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बांस की खेती, उत्पादकता पर सवाल, नहीं मिल रही सहायता

सिरे नहीं चढ़ रही योजना : बांस का उत्पादन व उत्पाद नही चढ़ पा रहा परवान बारां. बारां जिले में बांस की खेती और उससे जुड़े उत्पादक कार्य अब धीमे पड़ गए हैं। पूर्व में प्रदेश सरकार द्वारा लागू की गई बांस योजना के बावजूद जिले में बांस उत्पादन और सामग्री निर्माण अब पिछड़ गया […]

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बारां

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Mukesh Gaur

Jan 29, 2026

बांस योजना के बावजूद जिले में बांस उत्पादन और सामग्री निर्माण अब पिछड़ गया है। किशनगंज, शाहाबाद और छबड़ा क्षेत्र के कई परिवार बांस से जुड़ी परंपरागत आजीविका पर निर्भर हैं, लेकिन सरकारी सहायता और मार्गदर्शन न मिलने के कारण उत्पादन में गिरावट आई है।

बारां. जिले के किशनगंज क्षेत्र के रामगढ़ में बांस से ढाले बनाते एक परिवार के सदस्य। पत्रिका

सिरे नहीं चढ़ रही योजना : बांस का उत्पादन व उत्पाद नही चढ़ पा रहा परवान

बारां. बारां जिले में बांस की खेती और उससे जुड़े उत्पादक कार्य अब धीमे पड़ गए हैं। पूर्व में प्रदेश सरकार द्वारा लागू की गई बांस योजना के बावजूद जिले में बांस उत्पादन और सामग्री निर्माण अब पिछड़ गया है। किशनगंज, शाहाबाद और छबड़ा क्षेत्र के कई परिवार बांस से जुड़ी परंपरागत आजीविका पर निर्भर हैं, लेकिन सरकारी सहायता और मार्गदर्शन न मिलने के कारण उत्पादन में गिरावट आई है।

हाड़ौती क्षेत्र की जलवायु बांस उत्पादन के लिए अत्यंत अनुकूल मानी जाती है। कृषि वैज्ञानिक डॉ. डीके ङ्क्षसह के अनुसार जिले की जलवायु बांस की खेती के लिए उपयुक्त है और इसे ‘‘हरा सोना’’ भी कहा जाता है। बांस की फसल एक बार लगाने पर कई साल तक लाभ दे सकती है। बांस के पौधों में आठ से दस गुच्छे पैदा होते हैं, कटाई के बाद नए गुच्छे स्वत: तैयार हो जाते हैं। खेत में तापमान 10-15 डिग्री कम रहता है और पत्तियां खाद के रूप में काम करती हैं। जिले के बसैड़ा (बांसफोड़ा) समाज से जुड़े करीब 300-400 परिवार पहले बांस से टोकरी, ढाला, सूप और बिजणा बनाकर आजीविका चलाते थे। किशनगंज क्षेत्र के रामगढ़ क्षेत्र में ही ्र150 परिवार बांस सामग्री निर्माण से जुड़े हैं। लेकिन अब कई परिवार यह कार्य करना बंद कर चुके हैं, क्योंकि बांस उपलब्ध कराने और उत्पाद बनाने में कठिनाइयां बढ़ गई हैं। पूर्व में जंगलों से उपलब्ध बांस अब खरीदकर लाना पड़ता है, जिससे उत्पादन लागत बढ़ी है। अब केवल टोकरी और ढाला की ही मांग बाजार में बनी हुई है, जबकि सूप और बिजणे की मांग घट चुकी है।

सरकारी सहायता का अभाव बना समस्या

रामगढ़ क्षेत्र के निवासी गुरुवचन भारती और चंदालाल धानुक ने बताया कि वर्षों से पुश्तैनी कार्य से जुड़े परिवारों को सरकारी स्तर पर कोई सहायता नहीं मिली है। न तो बांस उत्पादन के लिए प्रशिक्षण, न सामग्री निर्माण और विपणन के लिए कोई मदद मिली है। इसी वजह से बांस उद्योग जिले में पर्याप्त रूप से विकसित नहीं हो पाया। राजस्थान में बांस योजना केंद्र प्रायोजित राष्ट्रीय बांस मिशन के अंतर्गत चलाई जा रही है। इसका उद्देश्य है किसानों की आय बढ़ाना, गैर वन क्षेत्रों में बांस की खेती को बढ़ावा देना, बांस आधारित उद्योगों के लिए कच्चा माल सुनिश्चित करन। योजना के तहत बांस नर्सरी स्थापित करने, उच्च घनत्व वाली खेती करने और कटाई के बाद प्रसंस्करण हेतु वित्तीय सहायता दी जाती है। निजी क्षेत्र में बांस रोपण के लिए 50 प्रतिशत तक अनुदान मिलता है, जो लगभग 0.6 लाख रुपए प्रति हेक्टेयर तक हो सकता है। देश में मिजोरम में बांस की प्राकृतिक प्रचुरता अन्य राज्यों की तुलना में सबसे अधिक है। मिजोरम में बांस के जंगल राज्य के भौगोलिक क्षेत्र के लगभग 57 प्रतिशत हिस्से में फैले हैं, जो स्थानीय लोगों की आजीविका और उद्योगों के लिए महत्वपूर्ण हैं। कृषि (विस्तार) विभाग के संयुक्त निदेशक आनंदी लाल मीणा ने बताया कि जिले में बांस की खेती के लिए किसानों में रुचि कम है, जबकि जलवायु पूरी तरह अनुकूल है। उनका कहना है कि बांस की खेती कम लागत में अधिक आय दे सकती है और इसे बढ़ावा देने के लिए सरकारी प्रशिक्षण, बाजार सुविधा और वित्तीय मदद जरूरी है।