी बॉम्बे के सर्वे रिपोर्ट में सामने आई थी। ये सिर्फ एक मामला है। ऐसी कई गालियां हैं जिसे हमारे बच्चे सुनते हैं। आपको यूजीसी में रेगुलेशन बनाने की कहानी बताता हूं- एम्स में दो बच्चों ने सुसाइड किया था जिसके बाद हेल्थ सेक्रेटरी का मुझे फोन आया और फिर 2007 में एम्स में जातिय भेदभाव को लेकर प्रोफेसर सुखदेव थोराट कमेटी बनी थी और फिर 2008 में रोकने के लिए एक्ट बनाया गया था। इस कमेटी की रिपोर्ट में जातिगत भेदभाव की कई बातें सामने आई थी। हालांकि, एम्स ने स्वीकार नहीं किया लेकिन फिर एम्स ने एक बच्चे ने सुसाइड की, फिर जेएनयू के छात्र ने भी…। हालांकि, आईआईटी बॉम्बे में भी जातीय भेदभाव को लेकर कुछ रिपोर्ट्स बनी हैं जिनको आजतक सार्वजनिक नहीं किया जा रहा है।
वो आगे कहते हैं, इस तरह से ये मामला बढ़ने लगा तब कपिल सिब्बल से मेरी बातचीत हुई थी। कपिल साहब ने यूजीसी को रेगुलेशन बनाने का आदेश दिया था। हालांकि, यूजीसी में मेरा टर्म खत्म हो चुका था लेकिन फिर भी मैं हमेशा यूजीसी एक्ट बनाने की बात कहता रहता था इसलिए मुझे तत्कालीन ओएसडी की ओर से यूजीसी एक्ट का ड्राफ्ट तैयार करने के लिए कहा गया और मैंने भेजा भी था। इसके बाद यूजीसी रेगुलेशन 2012 को लागू कर दिया गया। मगर, अच्छी तरह से पालन नहीं करने के कारण एट्रोसिटी, सुसाइड केस सामने आते रहे।
2012 के रेगुलेशन में फॉर्म्स ऑफ डिस्क्रिमिनेशन में ये बताया गया था कि स्टूडेंट्स, टीचर, एडमिनिशट्रेशन का कौन-सा बर्ताव भेदभाव माना जाएगा। अब नए रेगुलेशन 2026 में 12 हजार स्टैंडअलोन इंस्टीट्यूट, 23 आईआईटी, 21 आईआईएम कवर नहीं होंगे। क्योंकि, इसको लेकर पूरी तरह से स्पष्टीकरण ही नहीं है। जबकि, कई जातीय भेदभाव और सुसाइड के मामले ऐसे संस्थानों से सामने आ चुके हैं।
रोहित वेमुला, पायल तड़वी, दर्शन सोलंकी का गिनाते हुए वो कहते हैं कि ये सब देखकर भी यूजीसी का रेगुलेशन पूरी तरह से दलित-वंचित छात्रों को प्रोटेक्ट नहीं करता है। जबकि, हम लोग लगातार इसको लेकर मांग कर रहे हैं। ये तो सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है तब जाकर सरकार ने रेगुलेशन तैयार करके पेश किया है। हालांकि, ये काफी हद तक सही भी है।
प्रोफेसर ने नई अधिसूचना को अपनी भाषा में समझाते हुए कहा कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग विनिमय 2026 का उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थाओं में समानता को बढ़ाना है। इससे किसी भी वर्ग के छात्र, छात्राओं के साथ भेदभाव को रोका जा सके। धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म स्थान, विकलांगता के आधार पर छात्र-छात्राओं से भेदभाव ना हो इसलिए ये बनाया गया। विशेष रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों, विकलांगों के लिए सही वातावरण देना ताकि इनके साथ कोई भेदभाव ना हो।
साथ ही विवाद का मूल कारण ये है कि जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा में अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) को शामिल किया गया है। इसके पहले, ड्राफ्ट में जातिगत भेदभाव से सुरक्षा के दायरे में केवल एससी और एसटी (अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति) को ही शामिल किया गया था। साथ ही कई लोगों को लग रहा है कि इससे सवर्ण जाति के लोगों को जगह नहीं मिली है। इससे उच्च जाति के छात्रों के खिलाफ आसानी से भेदभाव का आरोप लग सकता है और उनका करियर खतरे में पड़ सकता है।
वो इसको लेकर कहते हैं, यूजीसी रेगुलेशन 2026 का विरोध उच्च जाति वाले कर रहे हैं। जबकि, उनके साथ जातीय भेदभाव होता नहीं है। जातिगत रूप से दलित, आदिवासी और कुछ हद तक ओबीसी छात्रों, कर्मचारियों, शिक्षकों के साथ भेदभाव किया जाता है। ये बात कमेटी, सर्वे और खबरों में सामने आ चुकी है। ऐसे में सवर्ण वर्ग क्यों चिंता कर रहा है।
जब मैं भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR) का चेयरमैन था जो जातीय भेदभाव के मामले को बढ़ता देखकर नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशनल प्लानिंग एंड एडमिनिस्ट्रेशन को 15-16 लाख फंड देकर बड़े पैमाने पर शिक्षण संस्थानों में सर्वे करने को कहा तब भी यही बात सामने आई। ऐसे में यूजीसी रेगुलेशन को दलित, आदिवासी, ओबीसी के लिए मजबूत करने की जरुरत है ना कि शोषण करने वाले समाज को।
नए रेगुलेशन में कमेटी (समता समिति, कुलपति) के हवाले है, वो तय करेंगे कि भेदभाव किस प्रकार का था या आगे किस प्रकार की कार्रवाई की जाए। सोचिए, उस कमेटी में कौन होगा और क्या वो जातिगत रूप से प्रताड़ितों के लिए न्याय करेगा। इसलिए, सवर्ण को आक्रोशित होने की जरुरत नहीं है।
मंगलवार को अधिवक्ता विनीत जिंदल ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। याचिकाकर्ता ने बताया है कि यूजीसी के इक्विटी रेगुलेशन 2026 के नियम 3(सी) पर रोक लगाने की मांग की गई है। याचिका में उल्लेखित है कि यह प्रावधान जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा को केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग तक सीमित करता है।
हालांकि, आगे देखना है कि सरकार की ओर से इसको लेकर क्या कदम उठाए जाते हैं। चलिए, अंत में यूजीसी बनने का इतिहास देखते हैं-
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) भारत में विश्वविद्यालयी शिक्षा के मानकों को बनाए रखने, समन्वय करने और बढ़ावा देने के लिए जिम्मेदार निकाय है। इसे औपचारिक रूप से नवंबर 1956 में संसद के एक अधिनियम (UGC अधिनियम, 1956) के माध्यम से एक वैधानिक निकाय (Statutory Body) के रूप में स्थापित किया गया था।
Updated on:
27 Jan 2026 06:16 pm
Published on:
27 Jan 2026 02:29 pm
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