11 फ़रवरी 2026,

बुधवार

Patrika Logo
Switch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

किड्स कॉर्नर: चित्र देखो कहानी लिखो 65 …. बच्चों की लिखी रोचक कहानियां परिवार परिशिष्ट ( 4 जनवरी 2026) के पेज 4 पर किड्स कॉर्नर में चित्र देखो कहानी लिखो 65 में भेजी गई कहानियों में विवेक चौधरी, दीपेंद्र सिंह और भूमि कन्नौजिया क्रमश: प्रथम, द्वितीय और तृतीय विजेता रहे। इनके साथ सराहनीय कहानियां भी दी जा रही हैं।

बाल कहानी संग्रह: प्रकृति और ईमानदारीअसली खजानाकार्तिकेय राज सिंह अहाड़ा, उम्र: 9 वर्षएक समय की बात है, रोहित और राहुल टहलते हुए एक विशाल पेड़ के पास पहुंचे। वहां बैठकर वे आपस में बातें करने लगे कि आज का जमाना कितना मतलबी हो गया है। लोगों को अपने जीवन की कोई परवाह नहीं है। लोग […]

12 min read
Google source verification

जयपुर

image

Tasneem Khan

Feb 11, 2026

बाल कहानी संग्रह: प्रकृति और ईमानदारी
असली खजाना
कार्तिकेय राज सिंह अहाड़ा, उम्र: 9 वर्ष
एक समय की बात है, रोहित और राहुल टहलते हुए एक विशाल पेड़ के पास पहुंचे। वहां बैठकर वे आपस में बातें करने लगे कि आज का जमाना कितना मतलबी हो गया है। लोगों को अपने जीवन की कोई परवाह नहीं है। लोग बस सोने और खाने में व्यस्त हैं, लेकिन जो पेड़ हमें मीठे फल और अच्छा स्वास्थ्य देते हैं, हम उनकी परवाह करना भूल गए हैं। उन्होंने चर्चा की कि पेड़ हमें कितने अनमोल उपहार देते हैं। जैसे आम, चीकू, केला, अमरूद, बेर, पपीता, सेब और सीताफल। इन फलों में ही हमारी सेहत का राज छिपा है। तभी रोहित और राहुल ने ठान लिया कि वे इस कुदरती खजाने को बचाएंगे और लोगों का जीवन सुधारेंगे। उन्होंने अपनी जमा-पूंजी से बहुत सारे छोटे-छोटे पौधे खरीदे और उन्हें जगह-जगह लगाना शुरू कर दिया। वे रोजाना पौधों को पानी देते और उनकी देखभाल करते। धीरे-धीरे वे पौधे बड़े हुए और उनमें ढेर सारे फल लगने लगे। उन फलों को खाकर गांव के लोग स्वस्थ होने लगे। तब सबको समझ आया कि असली खजाना सोना-चांदी नहीं, बल्कि ये पेड़-पौधे ही हैं, जो हमें जीवन और स्वास्थ्य प्रदान करते हैं।

नेक इरादा और छिपा खजाना
नाम: ऋषि कांत शर्मा, उम्र: 8 वर्ष
साल रमेश और निकेश बहुत पक्के मित्र थे। एक दिन वे दोनों मैदान में मिट्टी से खेल रहे थे। खेलते-खेलते उनके मन में एक बहुत अच्छा विचार आया। उन्होंने सोचा कि क्यों न इस खाली जगह को हरा-भरा बनाया जाए और यहां कुछ पौधे लगाए जाएं। दोनों ने मिलकर तय किया कि वे यहां पौधारोपण करेंगे। निकेश तुरंत भागकर अपने घर गया और एक नन्हा सा पौधा ले आया। दूसरी ओर, रमेश ने पौधा लगाने के लिए जमीन में गड्ढा खोदना शुरू कर दिया। रमेश अभी कुछ ही गहराई तक गड्ढा खोद पाया था कि उसकी कुदाल किसी सख्त चीज से टकराई। दोनों ने उत्सुकता से और खुदाई की, तो उन्हें मिट्टी के नीचे दबा हुआ एक छोटा सा संदूक मिला। जब उन्होंने सावधानी से उस संदूक को खोला, तो उनकी आंखें फटी की फटी रह गईं। उसमें सोने के ढेर सारे सिक्के चमक रहे थे। इतना बड़ा खजाना पाकर दोनों दोस्त बहुत खुश हुए। लेकिन सबसे अच्छी बात यह थी कि उन्होंने अपने नेक काम को अधूरा नहीं छोड़ा। खजाना मिलने के बाद भी वे दोबारा अपने काम में जुट गए और पूरी श्रद्धा के साथ उस पौधे को जमीन में रोप दिया।

गांव के नन्हे लव-कुश
नाम: सुरेश कुमार, उम्र: 13 वर्ष
एक सुंदर गांव में राम और मोहन नाम के दो पक्के दोस्त रहते थे। दोनों जितने ईमानदार थे, उतने ही प्रकृति प्रेमी भी थे। गांव का हर व्यक्ति उनकी ईमानदारी की तारीफ करता था। राम और मोहन को पेड़-पौधों से बहुत लगाव था। वे हर छोटे-बड़े त्योहार पर पेड़ लगाना नहीं भूलते थे। लेकिन उनकी सबसे खास बात यह थी कि वे पौधों के लिए पैसे अपने माता-पिता से नहीं मांगते थे। उन्होंने एक तरकीब सोची। उन्होंने एक छोटी सी तिजोरी (गुल्लक) बनाई। वे अपने जेब खर्च से पैसे बचाते और उस तिजोरी में जमा करते। जिस जगह पर वे अगला पौधा लगाने वाले होते, सुरक्षा के लिए अपनी तिजोरी को वहीं पास में मिट्टी में दबा देते। एक बार होली का त्योहार आया। मोहन सुंदर सा पौधा लेकर आया और राम ने अगले लक्ष्य के लिए तिजोरी को मिट्टी में दफना दिया। इसी तरह मेहनत करते-करते उन्होंने 4-5 वर्षों में 200 पौधे लगा दिए! जब गांव वालों को इन नन्हे बच्चों की इस मेहनत का पता चला, तो उन्होंने यह बात मुखिया जी को बताई। मुखिया जी बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने एक सभा बुलाई और दोनों दोस्तों को 'पर्यावरण रक्षक' का सम्मान दिया। मुखिया जी ने कहा, "बच्चों, ऐसे ही प्रकृति की सेवा करते रहो।" इनाम के तौर पर मुखिया जी ने उन्हें एक साइकिल और 100 नए पौधे भेंट किए, ताकि वे और आसानी से दूर-दूर जाकर पौधे लगा सकें। जल्द ही उन्होंने अपने घर के पास एक बहुत सुंदर बगीचा तैयार कर दिया। उनकी इस जोड़ी को देखकर पूरे गांव ने प्यार से उनका नाम 'लव-कुश' रख दिया।

नन्हें माली और हरियाली का सपना
प्रवीण कुमार, उम्र: 10 वर्ष
एक बार की बात है, आर्यन और रोहन नाम के दो गहरे मित्र थे। दोनों को प्रकृति से बहुत लगाव था। एक दिन उन्होंने देखा कि उनके घर के पास की जमीन बिल्कुल बंजर, सूखी और बेजान पड़ी है। वहां न तो खेलने के लिए हरी घास थी और न ही सुस्ताने के लिए किसी पेड़ की ठंडी छाया। दोनों मित्रों ने मन ही मन एक प्यारा सा सपना देखा। उन्होंने ठाना कि वे अपनी मेहनत से इस सूखी जमीन को एक सुंदर और महकते हुए बगीचे में बदल देंगे। अगले ही दिन, दोनों दोस्त अपनी छोटी सी टोली और बागवानी के औजार लेकर मैदान में पहुंच गए। आर्यन ने बड़े उत्साह से फावड़ा उठाया और जमीन को खोदना शुरू किया, ताकि सख्त मिट्टी नरम हो जाए और नन्हे पौधों की जड़ें आसानी से अंदर जा सकें। वहीं, रोहन अपने घर से एक नन्हा सा पौधा लेकर आया, जिसे वह उस मिट्टी में लगाने वाला था। दोनों ने मिलकर कड़ी मेहनत की। आर्यन गड्ढे खोदता और रोहन बहुत ही प्यार और सावधानी से उनमें पौधे रोपता। उन्होंने सूरज की गवाही में यह संकल्प लिया कि वे हर दिन इन पौधों को पानी देंगे और किसी दुश्मन की तरह कीड़ों से इनकी रक्षा करेंगे। धीरे-धीरे उनकी मेहनत रंग लाने लगी। कुछ ही समय में वह सूखी और भूरी जमीन नन्हे पौधों की हरियाली और रंग-बिरंगे फूलों की खुशबू से महकने लगी। आर्यन और रोहन की दोस्ती की तरह ही वह बगीचा भी अब मुस्कुरा रहा था।

. शिक्षक की सीख और ईमानदारी का फल
नाम: विनायक शर्मा, उम्र: 11 वर्ष
एक समय की बात है, एक गांव में दो पक्के दोस्त रहते थे। वे बचपन से ही साथ-साथ रहे और पढ़ाई में भी बहुत तेज थे। उनके शिक्षक ने उन्हें सिखाया था कि पेड़ लगाना हमारे पर्यावरण के लिए कितना जरूरी है। शिक्षक की यह बात उनके मन में बैठ गई थी और वे कई दिनों से पेड़ लगाने की योजना बना रहे थे। एक दिन, वे दोनों बाजार गए और वहां से एक सुंदर सा पौधा खरीदकर लाए। गांव के पास एक खाली मैदान में उन्होंने पौधा लगाने का फैसला किया। जैसे ही उन्होंने गड्ढा खोदना शुरू किया, उनकी कुदाल किसी सख्त चीज से टकराई। उन्होंने सावधानी से मिट्टी हटाई तो वहां एक पुराना संदूक मिला। दोनों के मन में उत्सुकता जागी कि इसमें क्या होगा? जब उन्होंने संदूक खोला, तो देखा कि वह पैसों से भरा हुआ था। इतने सारे पैसे देखकर भी उनके मन में लालच नहीं आया। उन्होंने तय किया कि वे इसे पुलिस को सौंप देंगे। वे तुरंत संदूक लेकर पुलिस स्टेशन पहुंचे। पुलिस अधिकारी ने उनसे पूछा, "बच्चों, तुम्हें यह संदूक कहां से मिला?" बच्चों ने सारी बात सच-सच बता दी, "साहब, हम पेड़ लगाने के लिए गड्ढा खोद रहे थे, तभी हमें यह मिला।" उनकी ईमानदारी देखकर पुलिस ने उन्हें खूब शाबाशी दी और उनकी सराहना की। जब वे घर लौटे और अपनी-अपनी मां को यह बात बताई, तो उनकी माताओं का सिर गर्व से ऊंचा हो गया। उन्होंने पूछा, "बेटा, तुम्हारे मन में पुलिस के पास जाने का विचार कहां से आया?" बच्चों ने गर्व से उत्तर दिया, "मां, हमारे शिक्षक ने हमें सिखाया है कि मेहनत का फल ही मीठा होता है और हमें हमेशा ईमानदारी का रास्ता चुनना चाहिए।"

सुनहरा संदूक और नन्हा पौधा
नाम: माही रंजक, उम्र: 10 वर्ष
एक गांव में यश और आयुष नाम के दो भाई रहते थे। उनका परिवार आर्थिक रूप से काफी गरीब था। उनके माता-पिता मजदूर थे, जो काम की तलाश में रोज दूसरे गांव जाते थे। यश और आयुष भी छोटे थे, पर अपने माता-पिता का हाथ बंटाने के लिए खेतों पर काम किया करते थे। एक दिन, खेत में काम करते समय यश की नजर मिट्टी में दबे एक सुनहरे रंग के संदूक पर पड़ी। वह उत्सुकता से उसके पास गया और उसे खोला। उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं—उस संदूक में सोने के गहने और बहुत सारा कीमती सामान था। उसने तुरंत अपने छोटे भाई आयुष को बुलाया। खजाना देखकर दोनों की खुशी का ठिकाना न रहा। दोनों भाइयों ने सोचा, "अगर हम इसे बेच दें, तो हमारे माता-पिता को इतनी कड़ी धूप में मजदूरी नहीं करनी पड़ेगी।" अपनी योजना को सुरक्षित रखने के लिए वे संदूक लेकर एक घने पेड़ के पास पहुंचे। यश ने वहां गड्ढा खोदना शुरू किया और कहा, "आयुष, जब तक माता-पिता घर नहीं लौट आते, हम इसे यहीं छिपा देते हैं।" यश ने जैसे ही संदूक गड्ढे में रखकर उस पर मिट्टी डालनी शुरू की, तभी आयुष दौड़कर एक छोटा सा पौधा ले आया। वह बोला, "भैया! इस गड्ढे के ऊपर यह पौधा लगा देते हैं। इससे किसी को शक भी नहीं होगा और हमारी वजह से एक नया पेड़ भी उग जाएगा।" दोनों ने मिलकर उस जगह पर पौधा रोप दिया। उन्होंने तय किया कि जब माता-पिता आएंगे, तब वे उन्हें यह सब बताएंगे। उस खजाने से वे अपना खुद का व्यापार शुरू करेंगे और एक मान-सम्मान वाला अच्छा जीवन जिएंगे। शाम को जब माता-पिता थककर घर लौटे, तो यश और आयुष ने उन्हें सारी बात बताई। वे उन्हें उस पेड़ के पास ले गए जहां उन्होंने पौधा लगाया था। पिता ने सावधानी से मिट्टी हटाई और वह सुनहरा संदूक बाहर निकाला। सोने के गहने देखकर माता-पिता दंग रह गए, लेकिन उनकी आंखों में लालच के बजाय एक गहरी सोच थी। पिता ने दोनों भाइयों के सिर पर हाथ रखा और बड़े प्यार से कहा, "मेरे बच्चों, यह खजाना हमें अमीर तो बना सकता है, लेकिन मेहनत और ईमानदारी से जो सुख मिलता है, वह सबसे बड़ा होता है।" अगले दिन, पिता उन बच्चों को लेकर गांव के मुखिया के पास गए। उन्होंने वह संदूक मुखिया जी को सौंप दिया, क्योंकि वह किसी की खोई हुई अमानत हो सकती थी। मुखिया जी बच्चों की इस ईमानदारी और उनके माता-पिता के संस्कारों से इतने खुश हुए कि उन्होंने इनाम के तौर पर उन्हें एक बड़ा पुरस्कार दिया। उस इनाम की राशि से परिवार ने अपनी खुद की जमीन खरीदी और मजदूरी छोड़ अपना व्यापार शुरू किया। लेकिन वे उस पौधे को कभी नहीं भूले! उन्होंने उस स्थान पर सैकड़ों और पेड़ लगाए। सालों बाद, वह नन्हा पौधा एक विशाल वृक्ष बन गया, जिसकी छांव में बैठकर यश और आयुष अक्सर याद करते थे कि कैसे एक छोटे से पौधे ने उनकी पूरी दुनिया बदल दी।

प्रशंसा के पुल: ईमानदारी की जीत
नाम: भाव्या इनवाती, उम्र: 8 वर्ष
रोहित और मोहित गर्मी की छुट्टियों का बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। उन्होंने छुट्टियों के लिए कई मजेदार योजनाएं बना रखी थीं। लेकिन तभी अचानक पापा की तबीयत खराब हो गई, जिस कारण उनके सारे प्लान रद्द हो गए। दोनों भाई बहुत उदास हो गए। बच्चों को उदास देखकर पापा ने उन्हें प्यार से समझाया और कहा, “बच्चों, निराश मत हो। अपने घर के पास काफी खाली जमीन पड़ी है। क्यों न तुम दोनों वहां सुंदर पौधे लगाओ? इससे तुम्हारा समय भी अच्छे काम में बीतेगा और हमारे पर्यावरण को भी लाभ होगा।" पापा की बात दोनों भाइयों को बहुत अच्छी लगी। अगले ही दिन वे उत्साह के साथ जमीन की खुदाई करने लगे। अभी उन्होंने थोड़ी ही खुदाई की थी कि उन्हें मिट्टी के अंदर एक पुराना बॉक्स (संदूक) मिला। दोनों भाई पहले तो थोड़ा घबरा गए और फिर तुरंत भागकर पापा को बुला लाए। जब पापा की मौजूदगी में बॉक्स खोला गया, तो सबकी आंखें हैरान रह गईं! उसमें ढेर सारे रुपये, सोने के गहने और कीमती सामान था। रोहित और मोहित ने बिना किसी लालच के तुरंत पापा से कहा, “पापा, यह सामान हमारा नहीं है। हमें इसे पुलिस को सौंप देना चाहिए ताकि यह इसके असली मालिक तक पहुंच सके।” बच्चों की इतनी छोटी उम्र में ऐसी बड़ी ईमानदारी देखकर पापा का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। जब यह बात पुलिस और कॉलोनी के लोगों तक पहुंची, तो हर कोई उनकी मिसाल देने लगा। चारों ओर उनकी ईमानदारी के "प्रशंसा के पुल" बंध गए। पुलिस ने भी एक विशेष समारोह में दोनों भाइयों को उनकी नेकदिली के लिए सम्मानित किया।

लहलहा उठा अनार का पौधा
नाम: महक नाहर, उम्र: 10 वर्ष
चिंटू को पेड़-पौधों से बहुत लगाव था। उसने अपने घर की बालकनी में रंग-बिरंगे गमलों का एक छोटा सा संसार बसा रखा था। एक दिन उसने देखा कि उसका सबसे प्यारा पौधा, जिस पर सुंदर लाल फूल आते थे, धीरे-धीरे मुरझा रहा है। चिंटू उदास हो गया। वह दौड़कर अपने बड़े भाई करण के पास गया और पूछा, “भैया, देखिए न! यह पौधा मुरझा क्यों रहा है? क्या यह बीमार है?” करण ने गमले की जांच की और मुस्कुराते हुए कहा, “चिंटू, यह बीमार नहीं है, बस इसे अब खुली जगह चाहिए। यह अनार का पौधा है और अब यह बड़ा हो रहा है। गमला इसके लिए छोटा पड़ रहा है, इसलिए इसे जमीन में लगाना होगा।” चिंटू को भाई की बात समझ आ गई। करण ने घर के पिछवाड़े की खाली जमीन पर एक गहरा गड्ढा खोदा और चिंटू से पौधा मंगवाया। चिंटू ने बड़े प्यार से उस नन्हे पौधे को मिट्टी में रोप दिया। करण ने समझाते हुए कहा, “जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, हमें रहने और बढ़ने के लिए ज्यादा जगह चाहिए होती है, वैसे ही पेड़ों को भी फैलने, फूल देने और फल उगाने के लिए खुली मिट्टी और जगह की जरूरत होती है।” चिंटू अब समझ चुका था कि हर चीज के बढ़ने का एक सही वक्त और सही तरीका होता है। उसने रोज पौधे को पानी दिया। कुछ ही दिनों में वह पौधा नई पत्तियों से लद गया और उस पर फिर से सुंदर लाल फूल खिले। धीरे-धीरे वे फूल बड़े और रसीले अनार में बदल गए। अपने लगाए पौधे पर लटकते लाल अनार देख चिंटू की खुशी का ठिकाना न रहा।

नन्हा संकल्प और हरियाली
नाम: जयश्री, उम्र: 11 वर्ष
सूरज की गुनगुनी धूप चारों ओर फैली थी। रोहन ने अपना छोटा सा फावड़ा उठाया और बगीचे के एक कोने में जमीन की सख्त मिट्टी को नरम करना शुरू कर दिया। वह चाहता था कि मिट्टी इतनी उपजाऊ बने कि नन्हे पौधों की जड़ों को फैलने के लिए भरपूर जगह मिले। रोहन को पूरी तन्मयता से मेहनत करते देख उसकी छोटी बहन रिया भी पीछे नहीं रही। वह दौड़कर घर के अंदर से अपना पसंदीदा फूलों का नन्हा पौधा ले आई। उसके चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान थी। दोनों भाई-बहन ने मिलकर मिट्टी में एक छोटा सा गड्ढा बनाया और बड़ी कोमलता से उस पौधे को वहां रोप दिया। उन्होंने हाथ जोड़कर एक-दूसरे से वादा किया कि वे रोज इस पौधे को पानी देंगे और इसकी देखभाल करेंगे। मिट्टी से सने उनके नन्हे हाथ और पसीने से चमकते चेहरे इस बात की गवाही दे रहे थे कि उन्होंने एक बड़ा सबक सीख लिया है— कि नन्हे हाथों से की गई छोटी सी मेहनत भी हमारी धरती को सुंदर और खुशहाल बना सकती है। सीख: "प्रकृति की सेवा ही सबसे बड़ी खुशी है। हमारे छोटे-छोटे प्रयास पर्यावरण में बड़ा बदलाव ला सकते हैं।"

गणतंत्र दिवस और ईमानदारी का इनाम
लेखक: वीर मूंदड़ा, उम्र: 9 वर्ष
सानू और रक्षित दोनों भाई-बहन एक ही स्कूल में पढ़ते थे। उन्हें हरियाली और प्रकृति से बहुत लगाव था। अक्सर वे स्कूल के बगीचे की देखभाल किया करते थे। एक दिन स्कूल के मैदान में घूमते हुए उनकी नजर एक ऊंचे मिट्टी के टीले पर पड़ी। वहां एक बहुत विशाल और पुराना पेड़ खड़ा था, लेकिन उसके आसपास कोई छोटा पौधा नहीं था। सानू ने रक्षित से कहा, "भाई, इस बड़े पेड़ के पास कोई नन्हा साथी नहीं है, क्यों न हम यहां एक सुंदर फूलों का पौधा लगाएं?" रक्षित तुरंत एक नन्हा पौधा और फावड़ा ले आया। जैसे ही उन्होंने पौधा लगाने के लिए गड्ढा खोदना शुरू किया, उन्हें मिट्टी के नीचे कुछ सख्त चीज महसूस हुई। सावधानी से मिट्टी हटाई तो वहां एक बड़ा सा लोहे का बॉक्स (संदूक) दिखाई दिया। जब उन्होंने उत्सुकता वश उसे खोला, तो वे दंग रह गए! वह बॉक्स रुपयों और कीमती खजाने से भरा हुआ था। दोनों बच्चे बहुत खुश हुए, लेकिन उन्होंने एक पल भी लालच नहीं किया। वे तुरंत उस भारी बॉक्स को उठाकर अपने प्रधानाचार्य (प्रिंसिपल) के पास ले गए। प्रधानाचार्य बच्चों की इतनी बड़ी ईमानदारी देख कर हैरान रह गए। उन्होंने तुरंत पुलिस को सूचित किया और वह खजाना 'राजकीय कोष' (सरकारी खजाने) में जमा करवा दिया गया। कुछ दिनों बाद, गणतंत्र दिवस का समारोह था। तिरंगा फहराने के बाद, प्रधानाचार्य ने सभी के सामने सानू और रक्षित को मंच पर बुलाया। उनकी ईमानदारी की कहानी पूरे स्कूल को सुनाई गई और उन्हें विशेष 'प्रशंसा पत्र' देकर सम्मानित किया गया। सानू और रक्षित के लिए यह सबसे यादगार गणतंत्र दिवस बन गया।

असली धन: हरियाली
नाम: महक विश्नोई, उम्र: 07 वर्ष
एक सुंदर गांव में दो भाई रहते थे— राम और श्याम। बड़ा भाई राम हमेशा धन-दौलत जमा करने की चिंता में रहता था, जबकि छोटा भाई श्याम अपना सारा समय पेड़-पौधों की सेवा में बिताता था। एक दिन राम ने एक बड़े संदूक में अपना सारा सोना-चांदी भरा और उसे भविष्य के लिए जमीन में छिपाने लगा। यह देखकर श्याम उसके पास आया और बड़े प्यार से बोला, "भैया, यह धन तो केवल तिजोरी की शोभा बढ़ाएगा। अगर आप भविष्य सुरक्षित करना चाहते हैं, तो हमें पेड़ लगाने चाहिए। जब हवा साफ होगी और धरती हरी-भरी होगी, तभी तो हम स्वस्थ और खुश रह पाएंगे।" राम को छोटे भाई की बात दिल को छू गई। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ कि असली धन तो 'साफ हवा' और 'शुद्ध वातावरण' है। उसने तुरंत फैसला किया कि वह अपनी जमा पूंजी से गांव को हरा-भरा बनाएगा। दोनों भाइयों ने मिलकर हजारों पेड़ लगाए। कुछ ही सालों में गांव के चारों तरफ एक घना और सुंदर जंगल लहलहाने लगा। अब गांव के सभी लोग उस जंगल की ठंडी छांव में बैठते और मिलकर उसकी देखभाल करते। राम अब बहुत खुश था, क्योंकि उसे समझ आ गया था कि प्रकृति से बढ़कर कोई खजाना नहीं होता।

नेकी का उपहार
नाम: थास्विका यादव, उम्र: 7 वर्ष
एक समय की बात है, दो गहरे मित्र थे। एक दोपहर वे गांव के पास से गुजर रहे थे, तभी उनकी नजर एक तपते हुए खाली मैदान पर पड़ी। मैदान एकदम वीरान था और वहां दूर-दूर तक कोई छाया नहीं थी। एक दोस्त ने कहा, "क्यों न हम इस खाली मैदान में एक पौधा लगा दें? जब यह बड़ा होकर विशाल पेड़ बनेगा, तो राहगीरों को इसकी ठंडी छांव में सुकून मिलेगा।" दूसरे दोस्त ने उत्साह से कहा, "हाँ! और बहुत सारे पक्षी भी इस पर अपना घोंसला बनाकर चैन से रह सकेंगे। यह पेड़ सबका भला करेगा।" अगले ही दिन, एक दोस्त एक नन्हा पौधा लेकर आया और दूसरे ने जमीन खोदना शुरू किया। अभी उन्होंने थोड़ी ही मिट्टी हटाई थी कि फावड़ा किसी धातु से टकराया। सावधानी से खुदाई करने पर उन्हें मिट्टी के नीचे दबा हुआ एक पुराना बक्सा मिला। जब उन्होंने धड़कते दिल के साथ बक्सा खोला, तो उनकी आंखें फटी की फटी रह गईं! वह बक्सा सोने के चमकते सिक्कों से भरा हुआ था। दोनों दोस्त समझ गए कि यह उनकी नेक सोच का ईश्वरीय उपहार है। उन्होंने सबसे पहले उस जगह पर पौधा लगाया, उसे पानी दिया और फिर खुशी-खुशी खजाना लेकर घर लौटे। उन्होंने उस धन का एक बड़ा हिस्सा समाज की भलाई और और भी अधिक पेड़ लगाने में खर्च किया।

पौधों से प्यार
नाम: कृशिव, उम्र: 11 वर्ष
एक छोटे से सुंदर गांव में अमित नाम का एक लड़का रहता था। अमित को पेड़-पौधों से बहुत लगाव था। वह उन्हें अपने मित्रों की तरह समझता था। लेकिन अमित अक्सर एक बात से दुखी रहता था। गांव के कुछ शरारती बच्चे खेल-खेल में नन्हे पौधों को उखाड़ देते थे। एक दिन अमित ने ठान लिया कि वह अपने बगीचे को और भी सुंदर बनाएगा। उसने अपने छोटे भाई से एक नन्हा पौधा मंगवाया। अमित ने फावड़ा उठाया और बगीचे के एक कोने में गड्ढा खोदना शुरू किया। अचानक, मिट्टी के अंदर से 'खट' की आवाज आई। अमित को लगा कि शायद कोई पत्थर है, लेकिन उत्सुकता वश उसने और खुदाई की। कुछ ही देर में मिट्टी के नीचे से एक पुरानी तिजोरी बाहर निकली। जब उसने उसे खोला, तो दंग रह गया! वह तिजोरी रुपयों से भरी हुई थी। अमित चाहता तो उन पैसों से अपने लिए खिलौने खरीद सकता था, लेकिन उसने उन रुपयों से हजारों तरह के फलदार और फूलों वाले पौधे खरीदे। उसने पूरे गांव में जगह-जगह पौधे लगा दिए। अमित की इस लगन और निस्वार्थ प्रेम को देखकर गांव वाले उसकी प्रशंसा करते नहीं थकते थे। अमित की मेहनत रंग लाई। उसकी सराहना सुनकर उन शरारती बच्चों को भी अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने भी पौधों से दोस्ती कर ली और उनकी देखभाल की जिम्मेदारी उठा ली। अब गांव का हर कोना फूलों की खुशबू से महकने लगा और ऐसा लगने लगा मानो सारे पौधे खुशी से खिलखिला उठे हों।

बड़ी खबरें

View All

किड्स

पैरेंटिंग

ट्रेंडिंग